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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

प्रारंभिक पृष्ठ व विषयानुक्रमणिका

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डॉ० राकेश शास्त्री सदानन्दयतिविरचितः वेदान्तसारः (विस्तृत भूमिका, पदच्छेद, अनुवाद, विशेष एवं डायग्राम्स सहित 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या)

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परिमल संस्कृत ग्रन्थमाला- ६४ वेदान्तसार (विस्तृत भूमिका, पदच्छेद, अनुवाद, विशेष एवं डायग्राम्स सहित ‘चन्द्रिका’ हिन्दी व्याख्या) व्याख्याकारः डॉ. राकेश शास्त्री अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग हरिदेव जोशी राजकीय कन्या महाविद्यालय बाँसवाडा (राज०) परिमल पब्लिकेशन्स दिल्ली

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प्रकाशक : परिमल पब्लिकेशन्स २७/२८, शक्ति नगर दिल्ली - ११०००७ फोन - २७४४५४५६ E-mail : parimal@ndf.vsnl.net.in URL : www.parimalpublication.com द्वितीय संस्करण २००४ ISBN : 81-7110-217-8 मूल्य - १००.०० रुपये मुद्रक : हिमांशु प्रिन्टर्स मेन यमुना विहार रोड़ मौजपुर, दिल्ली-९२

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PARIMAL SANSKRIT SERIES NO. 64 VEDĀNTASĀRA OF SADĀNANDA Introduction, translation, 'Chandrika' Hindi commentary with various notes and diagrams Dr. Rakesh Shastri Head, Dept. of Sanskrit H. J. Govt. Girls College Banswara (Raj.) PARIMAL PUBLICATIONS DELHI

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Published by Parimal Publications 27/28, Shakti Nagar Delhi 110007 Phone : 2744 5456 E-mail : parimal@ndf.vsnl.net.in URL : www.parimalpublication.com Second Edition 2004 Price Rs. 100.00 ISBN : 81-7110-217-8 Printed By Himanshu Printers, Main Yamuna Vihar Road Maujpur Delhi-92

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समर्पण सरल एवं सौम्य, विधिविशेषज्ञ, परमश्रद्धेय, महामहिम श्री अंशुमान सिंह राज्यपाल, राजस्थान के कर-कमलों में सादर राकेश शास्त्री

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यत्किञ्चित् वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। इसके 38 खण्डों में ग्रन्थकार ने वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का सरलरूप में प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। इससे पूर्व ब्रह्मसूत्रादि में प्रतिपादित वेदान्त के सिद्धान्तों को समझना सामान्य व्यक्ति के लिए दुष्करकार्य हो गया था। इसीकारण आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार की रचना की आवश्यकता अनुभव की जो अत्यन्त लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक की लोकप्रियता का ही परिणाम है कि वेदान्तदर्शन के अध्ययन हेतु प्रायः सभी विश्वविद्यालयों ने इसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में निर्धारित किया हुआ है। यद्यपि इस ग्रन्थ पर अनेक विद्वानों ने अपनी लेखनी चलाकर इसे पाठकों के लिए सुगम बनाने का प्रयास किया है, तथापि अपने विद्यार्थी जीवन से ही इसे नूतनशैली में प्रस्तुत करने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी। इससे पूर्व प्रकाशित सांख्यकारिका के संस्करण को छात्रसमुदाय में जो अपनत्व एवं प्रशंसा प्राप्त हुई, साथ ही उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने उसकी सरल डायग्राम पद्धति की सराहना करते हुए उसे साहित्य पुरस्कार प्रदान किया, इन दोनों बातों से उत्साहित होकर वेदान्तसार की व्याख्या भी उसी शैली से प्रस्तुत करने का मैंने संकल्प किया। ईश्वर की असीम अनुकम्पा से आज यह पुस्तक आपके हाथ में है इससे न केवल मैं रोमांचित हूँ, अपितु असीम आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ। निश्चय ही इसे भी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के समान ही विद्वानों के हृदय में स्थान प्राप्त होगा। यहाँ 108 पृष्ठों की विस्तृत भूमिका में जहाँ वेदान्त-विषयक अनेक जिज्ञासाओं का समाधान किया गया है। वहीं मूलग्रन्थ के रूप को सुरक्षित रखते हुए विषय को स्पष्ट किया गया है। सरलता की दृष्टि से मुख्य खण्डों को उपखण्डों में विभाजित किया गया है। प्रखण्डों के विभाजन में विषय-विशेष के सर्वांगीण विवेचन की दृष्टि ही प्रमुख रही है। पूर्व प्रतिपादित विषय को अग्रिम विषय के साथ जोड़ने के लिए अवतरणिका, पुनः पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद के बाद 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या में विषय का सर्वांगीण एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

