वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ वेदान्तसार इसप्रकार दर्शनरूपी ज्ञान की इस स्रोतस्विनी का प्रवाह आदिकाल से अबाधगति से चला आ रहा है। जिसका उद्गमस्थल हमें वैदिकज्ञान के अक्षयभण्डार ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होता है। उसमें प्रयुक्त दार्शनिक सूक्त-नासदीय, पुरुष आदि तत्कालीन मानव की नैसर्गिकजिज्ञासा के परिचायक हैं। तत्पश्चात् उपनिषद्ग्रन्थों में साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों का मौलिक एवं स्वतन्त्रचिन्तन उपलब्ध होता है। इन उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ मानी गई है, जिनमें ग्यारह प्रमुख हैं। सभी भारतीय आस्तिकदर्शनों का मूल आधार ये उपनिषद् ग्रन्थ ही हैं। इनमें भी बृहदारण्यक, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य आदि दार्शनिक विषयों के प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।¹ (ग) भारतीयदर्शन एक परिचय-भारतीयदर्शनविषयक विचारधाराओं को मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-(1) आस्तिक एवं (2) नास्तिक। जिनमें वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार किया गया, उन्हें आस्तिक तथा जो वेदों को महत्ता प्रदान नहीं करते हैं उन्हें 'नास्तिक' दर्शन की संज्ञा प्रदान की गई। नास्तिक-दर्शनों के अन्तर्गत मुख्यरूप से चार्वाक, जैन और बौद्धदर्शनों की गणना की गई तथा आस्तिकदर्शनों की संख्या छः मानी गई-पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, (वेदान्त), सांख्य, योग, न्याय और वैशेषिकदर्शन। इन सभी दर्शनों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है- (अ) नास्तिकदर्शन-(क) इनमें सर्वाधिक प्राचीन चार्वाक-दर्शन माना गया है। इसीको लोकायत के नाम से भी जाना जाता है। यह वस्तुतः भौतिकवादी दर्शन है। आचार्य बृहस्पति एवं चार्वाक इसके प्रमुख आचार्य रहे हैं। यह दर्शन आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि को स्वीकार नहीं करता है। इसके अनुसार प्रत्यक्षरूप से दिखायी देने वाला जगत् ही सब कुछ है। अतः व्यक्ति इस संसार में जब तक जीवित रहे तब तक उसे सुखपूर्वक जीने का ही प्रयास करना चाहिए। दुःखों से हमेशा दूर रहना चाहिए, क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद जला दिए जाने पर इसका पुनः इस संसार में आगमन कैसे हो सकता है?
- विस्तृत अध्ययन के लिए द्रष्टव्य लेखककृत भारतीयदर्शन-मूलअवधारणाएँ।