विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
प्रस्तावना एवं मंगलाचरण
ज्ञानमण्डल ग्रन्थमालाका ९८वाँ ग्रन्थ देवदीपिकाटीकासमलंकृता विनय-पत्रिका महाकवि गोस्वामी तुलसीदासकृत देवनारायण द्विवेदी वाराणसी ज्ञानमण्डल लिमिटेड
मूल्य : ६ रुपये द्वितीय संस्करण, संवत् २०११
© ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, १९६२ प्रकाशक—ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी-१ मुद्रक—ओमप्रकाश कपूर, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी (बनारस) ५८३८-१८
द्वितीय संस्करणके सम्बन्धमें 'विनयपत्रिका'का द्वितीय संस्करण पाठकोंके समक्ष उपस्थित है । आचार्य विनोबा भावेको यह टीका बहुत पसन्द आयी थी । इसका प्रथम संस्करण जिन परिस्थितियोंमें प्रकाशित हुआ था, उसमें त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक था । इस संस्करणमें उन्हें दूर करने की पूरी चेष्टा की गयी है । इसके सिवा अनेक स्थलोंपर जहाँ भाव समझनेमें जरा भी संशय या कठिनाई मालूम होती थी, उचित परिष्कार कर दिया गया है । इस कार्यमें हमें श्री शारदाशङ्कर द्विवेदीसे यथेष्ट सहायता मिली है । एतदर्थ वह धन्यवादके पात्र हैं । इस संस्करणमें कठिन शब्दोंके अर्थ भी बढ़ा दिये गये हैं जिनसे पुस्तककी उपयोगिता बहुत बढ़ गयी है । पहले संस्करणमें इस पुस्तकका यथेष्ट प्रचार नहीं किया जा सका, अन्यथा अबतक इसके कई संस्करण हो चुके होते । हमें पूर्ण विश्वास है कि भक्तजन इस द्वितीय संस्करणका समुचित आदर करेंगे । भाद्रपूर्णिमा, } सं० २०१ ९ विक्रमी । } देवनारायण द्विवेदी
वास्तवमें काव्य व्याख्या या परिभाषाका विषय नहीं, उसका सच्चा आनन्द तो केवल उसके रसास्वादन द्वारा ही लिया जा सकता है; क्योंकि काव्यकी व्याख्या ही है 'रसात्मकं वाक्यं काव्यम्' । जब कविके अन्तस्तलमें भावनाओं, कल्पनाओं और अनुभूतियोंकी सच्ची छाप पड़ती है, तो उसके हृदयस्थ भाव काव्यके रूपमें स्वतः बहिर्गत होने लगते हैं। उनमें जीवनके जटिल रहस्योंका एक ऐसा मार्मिक उद्घाटन होता है जो काव्य-रसिकोंको एकबारगी तन्मनस्क कर देता है। ऐसा काव्यानन्द लेते समय सुरसिक और सच्चे प्रेमी जनोंकी वास्तवमें 'गिरा अनयन नयन बिनु बानी' वाली हालत हो जाती है। फिर उसकी परिभाषा कैसे सम्भव है ? उसके लिए तो केवल हार्दिक सरसता और गम्भीरता ही चाहिये । काव्य कविकी अन्तरात्माकी पुकार है, उसके जीवनकी कमनीय अनुभूतियोंका जीता-जागता इतिहास है, उसकी हृत्तन्त्रीकी झंकार है, जिससे प्रकृतिका रोम-रोम चिर-मुखरित है । कविकी अमर वाणीमें वह संगीत निहित है, जो हमारी अनुरागात्मिका वृत्तिका सम्बन्ध नैसर्गिक जगत्के कण- कणसे जोड़ना चाहता है। वास्तवमें काव्य कविकी मनोरम भावनाओंका साकार स्वरूप है । ऐसी दशामें यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है कि किसी भी कविके काव्य- मय भावोंको वे ही पाठक समझ सकते हैं जिनका भाव उस कविके भावोंका चुम्बन करता हुआ अत्यन्त शान्त और गम्भीर गतिसे क्रमशः आगे बढ़ता जाता है। स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि किसी कविके काव्यमय भावोंको समझनेके लिए अधिक नहीं तो कमसे कम उस कविके समान पाठकका भी भावुक होना नितान्त आवश्यक है— भले ही पाण्डित्य वैसा न हो । यही कारण है कि हम उच्च कवियोंकी दूरकी उड़ानतक नहीं पहुँच पाते और नीचे ही डैने फड़फड़ाते रह जाते हैं। ठीक यही बात भक्त-भ्रमरोंके लिए अपने कृति कुंजमें भाव-कंज-कलिकाओंमें
