विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) (श्लोक १३६) प्रभृति श्लोक में धारणाओं की संख्या ११२ बताई गई है। यह निश्चित संख्या भट्ट आनन्द की व्याख्या के अनुसार ही पूरी होती है। शिवोपाध्याय की व्याख्या में इनकी संख्या बढ़ गई है। अतः प्रस्तुत संस्करण में उक्त तीनों श्लोकों का समावेश नहीं किया गया है। इस तरह से यहां श्लोकों की संख्या १६० ही होनी चाहिये, किन्तु हैं १६१ श्लोक। इसका कारण यह है कि १५३वें श्लोक में 'सकारण' इस पंक्ति का समावेश क्षेमराज द्वारा शिवसूत्रविमर्शनी में उद्धृत वचन के अनुसार किया गया है। श्लोकों का क्रम भी उस उद्धरण के अनुसार ही रखा गया है। इन सभी छोटी-मोटी बातों का विवरण पाठ-संकलन वाली टिप्पणियों में देखना चाहिये। ग्रन्थ और व्याख्याकारों का काल विज्ञानभैरव प्रश्न-प्रतिवचनात्मक शैली में लिखा गया एक आगम ग्रन्थ है¹। प्रश्न देवी अथवा भैरवी करती है और उसका उत्तर भगवान् भैरव देते हैं। इस तरह से इस ग्रन्थ का प्रादुर्भाव रुद्रयामल भाव से, शिव और शक्ति के सामरस्य से होता है। प्रथम श्लोक की व्याख्या में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। ग्रन्थ के अन्तिम श्लोक के अनुसार इसमें रुद्रयामल तन्त्र का सार संगृहीत है। रुद्रयामल तन्त्र का प्राचीन स्वरूप आज उपलब्ध नहीं है, अतः उसके प्रादुर्भाव के काल के सम्बन्ध में हम कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। विज्ञान- भैरव का प्राचीनतम उल्लेख वामननाथ के अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक में मिलता है। संवित्प्रकाश आदि ग्रन्थों के रचयिता वामनदत्त और वामननाथ अभिन्न व्यक्ति हैं। इनके सम्बन्ध में हम लुप्तागमसंग्रह के द्वितीय भाग के ²उपोद्घात में विस्तार से विचार करेंगे। ³‘काश्मीरेतिहास:’ नामक ग्रन्थ की समालोचना में हमने बताया है कि कश्मीर के प्रसिद्ध आलंकारिक आचार्य तन्त्रशास्त्र के भी मर्मज्ञ विद्वान् रहे हैं। उसी परम्परा को यदि स्वीकार किया जाय तो हम आलंकारिक वामन को अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ से अभिन्न मान सकते हैं। आलंकारिक वामनाचार्य को कश्मीर के राजा जयापीड (७७९-८१३ ई०) के मन्त्री वामन से अभिन्न माना जाता है। अद्वयसम्पत्तिकार को भी उनसे अभिन्न मान लेने पर ई० आठवीं शताब्दी के अन्त तक विज्ञानभैरव का प्रादुर्भाव हो चुका था, ऐसा मान लेने में कोई बाधा नहीं प्रतीत होती। आधुनिक इतिहासज्ञ कश्मीर के आगम ग्रन्थों के आविर्भाव का काल ई० सातवीं- आठवीं शताब्दी में ही मानते हैं। ‘जल्स्येवोर्मयः’ (श्लो० १०८) इत्यादि श्लोक की व्याख्या में शिवोपाध्याय ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका के आधार पर विज्ञानभैरव की दो धारणाओं की रचना की बात कही है। इस कथन का खण्डन हम वहीं कर चुके हैं। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के रचयिता भट्ट उत्पल हैं। इनका समय ई० नवीं शताब्दी का अन्तिम भाग और दसवीं शताब्दी १. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की मातृकाओं (पृ० २२०, ७६६) में सिद्धयोगीश्वर इस ग्रन्थ के प्रवक्ता माने गये हैं। २. यह उपोद्घात अब प्रकाशित हो चुका है। पृ० ६५-६६ देखिये। ३. द्रष्टव्य—सारस्वती सुषमा, व० २८, अ० १, पृ० ७२-७३, संवत् २०३०।