वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ वेदान्तसार तृष्णा है। इसलिए इच्छाओं के निरोध से ही दुःख की निवृत्ति सम्भव है। सम्यग्दृष्टि, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाक्, सम्यक्कर्म, सम्यक्आजीव, सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, सम्यक्समाधि इसके प्रमुख आठ मार्ग हैं। इसके मत में निर्वाण द्वारा ही व्यक्ति पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। (ब) आस्तिकदर्शन-वेदों में आस्था प्रदर्शित करके उन्हें प्रमाणरूप में प्रस्तुत करने वाले आस्तिकदर्शनों की संख्या छः है- (१) पूर्वमीमांसा-आचार्य जैमिनी इसके प्रणेता माने गए हैं। यह वेद को स्वतः प्रमाणरूप में स्वीकार करता है। वेदसम्मत होने पर भी यह ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता है। इसके अनुसार सृष्टि अनादि एवं नित्य है। अतः इसके कर्ता के रूप में ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वैदिक क्रियाओं के सम्पादन हेतु यहाँ वैदिकदेवों की परिकल्पना को मान्यता प्रदान की गई है। कर्म एवं कर्मफल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने हेतु यहाँ अपूर्व नामक तत्त्व की मौलिक कल्पना की गई है। शबरस्वामी, प्रभाकरभट्ट, कुमारिलभट्ट एवं पार्थसारथि मिश्र इस दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। इस दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द के अतिरिक्त उपमान तथा अनुपलब्धि प्रमाणों को भी मान्यता प्रदान की गई है। यद्यपि सभी आचार्य इस सम्बन्ध में एकमत नहीं हैं। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वस्तुतः कर्मकाण्ड एवं यज्ञादि विषयक वैदिकवाक्यों की व्याख्याओं के नियमों का प्रतिपादन करना रहा है। मोक्ष हेतु यहाँ कर्म एवं ज्ञान दोनों की ही आवश्यकता बतायी गयी है। इस दर्शन के आद्यग्रन्थ जैमिनीय सूत्र में 16 अध्याय 90 अधिकरण तथा 2644 सूत्र हैं, जिन पर शबरस्वामी ने उत्कृष्टभाष्य की संरचना की। (२) उत्तरमीमांसा (वेदान्तदर्शन)- आचार्य बादरायण विरचित 'ब्रह्मसूत्र' इसका आधारग्रन्थ है। इसी का दूसरा नाम 'वेदान्तसूत्र' भी है। इस दर्शन के प्रमुख आधार उपनिषद् ग्रन्थ रहे हैं, क्योंकि उन्हीं के वाक्यों को यहाँ पद-पद पर उद्धृत किया गया है। ब्रह्म, जीव, जगत् और माया इस दर्शन के प्रमुख विवेच्य रहे हैं। ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शङ्कर का 'शारीरकभाष्य' इस दर्शन का अद्भुत ग्रन्थ माना गया है। इसमें ब्रह्मसूत्रों की अद्वैतवादी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस भाष्य के महत्त्व का इसी से