विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी
Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)
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Read in context( ९ ) २. नवात्मा नेत्रतन्त्र में नवात्म मन्त्रराज (मृत्युंजय भट्टारक) को ही परम तत्त्व माना गया है। योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २५७) में भी स्वच्छन्दसंग्रह नामक ग्रन्थ के प्रमाण पर नवात्म मन्त्र का उद्धार किया गया है। तन्त्रालोककार (१।१११) ने और उसके टीकाकार जयरथ ने ब्राह्मी प्रभृति आठ मातृकाओं के मध्यवर्ती भैरव स्वरूप को नवात्मा बताया है। अन्यत्र १वामा प्रभृति शक्तियों के स्वरूप श्रीचक्र को नवात्मा कहा गया है। महानयप्रकाश के टीकाकार शितिकण्ठ ने श्रुति२ के वचन को उद्धृत कर नवात्मस्वरूप महार्थ (परम तत्त्व) की व्याख्या की है। दूसरे प्रश्न में इन्हीं में से किसी नवात्मस्वरूप की चर्चा माननी चाहिये। ३. त्रिशिरोभैरव त्रिशिरोभैरव तो निश्चित ही इसी नाम के तन्त्र के द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व है। इस ग्रन्थ का उल्लेख तन्त्रालोक और उसकी टीका में अनेक स्थलों पर हुआ है। ४. शक्तित्रयात्मक नर-शक्ति-शिवात्मक तत्त्वत्रय का नेत्रतन्त्र के २१वें अधिकार में वर्णन मिलता है और परा-परापरा-अपरात्मक शक्तित्रय का प्रत्यभिज्ञा दर्शन के ग्रन्थों में। परा प्रभृति शक्तियों का वर्णन तन्त्रालोक में भी मिलता है और स्वयं विज्ञानभैरव में भी। इसकी व्याख्या पृ० १२-१३ पर देखी जा सकती है। इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक अथवा मातृ-मान-मेयात्मक शक्तित्रय का प्रतिपादन त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों में मिलता है। देवी के इस चौथे प्रश्न का सम्बन्ध इन्हीं में से किसी सम्प्रदाय से हो सकता है। ५. नादबिन्दुमय पाँचवाँ प्रश्न नाद और बिन्दु के सम्बन्ध में किया गया है। प्रपंचसार, शारदातिलक, रत्नत्रय प्रभृति ग्रन्थों में नाद और बिन्दु को शिव और शक्ति से उसी तरह से अभिन्न माना गया है, जैसे कि प्रकाश और विमर्शात्मक शिव तथा शक्ति से शब्द और अर्थ को अभिन्न माना जाता है। शास्त्रों की नादरूपता के सम्बन्ध में पृ० ७ पर एक टिप्पणी दी गई है। प्रणव की १२ मात्राओं में भी बिन्दु और नाद की स्थिति है। नादभट्टारक३ और प्राणशक्ति के नदन व्यापार की भी ग्रन्थ में यथास्थान चर्चा हुई है। आगम और तन्त्र की विभिन्न शाखाओं १. द्रष्टव्य—नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ० ९१-९२। २. स एव नवात्मेति व्यवहृतः । तथा च श्रुतौ—"सावित्रनाचिकेतचातुहौंत्रिकमन्त्रोपधान- क्रमेण अधश्चिति-मध्यमचिति-उत्तमचितिभिश्च तस्य चयनस्य शिरसा अंसद्वयेन पक्षद्वयेन श्रोणिद्वयेन पुच्छेन च—इत्यष्टानां मध्यगो नवम आत्मा उपधातव्यः" (पृ० १८) । इस श्रुति का स्थल अन्वेषणीय है। ३. नादभट्टारक, मन्त्रभट्टारक, विज्ञानभैरवभट्टारक, मृत्युञ्जयभट्टारक प्रभृति में प्रयुक्त भट्टारक शब्द अतिशय आदर का सूचक है।