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साथ ही विशेष शीर्षक में तत्सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख किया है। तत्पश्चात् उस खण्ड के अभिप्राय को डायग्राम बनाकर अध्येता जिज्ञासु के लिए विषय को सहज हृदयंगम कराना ही मुख्य उद्देश्य है। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि अन्य पुस्तकों के समान ही यह पुस्तक भी विद्वत्समुदाय में लोकप्रिय होगी एवं छात्रों की आवश्यकता को पूर्ण करेगी। इस पुस्तक के लेखन में अब तक प्रकाशित अनेक विद्वानों की टीका, एवं व्याख्याओं से सहायता ली गई है। अतः उनके विद्वान् लेखकों के प्रति श्रद्धा से अवनत होकर आभार व्यक्त करता हूँ। पुस्तक को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए विद्वानों के सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। इति शुभम्। 14 मार्च, 2002 राकेश शास्त्री 1-जे-38, हाउसिंग बोर्ड कालोनी बांसवाडा (राज०) 02962-250026

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विषयानुक्रमणिका (i) दो शब्द (ii) समर्पण (iii) विषयानुक्रमणिका (iv) भूमिका 1 (क) दर्शन से अभिप्राय 1 (ख) दर्शन का विकास 1 (ग) भारतीयदर्शन एक परिचय 2 (घ) वेदान्तदर्शन के मूल स्रोत 8 (ङ) उपनिषदों में वेदान्तदर्शन 9 (च) वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्य (57) एवं उनके ग्रन्थ 11 बादरायण, आत्रेय, आश्मरथ्य, औडुलोमि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि, बादरि, भर्तृप्रपञ्च, भर्तृमित्र, भर्तृहरि, उपवर्ष, बौधायन, टङ्क, ब्रह्मनन्दी, ब्रह्मदत्त, भारुचि, द्रविड़, गौडपाद, गोविन्दपाद, शङ्कराचार्य, पद्मपाद, मण्डनमिश्र, सर्वज्ञात्ममुनि, वाचस्पतिमिश्र, श्रीकृष्णमिश्रयति, प्रकाशात्मयति, अद्वैतानन्द, श्रीहर्षमिश्र, आनन्दबोध, अमलानन्द, चित्सुखाचार्य, शङ्करानन्द, विद्यारण्यमुनि, आनन्दगिरि, प्रकाशानन्दाचार्य, मल्लनाराध्य, नृसिंहाश्रम, रंगराजाध्वरी, अप्पयदीक्षित, भट्टोजिदीक्षित, सदाशिव ब्रह्मेन्द्र, नीलकण्ठ सूरि, सदानन्द योगीन्द्र, नृसिंह सरस्वती, रामतीर्थ, आपदेव, मधुसूदन सरस्वती, धर्मराज अध्वरीन्द्र, गोविन्दानन्द, रामानन्द सरस्वती, सदानन्द यति, ब्रह्मानन्द सरस्वती, अच्युत कृष्णानन्द, महादेव सरस्वती, सदाशिवेन्द्र सरस्वती, आयन्नदीक्षित। (छ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त 44 (1) ब्रह्म 44 (2) आत्मा 48 (3) अज्ञान/माया 49 (4) अज्ञान के भेद 52