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भक्ति-मकरन्द प्रस्त्रावित करनेवाले हिन्दीके अमर कवि-कुल-चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज-रचित 'विनय-पत्रिका' के सम्बन्धमें कही जा सकती है । उक्त ग्रन्थ गोस्वामीजीकी बुद्धिकी परिपक्वावस्थाका रचा हुआ कहा जाता है । इसके अधिकांश पद इतने गहन और गम्भीर हैं कि मनन ही करते बनता है। आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्लने ठीक ही लिखा है कि--भक्ति रसका पूर्ण परिपाक जैसा विनय-पत्रिकामें है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। इसमें प्रगाढ़ प्रेम, आलम्बनके महत्त्व और अपने दैन्यके अनुभवका ऐसा स्वच्छ शब्द-स्रोत निकला है कि उसमें अवगाहन करनेसे हृदय स्वाभाविक ही निर्मल हो जाता है । अनन्त शक्ति, शील और सौन्दर्यपर आकृष्ट होकर भक्त ज्यों-ज्यों भगवान्के महत्त्वका सान्निध्य प्राप्त करता जाता है त्यों-त्यों उसके भाव महत्त्वकी ओर बढ़ते जाते हैं और महत्त्व भी उसके निकट आने लगता है; अन्तमें लघुत्त्वका महत्त्वमें लय हो जाता है । महत्त्वकी अनुभूतिसे ही भक्तको प्रभुके महत्त्वके सामने अपने दैन्य अर्थात् लघुत्वका अनुभव होने लगता है। यही कारण है कि वह जिस प्रकार भगवान्का महत्त्व वर्णन करनेमें गद्गद होता है, उसी प्रकार उससे अपनी लघुताका वर्णन किये बिना भी रहा नहीं जाता । यह उस अनन्त शक्तिका प्रभाव है कि उसके समक्ष भक्तको अपनी तुच्छताका स्पष्ट चित्र दिखाई पड़ने लगता है। इस अवस्थाके पद इस ग्रन्थमें भरे पड़े हैं। उनमें यथार्थतः बनावट नहीं, सत्यता है । इस ग्रन्थकी क्लिष्टताके सम्बन्धमें संसारके प्रसिद्ध विदेशी विद्वान् डाक्टर सर जी० ए० ग्रियर्सनने भी कहा है:--"विनय-पत्रिका कविके स्तुत्य ग्रन्थोंमेंसे एक है, पर भाषाकी क्लिष्टताके कारण बहुतसे पढ़नेवाले इसको पढ़नेका साहस नहीं करते।" इस ग्रन्थके बहुतसे पदोंका तो ठीक-ठीक अर्थ लिखनेके लिए शब्द ही नहीं मिलते। इसीसे यह बात सर्वमान्य है कि मनोगत भावोंको व्यक्त करनेकी शक्ति शब्दोंमें नहीं है। यहाँपर स्वाभाविक ही यह प्रश्न उठ सकता है कि जब कविके काव्यगत भाव शब्दों द्वारा व्यक्त किये ही नहीं जा सकते, तो फिर काव्य-ग्रन्थोंपर टीका लिखनेकी क्या आवश्यकता ? बात यह है कि टीका सब भावोंको ठीक-ठीक व्यक्त करनेमें असमर्थ होनेपर भी पाठकोंको असली अर्थतक पहुँचानेके लिए
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पूरा सहारा देती है। इसी उद्देश्यसे टीका लिखी भी जाती है। यही अभिप्राय प्रस्तुत टीकाका भी है; क्योंकि यह तो मैं भली भाँति जानता था कि एक तो वैसा महान् एवं भक्ति-रसमें रँगा हुआ हृदय नहीं है, दूसरे काव्य व्याख्या या परिभाषाका विषय भी नहीं है। इस अवस्थामें मुझे कहाँतक सफलता मिल सकती है, यह बिलकुल स्पष्ट है। विनय-पत्रिकापर कई उत्कृष्ट टीकाएँ निकल चुकी हैं। उनमें कुछ तो प्राचीन ढंगकी हैं और कुछ नवीन। प्राचीन टीकाओंमें भक्तवर बैजनाथकी टीका बहुत अच्छी है; किन्तु पुराने ढंगकी भाषा होनेके कारण वह सर्वसाधारणके लिए उपयोगी नहीं है। उसके बादकी जितनी