भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 321
३१०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७१

चाहता हूँ कि अपार कठिनाईको पार करनेवाले पुण्यात्मा पुरुषकी भाँति मेरे पिताजी इस घोर समुद्रको कब पार कर सकेंगे?'

पृथ्वि! वह सुग्गा इस चिन्तामें ही था कि वहाँ एक देवी आयी, जिसके हाथमें एक सुवर्णपात्र था। उसने विष्णुकी पूजा की और 'नमो नारायणाय' कहकर एक उत्तम आसनपर बैठ गयी। अभी पलमात्र ही समय बीता होगा कि फिर वहाँ वैसी असंख्य रूपवती देवियाँ आ गयीं और वे सभी नृत्य, गान, वाद्यसे देवार्चन करके वापस चली गयीं। वहीं जटायुके वंशके कुछ पक्षी भी थे। उन्होंने उस सुग्गेसे पूछा—'तुम यहाँ कैसे पहुँचे, क्योंकि अगाध जलसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना साधारण काम नहीं है।' इसपर तोतेने उत्तर दिया—'मेरे पिताजी वायुकी तेज गतिमें समुद्री जहाजपर बड़ी कठिनाईका अनुभव कर रहे हैं। उनकी रक्षाके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ। आपलोग कुछ प्रयत्न करें, जिससे वे सुखी हो सकें।'

पक्षीगण बोले—'जिस मार्गसे हम चलें, तुम उसका अनुसरण करो। हम पादविन्याससे ही समुद्रमें चलकर चोंचोंसे मकर-नक्रादिका संहार कर डालेंगे। इससे तुम्हारे साथ तुम्हारे पिता भी समुद्र तर जायँगे।' अब वह तोता उन पक्षियोंके पीछे-पीछे चलता हुआ गोकर्णके पास पहुँचा और उनके प्रयाससे गोकर्ण समुद्रसे बाहर निकल गया। वहाँ पहुँचकर वह उसी देवमन्दिरके सामने गया; जहाँ कमलोंसे सुशोभित एक सरोवर था, जिसकी सीढ़ियाँ मणियों और रत्नोंसे बनी थीं। गोकर्णने उस सरोवरमें स्नान कर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किया, फिर मन्दिरमें जाकर भगवान् केशवकी आराधना कर वह प्रभूत रत्नोंद्वारा सम्पन्न उस पञ्चायतनमन्दिरमें तोतेके साथ एक ओर छिप गया। इतनेमें ही वे देवियाँ, जिन्होंने पहले उस मन्दिरमें देवार्चन किया था, वहीं पुनः आ गयीं और देवपूजन करने लगीं। फिर उनमेंसे एक प्रधान देवीने कहा—'सखियो! ब्रह्ममें निष्ठा रखनेवाले गोकर्णके खानेके लिये दिव्य फल और पीनेके लिये उत्तम जल प्रदान करो, जिससे तीन महीनोंतक इसकी तृप्ति बनी रहे एवं इसके शोक, मोह तथा पाप भी नष्ट हो जायँ।'

इसपर उन देवियोंने सब कुछ वैसा ही कर गोकर्णसे कहा—'तुम निश्चिन्त एवं निर्भय होकर इस स्वर्गके समान सुखदायी स्थानमें तबतक निवास करो, जबतक तुम्हारा काम सिद्ध न हो जाय,' और फिर वे वहाँसे चली गयीं। अब गोकर्ण वहाँ इस प्रकार रहने लगा मानो मथुरापुरीमें ही हो। कुछ समयके पश्चात् उसका जहाज भी संयोगवश किनारे लग गया। अब इधर जहाजपरके उसके साथी उसे न देखकर परस्पर कहने लगे—'ओह, पता नहीं गोकर्ण कहाँ चला गया? वह मर गया, जलमें डूब गया अथवा किसी जीवने उसे खा लिया? हो सकता है, लज्जाके कारण वह समुद्रमें डूब गया हो। अब हमलोगोंका यही कर्तव्य है कि उसके पिताके सामने हम ही—पुत्ररूपमें रहें। उपार्जित रत्नोंमेंसे जितना भाग गोकर्णका हो, वह उसके पिताको हम सौंप दें।'

उधर गोकर्णका मन बड़ा शोकाकुल था। उसने तोतेसे माता-पिताके हितकी बात पूछी। सुग्गेने कहा—'मैं तुच्छ पक्षी आपको वहाँ ले चलूँ—यह मेरी शक्तिसे बाहर है। हाँ, मैं आपकी आज्ञासे आकाशमार्गसे मथुरा जाकर तथा आपकी बात उनके पास तथा उनका संदेश आपके पास

वराह पुराण · पृष्ठ 321, कुल 414 में से · BharatKosha