वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ वेदान्तसार व्योमशिवाचार्य आदि प्रमुख विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण टीकाओं का भी प्रणयन किया। (घ) वेदान्तदर्शन के मूलस्रोत-वेदान्तदर्शन को भी अत्यन्त प्राचीन कहा जा सकता है, क्योंकि विश्व के सर्वाधिक प्राचीनग्रन्थ ऋग्वेद में इसके मूलस्रोत के दर्शन होते हैं। यद्यपि वहाँ यह व्यवस्थितरूप में प्रस्तुत नहीं हुआ है तथापि वहाँ इसके बीज अवश्य देखे जा सकते हैं। विश्व की संरचना एवं संचालन के लिए ब्रह्म, ईश्वर और जीव इन तीन तत्त्वों को वहां स्पष्टरूप से स्वीकार किया गया है। पुरुषसूक्त के आरम्भ में वर्णित आदिपुरुष, वेदान्त के ब्रह्म के सामर्थ्य से मेल खाता है- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ (10/90/1) इसीप्रकार आदिपुरुष से उत्पन्न विराट्पुरुष जो वेदान्त का ईश्वर है तथा उसका आश्रय लेकर उत्पन्न हुआ, पुरुष ही जीवात्मा अर्थात् वेदान्त का जीव है- तस्माद् विराळजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥ (10/90/5) इसीप्रकार- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं विश्वं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (1/164/20) यहाँ वर्णित विश्व, वेदान्त की माया तथा 'पिप्पल' उसके भोगने योग्य पदार्थ हैं। भोगने वाला पक्षी वेदान्त का 'जीव' तथा न भोगने वाला दूसरा पक्षी ईश्वर है। अतः ऋग्वेद में वेदान्त के तत्त्वों को सहज ही स्वीकार किया जा सकता है। हाँ इतना अवश्य है कि वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के समान व्यवस्थित वेदान्तसिद्धान्तों के हमें यहाँ दर्शन नहीं होते हैं, किन्तु वेदान्तदर्शन का चिन्तन वैदिकसंहिताओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों से आरम्भ हो चुका था, इतना अवश्य स्वीकार किया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि हेतु कुछ अन्य उदाहरण भी द्रष्टव्य हैं। ऋग्वेद के नासदीयसूक्त में वेदान्त की माया के रजस् एवं तमोगुण का उल्लेख हुआ है- नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् (ऋ. 10/129/1) तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे (वही-10/129/3)