टीकाएँ हैं, सबपर उस टीकाकी गहरी छाप पड़ी हुई दिखाई पड़ती है। नवीन टीकाओंमें वियोगी हरिजीकी टीका बहुत प्रसिद्ध है। उसपर मेरी बड़ी श्रद्धा थी; किन्तु बहुत दिनोंतक उसे पढ़नेका सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। पुस्तक प्रकाशित होनेके कई साल बाद एक दिन मैंने उसे यत्र-तत्र देखना शुरू किया। हठात् ४४ वें पदके 'वारानिधे' शब्दकी ऊटपटाँग टिप्पणीपर मेरी दृष्टि पड़ी। कौतूहल बढ़ा और पढ़नेका दृष्टिकोण भी बदल गया। २१२ वें पदके 'पवन' शब्दपर (जोकि 'पूञ्' धातुसे बना है और व्या- करणसे शुद्ध है) पढ़ा, "पवन = पवित्र करनेवाले; शुद्ध शब्द 'पावन' है। ० ० यह आर्ष प्रयोग है"। टीकाकारने यह लिखनेके पहले इस बातपर विचार नहीं किया कि गुसाईंजी सरीखे प्रकांड पंडितसे ऐसी भूल हो सकती है या नहीं। कविता जिस महाकविके पीछे-पीछे चलनेवाली थी एवं जिसका शब्द-कोश असाधारण था, वह अशुद्ध प्रयोग क्यों करने लगा ? उसके लिए तो शब्दोंका अदल-बदल करना बायें हाथका खेल था। २३ वें पदमें 'बारी' शब्दके सीधा अर्थ 'बगीचा' के स्थानपर 'खेतों या वृक्षोंके चारों तरफ लगाये हुए काँटेदार पेड़, जिनसे पशु आदिसे उनकी रक्षा रहती है। यह शब्द बुन्देलखण्डीडी है,' ४० वें पदमें 'यत्पनामी' का अर्थ 'प्रणाम करता हूँ,' ६२ वें पदकी टिप्पणीमें सूर्यका रंग 'श्वेत', १०६ ठे पदमें 'भेई' का अर्थ 'लगाई', १४२ वें पदमें 'तावों' का अर्थ 'धारण करता हूँ, उमंगसे फूला नहीं समाता', १६८ वें पदमें 'खलाए' का अर्थ 'टकाए हुए', लिखा देखकर मेरे आश्चर्यकी सीमा न रही। इस प्रकार श्री वियोगीहरिजीकी टीका शब्दार्थकी भूलोंसे भरी हुई दिखाई पड़ी। इतना
( ४ ) ही नहीं, पदोंके अर्थ और मूलपाठमें भी कम भूलें नहीं हैं। कुछ उदाहरण लीजिये:— मन्दाकिनि मालिनि सदा सींच। वर-बारि विषम नर-नारि नीच। [पद २३] इसका अर्थ आपने किया है, 'उसे मन्दाकिनीरूपी मालिन सदा अपने उत्तम जलसे इस भाँति सींचती रहती है, जैसे दुष्ट स्वभाववाले स्त्री-पुरुष और नीच चाण्डाल आदि। तात्पर्य यह कि मन्दाकिनीमें बड़े-बड़े पापी और नीच स्नान करते हैं, पर उनके दुष्कर्मोंका प्रभाव वृक्षपर कुछ नहीं पड़ता, वह ज्यों- का-त्यों हरा-भरा रहता है।' पाठक ही विचार करें कि कितना बढ़िया अर्थ किया गया है और कैसा उसका तात्पर्य निकाला गया है। और सुनिये— 'मृदुल चरन, सुभचिह्न, पदज नख अति अभूत उपमाई'। [पद ६२] इसके स्थानपर आपने पाठ माना है:— 'मृदुल चरन, शुभ चिह्न, पदज नख अद्भुत उपमाई'॥ भावार्थमें लिखा है 'जिनके कोमल चरणारविन्दोंमें सुन्दर चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी तो कुछ विचित्र ही उपमा है।' द्रष्टव्य है कि गुसाईंजीके भावकी कैसी बेरहमीसे हत्या की गयी है। वास्तवमें इसका अर्थ है, 'कोमल चरणोंमें शुभ चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी अत्यन्त अभूतपूर्व उपमा है।' 'अभूत उपमा' का लक्षण महाकवि केशवदासजीने इस प्रकार लिखा भी है:— उपमा जाय कही नहीं, जाको रूप निहारि। अस अभूत उपमा कही, केसवदास विचारि॥ —कविप्रिया पाठक ही विचार करें कि इन दोनोंमें कौन-सा पाठ और अर्थ ठीक है। आगे देखिये—
