वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसूक्ष्मशरीर निरूपण १९७ वासनायुक्त होने से 'स्वप्न', इसीलिए स्थूलप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कही जाती है। व्यष्टिरूप उपाधि से युक्त यह चैतन्य, तेजोयुक्त अन्तःकरण उपाधि से युक्त होने से 'तैजस्' होता है। इसकी भी यह व्यष्टि स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने रूपकारण से ही सूक्ष्मशरीर, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, एवं जाग्रत अवस्था में वासनायुक्त होने से स्वप्न, अतएव स्थूलशरीर का लयस्थान इस रूप में भी कहलाता है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों उससमय (भी) मनोवृत्तियों द्वारा सूक्ष्मविषयों का अनुभव करते हैं। "सूक्ष्मभोग करने वाला तैजस् है" इत्यादि श्रुति का वचन (इसमें प्रमाण है।) यहाँ भी समष्टिव्यष्टि एवं उनकी उपाधि से युक्त - सूत्रात्मा तथा तैजस् दोनों में वन और वृक्ष, उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय एवं जल तथा उसमें प्रतिबिम्बित आकाश के समान अभेद ही है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति होती है। 'चन्द्रिका'-पूर्ववर्णित समष्टि एवं व्यष्टि के समान यहाँ भी सम्पूर्ण चराचरजगत् के अनन्तसंख्या वाले सूक्ष्मशरीरों को जब एक मानकर व्यवहार करते हैं, तो एकत्व की विवक्षा में वे सब एक बुद्धि का विषय होने के कारण वन अथवा जलाशय के समान 'समष्टि' इस रूप में व्यवहृत होते हैं तथा उनको ही जब हम अलग-अलग अनेक मानकर व्यवहार करते हैं तो अनेक जीवों के स्व-स्व बुद्धि का विषय होने के कारण ये वृक्ष अथवा जल के समान 'व्यष्टि' इस पद द्वारा व्यवहृत होते हैं। सूक्ष्मशरीरों की इस समष्टि से युक्त चैतन्यात्मा सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से युक्त होने के कारण क्रमशः सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ तथा प्राण कहा जाता है, क्योंकि विज्ञानमयकोश ज्ञान का, मनोमयकोश इच्छाशक्ति का तथा प्राणमयकोश क्रियाशक्ति का प्रतीक है। इन सबमें चैतन्यात्मा माला में सूत्र के समान विद्यमान रहता है, इसीलिए इसे सूत्रात्मा कहा जाता है। सूत्रात्मा एवं हिरण्यगर्भ की यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होती है। इसीलिए सूक्ष्मशरीर भी कहलाती है। इसके अतिरिक्त इस समष्टि में विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय तीन कोश होने से 'कोशत्रय' तथा विराट्रूप में अनुभव की गई स्थूलप्रपञ्च से सम्बन्धित वासना से युक्त होने के कारण 'स्वप्न' कहलाती है, क्योंकि चैतन्य स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत दैनिक व्यवहार में जिस-जिसप्रकार की अनुभूति करता है वे सभी भाव वासनारूप