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(5) अज्ञान की शक्तियाँ 53 (6) ईश्वर 54 (7) जीव 56 (8) जीव की चार अवस्थाएँ 57 (9) जगत् 59 (10) शरीरत्रय (कारण, सूक्ष्म, स्थूल) 60 (11) पञ्चकोश 67 (12) पञ्चीकरण प्रक्रिया 69 (13) त्रिवृत्करण 71 (14) प्रमाण 72 (15) कार्यकारणसिद्धान्त 80 (16) समष्टि-व्यष्टि सिद्धान्त 82 (17) सत्ता के त्रिविधरूप 84 (18) जीव की अवस्थाएँ 86 (19) सृष्टि प्रक्रिया 88 (20) अध्यारोप-अपवाद 92 (21) सविकल्पक निर्विकल्पक समाधि 94 (22) जीवन्मुक्त का लक्षण 95 (23) आत्मविषयक विभिन्न मत 98 (24) अरुन्धती न्याय 101 (25) महावाक्य 102 (अ) तत्त्वमसि (ब) अहं ब्रह्मास्मि वेदान्तसार मूल एवम् 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या मङ्गलाचरण 108 परिभाषा 116 अनुबन्ध चतुष्टय 119 अज्ञान-निरूपण 149

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प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण 164 तुरीय निरूपण 168 शक्तिद्वय-निरूपण 173 कारण-निरूपण 178 सूक्ष्म-शरीर 185 पञ्चीकरण प्रक्रिया 201 स्थूलसृष्टि-निरूपण 204 स्थूलमहाप्रपञ्च 212 चार्वाकादिमत निराकरण 216 अपवाद-निरूपण 224 महावाक्यार्थ-निरूपण 232 अनुभववाक्यार्थ-निरूपण 249 समाधि-निरूपण 265 जीवन्मुक्त-निरूपण 278 परिशिष्ट (क) पुस्तक में दिये गए डायग्राम्स की सूची 294 (ख) सहायकग्रन्थ-सूची 297

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भूमिका: (क) दर्शन से अभिप्राय व विकास

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भूमिका (क) दर्शन से अभिप्राय-देखना अर्थ में प्रयुक्त √ दृश् धातु से ल्युट् प्रत्यय करने पर 'दर्शन' शब्द निष्पन्न होता है (अष्टाध्यायी-3/3/114 नपुंसके भावे क्त)। आचार्य पाणिनि के अनुसार 'ल्युट्' प्रत्यय का प्रयोग भाव, करण एवं अधिकरण- तीन अर्थों में होता है। (ल्युट् च-3/3/115) (करणाधिकरणयोश्च 3/3/117) यहां भाव से अभिप्राय पूर्णतया शुद्ध धातु के अर्थ से है। इसप्रकार 'दर्शन' शब्द का अर्थ हुआ-देखना। वह विद्या, ज्ञान अथवा उपकरण (साधन) जिसके द्वारा किसी विषय या वस्तु को देखा जाए या जाना जाए अथवा आधारभूत वह वस्तु जिसमें किसी को देखा जाए। दर्शन का मानवजीवन के साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, क्योंकि मानव के जीवन का कोई भी पक्ष दर्शन की परिधि से बाहर नहीं हो सकता। सृष्टि के आरम्भ में जब से मानव ने विचार करना प्रारम्भ किया, उसी समय से उसके कुछ अनुभव स्थायी आकार लेने लगे। स्थायी आकार से आकारित उसके वे अनुभव ही कालान्तर में दर्शनरूप में परिवर्तित हो गए। (ख) दर्शन का विकास-प्रकृति के विभिन्न व्यापारों को देखकर आदिकाल में मनुष्य अत्यधिक आश्चर्यचकित होता होगा। उसकी सदैव जिज्ञासा रही होगी कि प्रकृति क्या है? अर्थात् सूरज, चाँद, तारे, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष आदि ये सब क्या हैं? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मुझे कहाँ जाना है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? यह संसार क्या है? इसे बनाने वाला कौन है? इस संसार को बनाने वाले और मनुष्य का क्या सम्बन्ध है? आदि। ये कुछ प्रश्न ही आदिमानव के मन में, मस्तिष्क में रहे होंगे, जिन्होंने उसे चिन्तन के लिए बाध्य किया होगा। आगे चलकर इन्हीं प्रश्नों के उत्तर विद्वान् मनीषियों ने दर्शनरूप में प्रतिष्ठित किए। इन समस्याओं पर अलग-अलग चिन्तकों ने अलग-अलग शैली द्वारा चिन्तन किया तथा उनके समाधान का अन्वेषण किया। इसीप्रकार अनेक दर्शनों का भारतवर्ष में प्रादुर्भाव हुआ। इन्हीं चिन्तन शैलियों को बाद में भारतीयदर्शन के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

