वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ७ शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह पदार्थों को मान्यता प्रदान की गई है। यह दर्शन आत्मा को गुणों का आश्रय मानता है। इसके अनुसार आत्मा के जीवात्मा और परमात्मा दो भेद होते हैं तथा आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रत्यभाव, फल, दुःख तथा अपवर्ग ये सभी प्रमेय विषय हैं। यह दर्शन जगत् की सत्ता में परमाणु को समवायी तथा ईश्वर को निमित्तकारण मानता है तथा आगमप्रमाण के माध्यम से ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करता है। अन्य दर्शनों के समान ही यह जीवन का अन्तिम लक्ष्य दुःखों की हमेशा के लिए निवृत्ति मानता है। उसी को यहाँ मोक्ष माना गया है। आचार्य गौतम के अतिरिक्त गंगेश उपाध्याय, वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य, रघुनाथ शिरोमणि, मथुरानाथ, जगदीश, गदाधर भट्ट आदि उल्लेखनीय आचार्यों ने इस दर्शन के साहित्य में श्रीवृद्धि की है। इनमें भी आचार्य केशवमिश्र की तर्कभाषा को यहाँ विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई। (६) वैशेषिकदर्शन-'विशेष' नामक एक विलक्षण पदार्थ को मानने के कारण इसे वैशेषिक कहा गया। सर्वदर्शनसंग्रह में इसे 'औलूक्यं दर्शन' भी कहा गया है। तदनुसार इसके प्रणेता 'उलूक' नामक आचार्य थे। महर्षि कणाद को भी इसका प्रणेता माना जाता है। जैन लेखक राजशेखर ने न्यायकन्दली टीका में जनश्रुति के आधार पर इस सम्बन्ध में अपनी सम्मति इसप्रकार दी है- “कणाद मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर परमपिता परमात्मा ने स्वयं उलूक के रूप में अवतरित होकर उन्हें इस दर्शन के सिद्धान्तों का उपदेश दिया था। इसीलिए इसे औलूक्य दर्शन कहा जाता है।” इसके अनुसार-पृथिवी, तेज, जल, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये नौ द्रव्य हैं। इनमें पृथिवी, तेज, वायु और आकाश भौतिक हैं। आत्मा के अस्तित्व, स्वरूप, सृष्टि तथा मोक्ष के सम्बन्ध में यह दर्शन न्याय के साथ मतैक्य रखता है। इस दर्शन के सिद्धान्तों का निरूपण प्रशस्तपाद नामक ग्रन्थ में भलीप्रकार किया गया है। तत्पश्चात् उदयनाचार्य, श्रीधराचार्य,