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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

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विज्ञानभैरव : १६७ प्राण: 'स:' इत्येवंरूप: प्रकाशो व्रजेत् बहिर्नि:सरेत्, जीव: 'अहम्' इत्येवं प्रकार: क्षपारूपोऽपानो विशेत् अन्तः पुनः प्रविशेत् । प्राणस्य बहिर्निःसरणेऽपानस्यान्तःप्रवेशने च जीवात्मता संभवतीति संभावनायां लिङ् । अपानस्य प्रत्यावृत्त्यान्तःप्रवेशाभावे जीव एव न स्यादित्यपानदशैव जीवप्रादुर्भाव इत्यतो विशेज्जीव इत्युक्तम् । जीवस्य प्राणा- न्तर्वर्तित्वात् प्राणस्य हकारलिपिवत् कुटिलाकृतित्वाज्जीवोऽपि कुटिल इति इच्छाया कुटिलाकृतिरित्युक्तम् । वक्रत्वमपि तस्य स्वतन्त्रपरमेश्वरेच्छयैवेति भावः । कुण्डलिन्या अधोमुख्याः सार्धत्रिवलयाकारत्वात् तदन्तःस्था प्राणशक्तिरपि कुटिला । सा महादेवी महदम्बरैकप्रकाशस्वरूपा संविद्गगनचरी प्रमातृप्रमेयप्रमाणपथगामिनी, दीर्घात्मा वितताकृतिर्भवति । सैव परं क्षेत्रं सर्वपाशानां क्षपणात् सर्वस्य त्राणात् तीर्थभूमिर्वा सा, न तु कुरुक्षेत्रादि क्षेत्रम् । इयमेव देवी परापरा भेदाभेदात्मकतयाऽहमिति प्राधान्येन इदमिति गुणीकारेणार्थतस्तच्छब्दास्मच्छब्दयोरभेदः, तत्तया मत्तया निर्देशेन भेदश्चेति परापरात्वम् ॥१५१॥ 'ऊर्ध्वे प्राण' (श्लो० २४) इस श्लोक में सकार-हकार (सोऽहम्) जपात्मक हंस गायत्री (परा देवी) के स्वरूप का प्रारंभिक वर्णन किया गया था । मध्य में 'होच्चारं मनसा कुर्वन्' (श्लो० ८०) इस श्लोक में पुनः उसका उल्लेख हुआ । अब यहाँ उपसंहार में पुन उसका प्रतिपादन किया जा रहा है । वस्तुतः उक्त ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में भैरव ओर भैरवी के सामरस्यमय परा देवी के पारमार्थिक स्वरूप का ही विवेचन किया गया है । किन्तु इन तीन श्लोकों में विशेष रूप से उस स्वरूप का विवेचन मिलता है, जो कि सहज अजपाजप के नाम से प्रसिद्ध है । हंस गायत्री में विद्यमान सकार प्राण ओर प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है, तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का । सभी प्राणियों के अनुभव के आधार पर यह बात सिद्ध है कि प्राण (सकार) की गति स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर तथा अपान (हकार) की गति निरन्तर भीतर की ओर चलती रहती है । अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में प्रविष्ट होता है, तभी यह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है । अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायगा । अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय । व्रजेत् और विशेत् में संभावना में लिङ् लकार का प्रयोग किया गया है, विधि में नहीं । प्राण और अपान की गति कब तक चलती रहेगी, इस संबन्ध में किसी नियम का विधान नहीं किया जा सकता, केवल संभावना ही व्यक्त की जा सकती है । जीव अर्थात् अपान निरन्तर प्राण का अनुवर्तन करता रहता है, अर्थात् जब तक शरीर जीवित है, यह अवश्यंभावी है कि प्राण के निःसरण के बाद अपान का प्रवेश हो । जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति हकार की लिखावट की तरह टेढी-मेढी होती है, अतः यह जीव भी अपनी इच्छा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेता है । जीव की यह वक्रता (कुटिलता=घुमावदार