भूमिका: (ख) भारतीयदर्शन एक परिचय

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२ वेदान्तसार इसप्रकार दर्शनरूपी ज्ञान की इस स्रोतस्विनी का प्रवाह आदिकाल से अबाधगति से चला आ रहा है। जिसका उद्गमस्थल हमें वैदिकज्ञान के अक्षयभण्डार ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होता है। उसमें प्रयुक्त दार्शनिक सूक्त-नासदीय, पुरुष आदि तत्कालीन मानव की नैसर्गिकजिज्ञासा के परिचायक हैं। तत्पश्चात् उपनिषद्ग्रन्थों में साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों का मौलिक एवं स्वतन्त्रचिन्तन उपलब्ध होता है। इन उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ मानी गई है, जिनमें ग्यारह प्रमुख हैं। सभी भारतीय आस्तिकदर्शनों का मूल आधार ये उपनिषद् ग्रन्थ ही हैं। इनमें भी बृहदारण्यक, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य आदि दार्शनिक विषयों के प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।¹ (ग) भारतीयदर्शन एक परिचय-भारतीयदर्शनविषयक विचारधाराओं को मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-(1) आस्तिक एवं (2) नास्तिक। जिनमें वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार किया गया, उन्हें आस्तिक तथा जो वेदों को महत्ता प्रदान नहीं करते हैं उन्हें 'नास्तिक' दर्शन की संज्ञा प्रदान की गई। नास्तिक-दर्शनों के अन्तर्गत मुख्यरूप से चार्वाक, जैन और बौद्धदर्शनों की गणना की गई तथा आस्तिकदर्शनों की संख्या छः मानी गई-पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, (वेदान्त), सांख्य, योग, न्याय और वैशेषिकदर्शन। इन सभी दर्शनों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है- (अ) नास्तिकदर्शन-(क) इनमें सर्वाधिक प्राचीन चार्वाक-दर्शन माना गया है। इसीको लोकायत के नाम से भी जाना जाता है। यह वस्तुतः भौतिकवादी दर्शन है। आचार्य बृहस्पति एवं चार्वाक इसके प्रमुख आचार्य रहे हैं। यह दर्शन आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि को स्वीकार नहीं करता है। इसके अनुसार प्रत्यक्षरूप से दिखायी देने वाला जगत् ही सब कुछ है। अतः व्यक्ति इस संसार में जब तक जीवित रहे तब तक उसे सुखपूर्वक जीने का ही प्रयास करना चाहिए। दुःखों से हमेशा दूर रहना चाहिए, क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद जला दिए जाने पर इसका पुनः इस संसार में आगमन कैसे हो सकता है?