( ५ ) अपनाये सुग्रीव विभीषण तिन न तज्यो छल-छाउ । ‘भरत-सभा सनमानि’ सराहत होत न हृदय अघाउ ॥ [पद १००] इसका भावार्थ आपने लिखा है ‘यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना कपट भाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपनी शरणमें ले ही लिया । और भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही नहीं होती ।’ कैसा अर्थका अनर्थ हुआ है और प्रसंग कितनी दूर छूट गया है ! इस अर्थसे तो यह सूचित हो रहा है कि सुग्रीव और विभीषणका ‘कपट’ भाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया । पर वास्तवमें बात इसकी उलटी है । आगे देखिये, ‘भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं’, लिखकर टीकाकारने सीतापतिके शील और स्वभावमें भी बट्टा लगा दिया है; क्योंकि भरतजी तो इस योग्य थे ही, फिर यदि सीतापति उनकी सदा प्रशंसा करते रहते हैं, तो इसमें सीतापतिकी कौन-सी विशेषता है ? इस अर्थसे तो कविके कथनका प्रवाह ही टूट जाता है । जरा नीचे लिखे पदमें ऊपरके चरणोंका मिलान कीजिये:— सुनि सीतापति-सील-सुभाउ । मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥ सिसुपन ते पितु, मातु, बन्धु, गुरु, सेवक, सचिव सखाउ । कहत राम-बिधु बदन रिसौहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥ खेलत सङ्ग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ । जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥ सिला साप-सन्ताप बिगत भइ, परसत पावन पाउ । दई सुगति सो न हेरि हरषि हिय, चरन छुए पछिताउ ॥ भव-धनु भञ्जि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ । छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥ कह्यो राज बन दियो नारि बस, गरि गलानि गयो राउ । ता कुमातु को मन जुगवत ज्यौं, निज तनु मरम कुघाउ ॥
( ६ ) कपि-सेवा बस भये कनौड़े कह्यो पवनसुत आउ । देबे को न कछू रिनियाँ हौं धनिक तू पत्र लिखाउ ॥ अपनाये सुग्रीव विभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ। भरत-सभा सनमानि सराहत, होत न हृदय अघाउ ॥ देखिये, उक्त अर्थसे कविताका भाव कितना शिथिल पड़ गया है । वास्तव- में इसका अर्थ है, 'सुग्रीव और विभीषणको अपना लेनेपर भी उन लोगोंने छलकी छाया नहीं छोड़ी (फिर भी आप उन्हें अपनाये ही रह गये) और भरतजी- की सभामें (भरतसे सुग्रीव और विभीषण की) ससम्मान सराहना करते हुए आपका हृदय तृप्त ही नहीं होता था।' इस अर्थकी पुष्टि रामायणकी यह चौपाई भी कर रही है— ते भरतहिं भेंटत सनमाने । राज-सभा रघुबीर बखाने ॥ श्री वियोगी हरिजीने बहुतसे स्थलोंपर भावार्थ लिखनेमें अनर्थ तो किया ही है, मूल पदके शब्दोंका अर्थ भी छोड़ दिया है। जैसे— जो कलिकाल प्रबल अति होतो तुव निदेस तें न्यारो। तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥ [ पद १४ ] इसका भावार्थ आपने लिखा है, यदि 'कलिकाल पराक्रमी होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हम लोग तुम्हारी आशा छोड़ देते, तुम्हारा गुणगान भी न करते और क्रोधकर उस बेचारेको जो भला-बुरा कहते हैं, सो भी न कहते, बस, सब झंझट छोड़-छाड़कर उसीका भजन करते, जिससे कमसे कम वह विघ्न-बाधा तो न करता ? ॥' पाठक ही देखें कि नीचेके चरणका कैसा अटकलसे मनमाना अर्थ किया गया है। कैसे विचित्र अन्वयसे अर्थ निकाला गया है, वाह ! इसका सीधा और सरल अर्थ यह है—'यदि कलिकाल आपसे अधिक बलवान् होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हे हरे ! मैं बदनामीको छोड़कर उसके क्रोध करनेपर भी उसीका भरोसा रखकर तथा उसके दोषोंको गुण समझकर उसीको भजता।' एक नमूना और देखिये—
