वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१८० वेदान्तसार तन्तुरूप कार्य के लिए तुरी, वेमा, कपास आदि बाह्यसाधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उनके बिना ही उसके शरीर की सहायता से वह अपने जाले का निर्माण कर लेती है। ठीक उसीप्रकार एकमात्र ईश्वर भी बिना किसी बाह्यसाधन एवं सहयोग से अपनी माया नामक शक्ति द्वारा सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त सम्पूर्ण स्थूलसंसार की रचना कर डालता है। इसी बात को मुण्डकोपनिषद् इसप्रकार कहता है- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि, तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्।। (1.7) इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का की जा सकती है कि यदि ईश्वर सृष्टि का उपादानकारण है तो यह चराचरसंसार जड़ एवं नश्वर नहीं हो सकता है, क्योंकि इसका उपादान चेतन एवं अविनाशी है। इसका समाधान यह है कि यह चराचरसंसार वस्तुतः ब्रह्म का विवर्त है, परिणाम नहीं। अपने रूप का परित्याग न करके दूसरे रूप को प्रदर्शित करना ही विवर्त है। जिसप्रकार रस्सीविषयक अज्ञान रस्सी के रूप का परित्याग न करता हुआ भी सर्परूप अन्यरूप को प्रदर्शित करता है, ठीक उसीप्रकार ईश्वर चैतन्यनिष्ठ अज्ञानशक्ति भी अपने चैतन्यरूप का परित्याग न करती हुई, आकाश आदि अन्य रूपों को भी प्रदर्शित करती है। इसलिए आकाशादि प्रपञ्च, ईश्वर के उपादानकारण होने पर भी नित्य नहीं होते हैं। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में अज्ञानोपहितचैतन्य को चराचरसृष्टि का उपादान और निमित्तकारण बताया गया है। (2) अज्ञानोपहितचैतन्य के लिए वेदान्त में ईश्वर, चैतन्य एवं आत्मा आदि अनेक शब्दों का प्रयोग मिलता है। (3) लूता यहाँ मकड़ी के लिए प्रयुक्त हुआ है। मकड़ी की विशेषता है कि वह अपने द्वारा निर्मित जाले में अन्य किसी बाह्य उपादान का सहयोग नहीं लेती है। (4) अज्ञान अथवा माया को जड़ात्मक माना गया है, इसमें ब्रह्म अथवा आत्मा के कारण चैतन्य ठीक उसीप्रकार आ जाता है। जैसे-चुम्बक के समीप होने से लौहकणगति करने लगते हैं। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-