  1. विस्तृत अध्ययन के लिए द्रष्टव्य लेखककृत भारतीयदर्शन-मूलअवधारणाएँ।
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भूमिका ३ (२) जैनदर्शन भी नास्तिकदर्शनों के अन्तर्गत ही आता है। प्रथम शती के 'उमा स्वाति' इसके प्राचीन आचार्य माने गए हैं तथा पञ्चम शती में स्थित 'सिद्धसेन दिवाकर' को जैनन्याय के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त अकलंकदेव, विद्यानन्द, प्रभासचन्द्र, हेमचन्द्र सूरि, मल्लिसेन आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य हैं। इस दर्शन में जीवन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म समस्याओं पर विचार किया गया है। इसका अनेकान्तवाद का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जो भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वस्तु के अलग-अलग रूपों की सत्यता का प्रतिपादन करता है। इस विचारधारा में कुल चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम भगवान् महावीर माने गए हैं। जैनदर्शन के अन्तर्गत तीर्थंकरों के उपदेश तथा जैन साधुओं के चरित्र को विशेष महत्ता प्रदान की गई है। इसके प्रमुखतया दो सम्प्रदाय हैं-(अ) श्वेताम्बर एवं (ब) दिगम्बर। यहाँ पञ्च परमेष्ठियों की पूजा का विधान किया गया है। जिनमें अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु आते हैं। दिगम्बरजैन साधु पूर्णतया नग्न रहते हैं तथा श्वेताम्बर श्वेतवस्त्र धारण करते हैं। इस दर्शन में अहिंसा का सर्वाधिक महत्त्व है। किसी भी प्राणी को मन, वचन अथवा कर्म द्वारा कष्ट पहुँचाना यहाँ हिंसा के अन्तर्गत माना गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुनर्जन्म, कर्म तथा स्याद्वाद के सिद्धान्तों को भी मान्यता प्रदान करता है। (३) बौद्धदर्शन भी नास्तिकदर्शन के अन्तर्गत माना गया है। इसके मुख्यतया चार सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है-(1) वैभाषिक, (2) सौत्रान्तिक, (3) विज्ञानवादी तथा (4) शून्यवादी। पालिभाषा में लिखे गए त्रिपिटक ग्रन्थों में इस दर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है। द्वितीय शती में स्थित 'नागार्जुन' इसके प्राचीन आचार्य हैं। इसके अतिरिक्त वसुबन्ध, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित, कमलशील, रत्नकीर्ति तथा ज्ञानश्री मिश्र आदि भी प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन आचार्यों द्वारा लिखे गए प्रमाण-समुच्चय, प्रमाण-वार्तिक, न्यायबिन्दु, हेतु-बिन्दु, तत्त्वसंग्रह तथा तत्त्वसंग्रहपञ्जिका इस दर्शन के आधारभूत ग्रन्थ माने गए हैं। यह दर्शन सविकल्पक ज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत स्वीकार नहीं करता है। साथ ही अवयवों से भिन्न अवयवी की सत्ता को भी नहीं मानता है। बुद्ध ने इसे जनमानस में प्रतिष्ठापित किया तथा संसार को दुःखमय मानते हुए निर्वाण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अनुसार दुःख का मूलकारण

