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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुरुष बहुत्व के सिद्धान्त को भी मान्यता प्रदान करता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार न करने के कारण इसे 'निरीश्वर सांख्य' भी कहा जाता है। तत्त्वों की संख्या को अत्यधिक महत्व प्रदान करने के कारण इसे सांख्यदर्शन कहा गया। आसुरि, पञ्चशिख, विन्ध्यवासी, जैगीषव्य, वार्षगण्य आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य माने गए हैं तथा सांख्यसूत्र, षष्टितन्त्र, अर्वाचीन सांख्यसूत्र, समाससूत्र प्रसिद्धग्रन्थ हैं, किन्तु इन सभी में सर्वाधिक लोकप्रिय ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका रही है। जिसपर गौडपादभाष्य, माठरवृत्ति, जयमंगला, युक्तिदीपिका तथा वाचस्पतिमिश्र की सांख्यतत्त्वकौमुदी आदि प्रमुख टीकाएँ लिखी गईं।¹ (४) योगदर्शन-भारतीयदर्शनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इसके प्रणेता आचार्य महर्षि पतञ्जलि रहे हैं। अतः उनके द्वारा विरचित 'योगसूत्र' इस दर्शन का आधारग्रन्थ है। इसी ग्रन्थ पर लिखा गया 'व्यासभाष्य' सर्वाधिक प्रामाणिक व्याख्याग्रन्थ माना गया है। जिसपर आचार्य वाचस्पतिमिश्र की 'तत्त्ववैशारदी' तथा आचार्य विज्ञानभिक्षु की 'योगवार्तिक' दो प्रसिद्ध टीकाएँ उपलब्ध हैं। इसके अलावा भोजवृत्ति, मणिप्रभा आदि व्याख्याग्रन्थ भी योगसूत्रों पर लिखे गए। यह दर्शन वस्तुतः सांख्य के सिद्धान्तों को ही स्वीकार करता है, अन्तर केवल इतना ही है कि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, सांख्य नहीं। इसीकारण कुछ विद्वानों ने इसे 'सेश्वर सांख्य' की संज्ञा प्रदान की है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति, ये पाँच चित्त की प्रवृत्तियाँ मानी गई हैं तथा चित्त की इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ योग के अंग माने गए हैं। इनके निरन्तर अभ्यास से चित्त की वृत्तियाँ स्वतः ही विलीन हो जाती हैं। बस इसी स्थिति में चित्त की एकाग्रता से यह दर्शन कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति स्वीकार करता है। (५) न्यायदर्शन- बुद्धि को तीक्ष्ण, परिष्कृत एवं विशद बनाने वाले तर्कप्रधान न्यायदर्शन के प्रवर्तक आचार्य गौतम माने गए हैं। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों द्वारा पदार्थ की परीक्षा करना ही न्याय है। इसके लिए 'आन्वीक्षिकी'

  1. विस्तृत अध्ययन हेतु द्रष्टव्य लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या गौडपादभाष्य सहित - प्रकाशक संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली-1998