विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६ ) भीरूणामभयप्रदो भवभयाक्रन्दस्य हेतुस्ततो हृद्धाम्नि प्रथितश्च भीरवरुचामीशोऽन्तकस्यान्तकः । भीरं वायति यः स्वयोगिनिवहस्तस्य प्रभुर्भैरवो विश्वस्मिन् भरणादिकृद् विजयते विज्ञानरूपः परः ॥ अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (१।९५-१००) में बृहस्पतिपाद कृत शिवतनुशास्त्र के श्लोकों को उद्धृत कर बताया है कि इनमें अन्वर्थ नामों से भगवान् भैरव की स्तुति की गई है । 'भया सर्वं रवयति' (श्लो० १२७) इस श्लोक और उसकी व्याख्या में भी 'भैरव' पद का विश्लेषण किया गया है । इन सब का अभिप्राय यह है कि भैरव इस विश्व का भरण, रवण और वमन करने वाला है । वह इस संसार का भरण-पोषण करता है, सृष्टि और संहार करता है । ऐसा करके वह स्वयं भी पुष्ट होता है, १प्रसन्न होता है । यह संसारी जीवों को अभय-दान करने वाला है । संसारी जीवों के आक्रन्द (छटपटाहट) का कारण भी यही है और त्राहि-त्राहि पुकारने वाले भक्त जनों के हृदय में प्रकट होकर उनका उद्धार भी यही करता है, अर्थात् निग्रह और अनुग्रह ये दोनों भगवान् भैरव के ही व्यापार हैं । इसीलिये यह पंचकृत्यकारी कहलाता है । यह काल का भी काल है । इसीलिये इसको कालभैरव कहते हैं । यह कालवंचक योगियों के चित्त में समाधि दशा में स्फुरित होता है और अज्ञानी जीवों के हृदय में भी बाह्य और आन्तर इन्द्रियों (करणों) की अधिष्ठात्री देवियों (खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी) के रूप में, जो कि संविद्देवीचक्र के नाम से प्रसिद्ध हैं, प्रकट होता है । भगवान् का यह स्वरूप महाभयानक है और परम सौम्य भी । यह भैरव विज्ञानस्वरूप है, बोधात्मक है, चिदात्मक है । सभी स्थानों में, बाह्य और आन्तर सभी पदार्थों में भावस्वभाव (सत्स्वभाव) विज्ञानात्मा का भान (ज्ञान) विवेकहीन सामान्य जन को भी होता है । 'मैं जानता हूँ, मैं करता हूँ' इस तरह के अहंविमर्श की प्रतीति सभी को होती है । ये सारे विमर्श भैरवविमर्श से भिन्न नहीं हैं, इसलिये ये सारे विमर्श एक ही हैं । विज्ञानात्मा भैरव से भिन्न और कुछ भी नहीं है । घट-पट आदि के ज्ञान का कोई आधार नहीं है, क्योंकि विज्ञानभैरव से भिन्न घट-पट, चक्षु, आलोक (प्रकाश), इन्द्रिय प्रभृति की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । ये सब कुछ भ्रमात्मक हैं, माया के कारण उत्पन्न हैं, अत एव विकल्प-स्वरूप हैं, क्योंकि विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी पदार्थ की वास्तविक सत्ता नहीं है । १. जगच्चित्रं समालिख्य स्वेच्छातूलिकयात्मनि । स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान् शिवः ॥ योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ६४) में उद्धृत इस वचन में बताया गया है कि भगवान् शिव की अपनी इच्छा (स्वातन्त्र्य शक्ति) ही तूलिका है । इस तूलिका से वह इस संसार को ही अपने में चित्रित करते हैं । चित्रित करने के बाद वह स्वयं ही इसको देख कर प्रसन्न होते हैं ।