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४ वेदान्तसार तृष्णा है। इसलिए इच्छाओं के निरोध से ही दुःख की निवृत्ति सम्भव है। सम्यग्दृष्टि, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाक्, सम्यक्कर्म, सम्यक्आजीव, सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, सम्यक्समाधि इसके प्रमुख आठ मार्ग हैं। इसके मत में निर्वाण द्वारा ही व्यक्ति पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। (ब) आस्तिकदर्शन-वेदों में आस्था प्रदर्शित करके उन्हें प्रमाणरूप में प्रस्तुत करने वाले आस्तिकदर्शनों की संख्या छः है- (१) पूर्वमीमांसा-आचार्य जैमिनी इसके प्रणेता माने गए हैं। यह वेद को स्वतः प्रमाणरूप में स्वीकार करता है। वेदसम्मत होने पर भी यह ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता है। इसके अनुसार सृष्टि अनादि एवं नित्य है। अतः इसके कर्ता के रूप में ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वैदिक क्रियाओं के सम्पादन हेतु यहाँ वैदिकदेवों की परिकल्पना को मान्यता प्रदान की गई है। कर्म एवं कर्मफल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने हेतु यहाँ अपूर्व नामक तत्त्व की मौलिक कल्पना की गई है। शबरस्वामी, प्रभाकरभट्ट, कुमारिलभट्ट एवं पार्थसारथि मिश्र इस दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। इस दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द के अतिरिक्त उपमान तथा अनुपलब्धि प्रमाणों को भी मान्यता प्रदान की गई है। यद्यपि सभी आचार्य इस सम्बन्ध में एकमत नहीं हैं। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वस्तुतः कर्मकाण्ड एवं यज्ञादि विषयक वैदिकवाक्यों की व्याख्याओं के नियमों का प्रतिपादन करना रहा है। मोक्ष हेतु यहाँ कर्म एवं ज्ञान दोनों की ही आवश्यकता बतायी गयी है। इस दर्शन के आद्यग्रन्थ जैमिनीय सूत्र में 16 अध्याय 90 अधिकरण तथा 2644 सूत्र हैं, जिन पर शबरस्वामी ने उत्कृष्टभाष्य की संरचना की। (२) उत्तरमीमांसा (वेदान्तदर्शन)- आचार्य बादरायण विरचित 'ब्रह्मसूत्र' इसका आधारग्रन्थ है। इसी का दूसरा नाम 'वेदान्तसूत्र' भी है। इस दर्शन के प्रमुख आधार उपनिषद् ग्रन्थ रहे हैं, क्योंकि उन्हीं के वाक्यों को यहाँ पद-पद पर उद्धृत किया गया है। ब्रह्म, जीव, जगत् और माया इस दर्शन के प्रमुख विवेच्य रहे हैं। ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शङ्कर का 'शारीरकभाष्य' इस दर्शन का अद्भुत ग्रन्थ माना गया है। इसमें ब्रह्मसूत्रों की अद्वैतवादी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस भाष्य के महत्त्व का इसी से

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भूमिका ५ पता चलता है कि इसपर भी अनेक विद्वान् आचार्यों द्वारा अनेक टीकाएँ एवं व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं। वाचस्पति की 'भामती टीका' इनमें विशेषरूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त श्रीहर्ष का खण्डनखण्डखाद्य, चित्सुखाचार्य की तत्त्वदीपिका, विद्यारण्यस्वामी की पञ्चदशी, विवरणप्रमेयसंग्रह, जीवन्मुक्ति- विवेक, मधुसूदन सरस्वती की अद्वैतसिद्धि, अप्ययदीक्षित का सिद्धान्त-लेश संग्रह इस दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ हैं, किन्तु सदानन्द विरचित वेदान्तसार को सरलतम होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। इस दर्शन के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत एवं शुद्धाद्वैत आदि संम्प्रदाय भी हैं। ये सभी वैष्णव-वेदान्त के नाम से जाने जाते हैं। 'प्रस्थानत्रयी' के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों के प्रमुख आधारग्रन्थ हैं। ब्रह्म एवं जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है। (३) सांख्यदर्शन-महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य हैं। पुरुष एवं प्रकृति इन दो तत्त्वों को यहाँ नित्य माना गया है। इसलिए इसे द्वैतवादी दर्शन भी कहा जाता है। पुरुष चेतन एवं प्रकाशस्वरूप है, जबकि सत्त्व, रजस् एवं तमस् की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। इसे जड़ माना गया है। पुरुष का प्रकाश जब इसपर पड़ता है तो ये तीनों गुण एक-दूसरे को दबाने लगते हैं, परिणामस्वरूप सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस क्रम में सबसे पहले महत् अर्थात् बुद्धि उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् महत् से अहंकार उत्पन्न होता है। इसी अहंकार से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण (पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ), वाक्, पाणी, पाद, पायु और उपस्थ (पञ्चकर्मेन्द्रियाँ), शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्चतन्मात्राएँ) तथा मन यह सोलह का गण उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् इन्हीं पञ्चतन्मात्राओं से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी गई है। इसप्रकार यह दर्शन कुल 25 तत्त्वों को मान्यता प्रदान करता है। इसके अनुसार इन्हीं पच्चीस तत्त्वों के सम्यक्ज्ञान से व्यक्ति को मोक्षप्राप्ति होती है। ज्ञानप्राप्ति के लिए यहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द इन तीन प्रमाणों की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। सत्कार्यवाद इस दर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। जिसके अनुसार कारण में कार्य की उपस्थिति को पहले से ही

