BharatKosha
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 206 of 314

Read in context
Page 206

१९२ वेदान्तसार कण्ठस्थान में रहने वाली तथा प्राण निकलने के समय ऊपर की ओर गति करने वाली वायु को उदान कहते हैं। शरीर के अन्दर खाए हुए अन्नादि तथा पीये हुए जलादि को पचाने वाली वायु ही वस्तुतः 'समान' है, क्योंकि यह भक्ष्य एवं पेय पदार्थों का समानीकरण (पचाना) रूप कार्य सम्पादित करती है। पञ्चवायुओं के कथन के प्रसङ्ग में ही ग्रन्थकार सांख्यमत के अनुसार बतायी गयी नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय नामक अन्य पाँच वायुओं का उल्लेख, उनका कार्य बताते हुए 'केचित्' इत्यादि कहकर करते हैं। तदनुसार-छींक लाने वाली अथवा वमन कराने वाली वायु 'नाग' है। कूर्म नामक वायु पलकों को झपकाकर नेत्रों के मीलन एवं उन्मीलनरूप कार्य को करती है। कृकल नामक वायु क्षुधा को बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त जम्भाईं लाने का कार्य देवदत्त नामक वायु द्वारा किया जाता है। जबकि धनञ्जय नामक वायु द्वारा शरीर को पुष्ट किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्री इन अतिरिक्त पाँच वायुओं का अन्तर्भाव पूर्वकथित वायुओं में ही इसप्रकार करके इन्हें अलग से मान्यता प्रदान नहीं करते हैं-उद्‌गिरण का कार्य उदान नामक वायु द्वारा ही सम्पादित करने से 'नाग' नामक वायु की पृथक् से मानने की आवश्यकता नहीं है। इसीप्रकार अंग विशेष के संकोच-विकोचरूपी उन्मीलन का कार्य व्यान द्वारा कर दिये जाने से 'कूर्म' की पृथक् मान्यता उचित नहीं है। अन्नादि का समीकरण करने वाली समान वायु में भूख को बढ़ाने वाली कृकल नामक वायु का अन्तर्भाव हो जाता है। इसीप्रकार जृम्भण आदि की कारणभूत देवदत्त नामक वायु का, विकृत वायु को निकालने की हेतुरूप अपान में एवं पोषण करने वाली धनञ्जय नामक वायु का 'समान' में सहज ही अन्तर्भाव हो जाने से इनको पृथक्रूप में मानना न्यायसंगत नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में 'प्राणमयकोश' का कथन किया गया है। (2) पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति उनमें क्रियाशीलता की प्रधानता के कारण सूक्ष्म आकाशादिभूतों के रजोंऽश से क्रमशः पृथक्-पृथक् बतायी गई है, जबकि पञ्चवायु को इन्हीं सूक्ष्मभूतों के मिश्रित रजोंऽशों से उत्पन्न बताया है, क्योंकि रजोगुण क्रियाशील माना गया है-उपष्टम्भं चलं च रजः (सांख्यकारिका)