वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५ पता चलता है कि इसपर भी अनेक विद्वान् आचार्यों द्वारा अनेक टीकाएँ एवं व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं। वाचस्पति की 'भामती टीका' इनमें विशेषरूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त श्रीहर्ष का खण्डनखण्डखाद्य, चित्सुखाचार्य की तत्त्वदीपिका, विद्यारण्यस्वामी की पञ्चदशी, विवरणप्रमेयसंग्रह, जीवन्मुक्ति- विवेक, मधुसूदन सरस्वती की अद्वैतसिद्धि, अप्ययदीक्षित का सिद्धान्त-लेश संग्रह इस दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ हैं, किन्तु सदानन्द विरचित वेदान्तसार को सरलतम होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। इस दर्शन के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत एवं शुद्धाद्वैत आदि संम्प्रदाय भी हैं। ये सभी वैष्णव-वेदान्त के नाम से जाने जाते हैं। 'प्रस्थानत्रयी' के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों के प्रमुख आधारग्रन्थ हैं। ब्रह्म एवं जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है। (३) सांख्यदर्शन-महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य हैं। पुरुष एवं प्रकृति इन दो तत्त्वों को यहाँ नित्य माना गया है। इसलिए इसे द्वैतवादी दर्शन भी कहा जाता है। पुरुष चेतन एवं प्रकाशस्वरूप है, जबकि सत्त्व, रजस् एवं तमस् की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। इसे जड़ माना गया है। पुरुष का प्रकाश जब इसपर पड़ता है तो ये तीनों गुण एक-दूसरे को दबाने लगते हैं, परिणामस्वरूप सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस क्रम में सबसे पहले महत् अर्थात् बुद्धि उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् महत् से अहंकार उत्पन्न होता है। इसी अहंकार से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण (पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ), वाक्, पाणी, पाद, पायु और उपस्थ (पञ्चकर्मेन्द्रियाँ), शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्चतन्मात्राएँ) तथा मन यह सोलह का गण उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् इन्हीं पञ्चतन्मात्राओं से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी गई है। इसप्रकार यह दर्शन कुल 25 तत्त्वों को मान्यता प्रदान करता है। इसके अनुसार इन्हीं पच्चीस तत्त्वों के सम्यक्ज्ञान से व्यक्ति को मोक्षप्राप्ति होती है। ज्ञानप्राप्ति के लिए यहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द इन तीन प्रमाणों की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। सत्कार्यवाद इस दर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। जिसके अनुसार कारण में कार्य की उपस्थिति को पहले से ही