विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है । इस चिदा- त्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी वास्तविक सत्ता नहीं है । यह चिदात्मक विज्ञान चींटी से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी जीवों में समान रूप से विद्यमान है । इसलिए सभी पदार्थ सर्वात्मक माने जाते हैं । व्याख्या में स्थान-स्थान पर इस सर्वात्मकता का प्रतिपादन किया गया है । नील, सुख प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर भावों में चक्षु, मन प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर इन्द्रियों के माध्यम से सर्वत्र वह विज्ञानभैरव ही, परभैरव स्वरूप परमेश्वर का चित्प्रकाश ही अभिव्यक्त होता है । यदि इसको विज्ञान (चैतन्य) से अतिरिक्त माना जाय तो इसकी चेत्यता, अर्थात् ज्ञानविषयता भी नहीं बन सकेगी, ये ज्ञान के विषय भी न हो सकेंगे । दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहे नाना प्रकार के आभास जैसे दर्पणमात्र स्वभाव हैं, दर्पण के अति- रिक्त इनकी कोई सत्ता नहीं है, दर्पण के कारण ही इनकी प्रतीति होती है, उसी तरह से प्रकाशात्मक शिव में स्थित चैतन्यमात्र स्वभाव ही यह सारा जगत् है, प्रकाशात्मक चैतन्य से अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है, चैतन्य (विज्ञान) के कारण ही यह भासित हो रहा है । जैसे घनीभूत प्रकाश ही सूर्यमंडल है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् के रूप में भासित होने लगती है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे घनीभूत (जमा हुआ) घृत अथवा हिम (बर्फ) ही पिघल कर तरल बन जाता है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् का रूप धारण कर लेती है । तरल पदार्थ जैसे घन द्रव्य से भिन्न नहीं है, उसी तरह से यह जगत् भी उस चिच्छक्ति (विज्ञानभैरव) से अतिरिक्त नहीं है । बौद्ध दर्शन के विज्ञान से यह विज्ञान इस रूप में भिन्न है कि यह क्षणिक नहीं है और न ज्ञेय-शून्य ही है, क्योंकि घट-पट प्रभृति सभी ज्ञेय पदार्थों में भाव-स्वभाव विज्ञानभैरव का स्वरूप अनुवृत्त रहता है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 'विज्ञानभैरव' पद प्रकाश-विमर्शात्मक शिव और शक्ति के सामरस्य का बोधक है । इस परमार्थ स्थिति तक पहुँचाने के लिये प्रस्तुत ग्रन्थ में ११२ धारणाओं का उपदेश किया गया है, अतः ग्रन्थ का नाम भी विज्ञानभैरव रख दिया जाय, यह सर्वथा उचित ही है । परम तत्त्व विषयक प्रश्न विज्ञानभैरव ही वस्तुतः परम तत्त्व है, इस बात को स्वीकार करके ही प्रस्तुत ग्रन्थ का आरंभ होता है। देवी का संशय भैरव के स्वरूप को लेकर उठता है कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? देवी भगवान् शिव के सामने १आठ विकल्प उपस्थित करती है और पूछती है १. 'चक्रारूढमनच्कं वा' यहाँ दो अलग-अलग विकल्प मानने पर प्रश्नों की संख्या ९ हो जाती है । किन्तु शिव ने आठ ही विकल्पों का निषेध किया है, अतः प्रश्न भी आठ ही माने जाने चाहिये । आधार कुण्डलिनी और प्राण कुण्डलिनी दोनों ही चक्रारूढ तत्त्व हैं, अतः इनको एक ही मानना उचित है । अनच्क पद से प्राण कुण्डलिनी के पृथक् उल्लेख की गतार्थता ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से की जा सकती है । ब्राह्मणों को निमन्त्रित किया