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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

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१६८ : विज्ञानभैरव आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इ च्छा शक्ति का ही खेल है। मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी साढ़े तीन आटे मार कर बैठी रहती है, अतः उसमें रहने वाली यह प्राण शक्ति भी कुटिल आकार की हो जाती है। इस प्राण शक्ति के भीतर विद्यमान जीव बाल (केश) के अग्रभाग सोवें हिस्से के समान परम सूक्ष्म है। उसकी कोई आकृति नहीं है, किन्तु जीव के आधारभूत इस प्राण की वक्रता के कारण आधेय जीव में भी औपाधिक वक्रता मान ली जाती है । वास्तव में जीव कुटिल नहीं है, प्राण ही कुटिल है। "प्राक् संवित् प्राणे परिणता" कल्लट के इस वचन के अनुसार हृदय रूपी आकाश में संवित् का प्रवेश होते ही जीव दशा उत्पन्न होती है। पूर्णाहन्ता का विमर्श करने वाली संवित् से परिमित देह आदि में आत्मा का अभिमान करने वाली जीव दशा का आविर्भाव होता है, जैसे कि महाकाश से घटाकाश की उत्पत्ति होती है। प्राणशक्ति का एक लपेटा वाम नाडी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है। इस तरह से उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं। सुषुम्ना नाम की मध्य नाडी सार्ध कहलाती है, क्योंकि इसमें प्राण जब हृदयाकाश से ऊपर की ओर चढ़ता है, तब 'हम्' वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उत- रता है, तो उसकी अपान दशा से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दो वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करते रहने से ही जीव 'जीवित' कहलाता है। जैसा कि आगे (१५३ श्लो०) बताया जायगा कि जीव सदा 'हंस-हंस' इस मन्त्र का जप करता रहता है। इस मन्त्र का जप जीव ही करता है, परमेश्वर नहीं, क्योंकि परिमित अहन्ता का संपर्क जीव दशा में ही रहता है। ईश्वर दशा में तो पूर्णाहन्ता रहती है, अतः वहाँ 'मैं वह हूँ, वह मैं हूँ, मैं यह हूँ' इस तरह के विमर्श नहीं रहते। यह त्याज्य है, यह उपादेय है, यह मेरा है, यह मेरा नहीं है—इस तरह से छोड़ने और लेने के प्राण और अपान के धर्मों से समानता होने के कारण 1 जीव 'हंस' कहलाता है। इस तरह से सूर्य की किरणों के फैलने पर दिन के प्रकाश की तरह चित्(संवित्)सूर्य के हृदयाकाश में उदित होने पर प्राण का प्रकाश जगमगाने लगता है। चित्सूर्य की किरणें जब . सिमटती हैं, तो यह अपान दशा रात्रि कहलाती है। हृदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संवित् ह और स, ,धर्म और अधर्म, दीर्घ और ह्रस्व, दिन और रात, अग्नि और सोम—इन सबको उत्पन्न करने वाली है, जो कि शून्य की भी विश्राम स्थली है। उसी को इस विज्ञानभैरव तन्त्र में 'परा देवी' कहा गया है। 'दीर्घात्मा''''परापरा' इस श्लोकार्ध में उसी का स्वरूप बताया गया है। यह महादेवी महाकाश को भी प्रकाशित करने वाली है, सदा बोधगगन में बिहार करती रहती है और साथ ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण व्यवहार को भी चलाती है। यही स और ह इन दोनों वर्णों को

  1. हान (त्याग) और उपादान (परिग्रह), छोड़ना और लेना—इन दोनों व्यापारों में हंस और जीव की समानता है। हंस जैसे दूध पी जाता है और पानी को छोड़ देता है, उसी तरह से जीव में भी प्राण और अपान का हान और उपादान व्यापार निरन्तर चलता रहता है। इसी समानता के आधार पर जीव को हंस कहा जाता है।