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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०९ इसके अलावा उन्हीं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की व्यष्टि से उपहित चैतन्य यहाँ ‘विश्व’ कहलाता है। इसका भी मुख्यकारण यही है कि इन अलग-अलग स्थूलशरीरों में रहता हुआ भी वह अपने-अपने सूक्ष्मशरीर के प्रति ‘मैं’ रूप अभिमान को धारण किए हुए, प्रत्येक स्थूलशरीर में विद्यमान रहता है। अज्ञान की यह व्यष्टि भी समष्टि के समान ही ‘स्थूलशरीर’, माता-पिता द्वारा खाए हुए अन्न का विकार होने के कारण ‘अन्नमय’, आत्मा अथवा चैतन्य का आच्छादक होने से ‘कोश तथा सुखदुःख आदि के भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा उस-उसके विषयों का भोग करने के कारण ‘जाग्रत्’ इन नामों से व्यवहृत होता है। प्रस्तुत गद्यखण्ड के इतने अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझाया जा सकता है- चित्र-४३ चतुर्विध स्थूलशरीर की समष्टि व्यष्टि एकत्व विवक्षा अनेकत्व विवक्षा समष्टि वन अभेद वृक्ष व्यष्टि चैतन्य जलाशय जल चैतन्य वैश्वानर (विराट्) तदवच्छिन्नाकाश विश्व समस्त प्राणियों के विविधरूप में सम्पूर्ण शरीरों में प्रविष्ट होकर मैं इस अभिमान से युक्त स्थूल शरीर अन्नमय कोश जाग्रत (सुख-दुःख के भोग (माता-पिता द्वारा (आत्मा का आच्छादक (इन्द्रियों द्वारा विषयों का आधार) खाए गए अन्न होने से) का भोग करने से) से उत्पन्न होने से) इसप्रकार स्थूलशरीरों की समष्टिव्यष्टि का कथन करने के पश्चात् पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तरिन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवताओं का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार उनके कार्यों का विस्तारपूर्वक कथन करते हैं-