विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५ ) का प्रारम्भिक भाग माना गया है । विज्ञानभैरव को भट्ट उत्पल का परवर्ती ग्रन्थ कथमपि नहीं माना जा सकता । 'नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत' (८।४१-४४) प्रभृति नेत्रतन्त्र के और 'न सक्तमिह चेष्टासु' (उप० ६९।२-७) प्रभृति योगवाशिष्ठ के श्लोकों में विज्ञानभैरव उपदिष्ट कुछ स्थूल भावनाओं का निषेध है । इससे विज्ञानभैरव का प्रादुर्भाव इन दोनों ग्रन्थों से पहले हुआ, ऐसा कहा जा सकता है । व्याख्याकारों में से क्षेमराज के सम्बन्ध में पर्याप्त लिखा जा चुका है१ । उसको यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं है । भट्ट आनन्द और शिवोपाध्याय भी कश्मीर के ही निवासी हैं । इनके संबन्ध में कुछ अधिक ज्ञात नहीं होता । भट्ट आनन्द ने अपनी टीका के २अन्त में (पृ० ६३) ग्रन्थ की समाप्ति का काल कलि संवत् ४७७४ की चैत्र प्रतिपदा बताया है । सं० २०३४ के आरंभ में कलियुग के ५०७८ वर्ष बीत चुके हैं । तदनुसार भट्ट आनन्द ने आज से ३०४ वर्ष पूर्व, अर्थात् वि० १७३० में अपनी टीका समाप्त की थी । इस तरह से ई० १७वीं शताब्दी के अन्तिम भाग में उनकी स्थिति माननी चाहिये । शिवोपाध्याय की स्थिति अठारहवीं शताब्दी में३ मानी गई गई है । ये कौशिक गोत्र के थे और सुन्दरकण्ठ४ के शिष्य थे । कश्मीर५ के राजा सुखजीवन के राज्यकाल में इन्होंने इस व्याख्या को पूरा किया था । इसके अतिरिक्त इनके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं । जैसे कि— परमार्थसारसंग्रहटीका, बहुरूपगर्भटीका, उपनयनतन्त्र, विद्यामन्त्रप्रकरण, पञ्चायतनपद्धति, कूष्माण्डभाष्य, उच्चिवाहविवृतितन्त्र । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रवेश सूचियों में हमें ये नाम उपलब्ध हुए हैं । इनकी परीक्षा अपेक्षित है ।
विज्ञानभैरव क्या है ?
यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यह विज्ञानभैरव क्या है ? इस ग्रन्थ का यह नाम क्यों रखा गया ? क्षेमराज के विज्ञानोद्योत के मंगल श्लोक में इनका उत्तर मिलता है । वहाँ विज्ञानभैरव का स्वरूप इस तरह से बताया गया है— १. इस प्रसंग में लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग उपोद्घात (पृ० ७, टि० २) देखिये । २. वेदसप्तर्षिवेदान्त्ययुगाब्दमधुपक्षतौ । विज्ञानकौमुदीमेतां भट्टानन्दो व्यफासयत् ॥ ३. द्रष्टव्य—श्रीजगदीशचन्द्र चटर्जी कृत काश्मीर शैविज्म, पृ० ३८, सन् १९६२ संस्करण । ४. द्रष्टव्य—शिवोपाध्याय कृत विवृति, पृ० १४३-१४४ । ५. सुखजीवनाभिधाने रक्षति काश्मीरमण्डले नृपतौ । अगमन्निःशेषत्वं विज्ञानोद्योतसंग्रहः सुगमः ॥ (पृ० १४४)