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स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुरुष बहुत्व के सिद्धान्त को भी मान्यता प्रदान करता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार न करने के कारण इसे 'निरीश्वर सांख्य' भी कहा जाता है। तत्त्वों की संख्या को अत्यधिक महत्व प्रदान करने के कारण इसे सांख्यदर्शन कहा गया। आसुरि, पञ्चशिख, विन्ध्यवासी, जैगीषव्य, वार्षगण्य आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य माने गए हैं तथा सांख्यसूत्र, षष्टितन्त्र, अर्वाचीन सांख्यसूत्र, समाससूत्र प्रसिद्धग्रन्थ हैं, किन्तु इन सभी में सर्वाधिक लोकप्रिय ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका रही है। जिसपर गौडपादभाष्य, माठरवृत्ति, जयमंगला, युक्तिदीपिका तथा वाचस्पतिमिश्र की सांख्यतत्त्वकौमुदी आदि प्रमुख टीकाएँ लिखी गईं।¹ (४) योगदर्शन-भारतीयदर्शनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इसके प्रणेता आचार्य महर्षि पतञ्जलि रहे हैं। अतः उनके द्वारा विरचित 'योगसूत्र' इस दर्शन का आधारग्रन्थ है। इसी ग्रन्थ पर लिखा गया 'व्यासभाष्य' सर्वाधिक प्रामाणिक व्याख्याग्रन्थ माना गया है। जिसपर आचार्य वाचस्पतिमिश्र की 'तत्त्ववैशारदी' तथा आचार्य विज्ञानभिक्षु की 'योगवार्तिक' दो प्रसिद्ध टीकाएँ उपलब्ध हैं। इसके अलावा भोजवृत्ति, मणिप्रभा आदि व्याख्याग्रन्थ भी योगसूत्रों पर लिखे गए। यह दर्शन वस्तुतः सांख्य के सिद्धान्तों को ही स्वीकार करता है, अन्तर केवल इतना ही है कि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, सांख्य नहीं। इसीकारण कुछ विद्वानों ने इसे 'सेश्वर सांख्य' की संज्ञा प्रदान की है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति, ये पाँच चित्त की प्रवृत्तियाँ मानी गई हैं तथा चित्त की इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ योग के अंग माने गए हैं। इनके निरन्तर अभ्यास से चित्त की वृत्तियाँ स्वतः ही विलीन हो जाती हैं। बस इसी स्थिति में चित्त की एकाग्रता से यह दर्शन कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति स्वीकार करता है। (५) न्यायदर्शन- बुद्धि को तीक्ष्ण, परिष्कृत एवं विशद बनाने वाले तर्कप्रधान न्यायदर्शन के प्रवर्तक आचार्य गौतम माने गए हैं। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों द्वारा पदार्थ की परीक्षा करना ही न्याय है। इसके लिए 'आन्वीक्षिकी'

  1. विस्तृत अध्ययन हेतु द्रष्टव्य लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या गौडपादभाष्य सहित - प्रकाशक संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली-1998