विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) कि इनमें से विज्ञानभैरव का वास्तविक स्वरूप क्या है ? भगवान् शिव इन सभी स्वरूपों को नकार जाते हैं । इन प्रश्नों के सामान्य स्वरूप का विश्लेषण व्याख्या में कर दिया गया है । अतः यहाँ उन प्रश्नों से संबद्ध कुछ विशिष्ट विषयों पर ही विचार किया जायगा । ऐसा प्रतीत होता है कि इन प्रश्नों के माध्यम से तत्कालीन विभिन्न आगम शास्त्रों में प्रचलित परम तत्त्व के विभिन्न स्वरूपों पर प्रकाश डाला गया है । १. शब्दराशिमय १कुलदर्शन में, जिसकी व्याख्या शाम्भव उपाय के नाम से तन्त्रालोक के तृतीय आह्निक में विस्तार से की गई है, अनुत्तर तत्त्व से ही सारी सृष्टि का उन्मेष माना गया है । अनुत्तर (अकार) तत्त्व से ही स्वर-व्यंजनात्मक मातृका की और उससे सारे जगत् की सृष्टि होती है । अकार को अकुल कहा जाता है और विसर्ग है कौलिकी शक्ति । इस कौलिकी शक्ति से और इसकी अष्ट मातृका रूप कलाओं से यह सारा जगत् व्याप्त है । यह अकुल तत्त्व शब्दब्रह्म स्वरूप है । परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के क्रम से शब्द और अर्थ के रूप में यही भासित होता है । इस प्रकार पहले प्रश्न के २शब्दराशिमय शब्द से कुल दर्शन और व्याकरण दर्शन की पार्श्व भूमि में विकसित सभी संप्रदायों का ग्रहण किया जा सकता है । गया तो उसमें वशिष्ठ को भी निमन्त्रण मिल ही गया । अलग से वशिष्ठ के नाम लेने का अभिप्राय उनकी महत्ता में है । इसी तरह से यहाँ अनच्क पद का पृथक् उल्लेख प्राण कुण्डलिनी के महत्त्व का सूचक है । १. शिवोपाध्याय ने ८९ वें श्लोक की व्याख्या (पृ० ८०-८१) में कुलदर्शन का संक्षिप्त परिचय दिया है । तदनुसार अनुत्तर अकार अकुल तत्त्व और विसर्ग कौलिकी शक्ति है। इसी को शिवबिन्दु भी कहते हैं । इस शिवबिन्दु रूप विसर्ग से ही सारे जगत् की सृष्टि होती है । इस विषय को तन्त्रालोक में ही देखना चाहिये । प्रस्तुत ग्रन्थ में ६५ और ६६ संख्या की धारणाएँ कुलदर्शन पर, विशेष कर अनुत्तर अकार पर आधृत हैं। अकार को चतुष्कल भट्टारक कहा जाता है । रौद्री, वामा, ज्येष्ठा, अम्बा ये अकार की चार कलाएँ हैं । महानयप्रकाश (पृ० २९-३०) में संकेतपद्धति के आधार पर इनका वर्णन मिलता है । संकेतपद्धति के ये श्लोक अर्थरत्नावली (पृ० ३५), योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १७०) प्रभृति अनेक ग्रन्थों में उद्धृत हैं। यहाँ (पृ० ९८) भी इसका एक श्लोक देखा जा सकता है । २. स्वच्छन्दतन्त्र (भा० १, पृ० ६) की व्याख्या में क्षेमराज ने अह् प्रत्याहार स्वरूप मातृका चक्र को भगवान् शब्दराशि के नाम से सम्बोधित किया है, क्योंकि इसी के गर्भ में सारे संसार के समस्त शास्त्र विद्यमान हैं । सभी शास्त्र इन्हीं की सहायता से प्रगट होते हैं (अकारहकारप्रत्याहारात्मा गर्भीकृताशेषविश्वसमग्रशास्त्रप्रसरप्रथमाङ्कुररूपो भगवान् शब्दराशिः) ।