विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context१२ विनय-पत्रिका अकल, निरुपाधि, निर्गुन, निरंजन ब्रह्म, कर्म-पथमेकमज निर्विकारं। अखिल विग्रह, उग्ररूप, सिव, भूप सुर, सर्वगत, सर्व, सर्वोपकारं ॥७॥ ज्ञान-वैराग्य धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य सिव सानुकूलं। तदपि नर मूढ़ आरूढ़ संसार-पथ, भ्रमत भव विमुख तव पाद मूलं॥८॥ नष्टमति, दुष्ट अति, कष्ट-रत खेद-गत, दास तुलसी संभु सरन आया। देहि कामारि ! श्रीरामपदपंकजे, भक्ति अनवरत गत भेद माया ॥९॥ शब्दार्थ-मम = मेरा। लोकाभिरामं = समूचे संसारको प्रसन्न करनेवाले। बाल ससि = द्वितीयाके चन्द्रमा। कम्बु = शंख। कुन्देन्दु = कुन्द+इन्दु। विग्रह = शरीर। रुचिर = सुन्दर। ब्याल = सर्प। मौलि = मस्तक। पूत = पवित्र किया हुआ। तज्ञ = ब्रह्मस्वरूपको जाननेवाले। भवदंघ्रि = आपके चरणोंकी। भावार्थ-हे हर, हे रुद्र, हे शंकर ! आप शरणागतजनोंके मोहान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्य-स्वरूप हैं। इसलिए हे लोकाभिराम, मेरे शोकको आप दूर कीजिये। आपके ललाटपर दूजके बाल-चन्द्र हैं, आपकी बड़ी-बड़ी आँखें कमलके समान हैं। आप करोड़ों कामदेवके समान सुन्दरताके घर हैं ॥१॥ आपका सुन्दर शरीर शंख, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान है। आपके शरीर- में करोड़ों मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेज विराजमान है। आप अंग-प्रत्यंगमें भस्म लगाये रहते हैं और आपके आधे शरीरमें हिमाचल-कन्या पार्वती सुशोभित हैं। आपके गलेमें सर्पों और नर-मुण्डोंकी माला विराजमान है ॥२॥ मस्तकपर जटा-जूटका मुकुट है, उसपर विष्णु भगवान्के चरणोंसे पवित्र हुई गंगाजीकी छटा बिजलीके समान चमक रही है। कानोंमें कुण्डल और कण्ठमें हलाहल विष धारण करनेवाले करुणाकन्द, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप अवधूत भगवान् शंकरजी, मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥३॥ आपके हाथमें त्रिशूल, बाण, धनुष और तलवार है। शत्रु-रूपी वनको जलानेके लिए आप अग्निस্বরূপ हैं; बैल ही आपकी सवारी है। बाघ और हाथीका चमड़ा आपका वस्त्र है। आप ब्रह्मज्ञानकी वर्षा करनेवाले मेघ हैं। सिद्ध, देवता, मुनि, मनुष्यसे आप सेवित हैं ॥४॥ तांडव नृत्यपर आप डमरू बजाते हैं। उसकी आवाज डिम-डिम-डिम- डिम होती है। (उसीसे व्याकरणके चौदहो सूत्र निकले हैं) आप अशुभके समान जान पड़ते हैं; पर हैं कल्याणमूर्ति। महाप्रलयके समय आप समूचे-