वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३ (२) जैनदर्शन भी नास्तिकदर्शनों के अन्तर्गत ही आता है। प्रथम शती के 'उमा स्वाति' इसके प्राचीन आचार्य माने गए हैं तथा पञ्चम शती में स्थित 'सिद्धसेन दिवाकर' को जैनन्याय के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त अकलंकदेव, विद्यानन्द, प्रभासचन्द्र, हेमचन्द्र सूरि, मल्लिसेन आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य हैं। इस दर्शन में जीवन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म समस्याओं पर विचार किया गया है। इसका अनेकान्तवाद का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जो भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वस्तु के अलग-अलग रूपों की सत्यता का प्रतिपादन करता है। इस विचारधारा में कुल चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम भगवान् महावीर माने गए हैं। जैनदर्शन के अन्तर्गत तीर्थंकरों के उपदेश तथा जैन साधुओं के चरित्र को विशेष महत्ता प्रदान की गई है। इसके प्रमुखतया दो सम्प्रदाय हैं-(अ) श्वेताम्बर एवं (ब) दिगम्बर। यहाँ पञ्च परमेष्ठियों की पूजा का विधान किया गया है। जिनमें अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु आते हैं। दिगम्बरजैन साधु पूर्णतया नग्न रहते हैं तथा श्वेताम्बर श्वेतवस्त्र धारण करते हैं। इस दर्शन में अहिंसा का सर्वाधिक महत्त्व है। किसी भी प्राणी को मन, वचन अथवा कर्म द्वारा कष्ट पहुँचाना यहाँ हिंसा के अन्तर्गत माना गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुनर्जन्म, कर्म तथा स्याद्वाद के सिद्धान्तों को भी मान्यता प्रदान करता है। (३) बौद्धदर्शन भी नास्तिकदर्शन के अन्तर्गत माना गया है। इसके मुख्यतया चार सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है-(1) वैभाषिक, (2) सौत्रान्तिक, (3) विज्ञानवादी तथा (4) शून्यवादी। पालिभाषा में लिखे गए त्रिपिटक ग्रन्थों में इस दर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है। द्वितीय शती में स्थित 'नागार्जुन' इसके प्राचीन आचार्य हैं। इसके अतिरिक्त वसुबन्ध, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित, कमलशील, रत्नकीर्ति तथा ज्ञानश्री मिश्र आदि भी प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन आचार्यों द्वारा लिखे गए प्रमाण-समुच्चय, प्रमाण-वार्तिक, न्यायबिन्दु, हेतु-बिन्दु, तत्त्वसंग्रह तथा तत्त्वसंग्रहपञ्जिका इस दर्शन के आधारभूत ग्रन्थ माने गए हैं। यह दर्शन सविकल्पक ज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत स्वीकार नहीं करता है। साथ ही अवयवों से भिन्न अवयवी की सत्ता को भी नहीं मानता है। बुद्ध ने इसे जनमानस में प्रतिष्ठापित किया तथा संसार को दुःखमय मानते हुए निर्वाण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अनुसार दुःख का मूलकारण