( ७ ) जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरनि तारुन्यतनु तेजधामं । [पद ५१] भावार्थमें आपने लिखा है, “श्रीजानकी-बल्लभ रघुनाथजी रागद्वेषादिरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिए सूर्यरूप, तरुण शरीरवाले तेजके स्थान···।” किन्तु इस बातपर आपने ध्यान नहीं दिया कि श्रीरामजी सदा किशोरावस्थामें रहते हैं, तरुणावस्थामें नहीं। देखिये न गोस्वामीजीने इस ग्रंथके ६२वें पदमें कहा है, 'बिसद, किसोर, पीन, सुन्दर बपु, स्याम सुरुचि अधिकाई।' जो 'तारुन्यतनु' वास्तवमें 'तरनि' शब्दका विशेषण है, उस 'तारुन्यतनु' की कैसी छीछालेदर की गयी है। कहाँतक कहें, शब्दार्थ और भावार्थकी भूलोंसे तो पुस्तक भरी ही है, कहीं- कहीं अप्रासंगिक टिप्पणियाँ लिखकर व्यर्थ ही पुस्तकका कलेवर बढ़ाया गया है। उदाहरणार्थ १०८ पदकी पहली टिप्पणी देखिये। उस स्थलपर गोस्वामीजीकी गुरु-भक्ति दिखानेकी अपेक्षा गुरु-महिमा या गुरु शब्दकी परिभाषा बतलाना अधिक संगत होता। इस टीकामें उनकी अधिकांश त्रुटियोंपर टिप्पणी दे दी गयी है, अतः यहाँ उनका विस्तृत उल्लेख करना अनावश्यक है। और बातोंको छोड़िये, आपने स्थल-स्थलपर छन्दोभंग दोष दिखलानेका भी दुःसाहस किया है। कई जगह आपको छन्दोभंग दोष दिखाई पड़ा है। समझमें नहीं आता कि गीति-काव्यमें छन्दोभंग दोष देखना कहाँतक ठीक है। यहाँपर इस बातकी चर्चा करना अप्रासंगिक न होगा कि गीति-काव्य कहते किसे हैं। हमारी तुच्छ बुद्धिमें तो यह आता है कि उन सभी छोटी-मोटी धार्मिक कविताओंको गीति- काव्य कहते हैं जो संगीतके स्वरोंमें आबद्ध हो सकती हैं और छन्दकी निश्चित मात्राओंमें अपनेको नहीं बाँधतीं। इस स्वरूपकी यह विशेषता है कि विशेष मनोवेगोंको प्रकट करनेके लिए तथा दूसरेके हृदयमें भी उन्हीं मनोवेगोंको उत्पन्न करनेके लिए समय और परिस्थितिके अनुकूल राग-रागनियोंका आधार लिया जाता है १। १. किन्तु विनयके पदोंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि कविने अपने विशेष मनोवेगोंको समय और परिस्थितिके अनुकूल राग-रागिनियोंका आधार लेकर प्रकट तो अवश्य किया है, पर दूसरेके हृदयमें उन मनोवेगोंको उत्पन्न करनेके लिए नहीं। क्योंकि यदि
( ८ ) अस्तु । उक्त टीकाको आद्योपान्त पढ़ जानेके बाद मैंने एक-एककर कई टीकाएँ पढ़ डालीं । उन टीकाओंकी चर्चा करनेसे वक्तव्य बहुत बढ़ जायगा । निश्चय किया कि अभी उक्त ग्रन्थपर टीका लिखनेकी आवश्यकता बनी हुई है । तदनुसार ही मैंने यह टीका लिखनेका प्रयास किया है । मैं जानता हूँ कि इस टीकामें भी बहुत-सी भूलें रह जायँगी । फिर भी इस टीकासे यदि दस-पाँच भ्रामक स्थलोंका भी स्पष्टीकरण हो सका—मेरा विश्वास है कि अवश्य होगा— तो इस टीकाका उद्देश्य सफल हो जायगा । इस टीकाके सम्बन्धमें एक अभिलाषा यह थी कि इसकी भूमिका महामना मालवीयजीसे लिखाऊँगा । इसके लिए मैंने 'सेवा उपवन', काशीमें नियमित रूपसे जा-जाकर पूज्य पण्डितजीको पुस्तक- का अधिकांश भाग सुनाया । एक तो वृद्धावस्था, दूसरे कार्याधिक्य; इतनेपर भी मालवीयजी महाराज इसे बड़े प्रेमसे सुनते थे और स्थल-स्थलपर कुछ बातें नोट कराते जाते थे । जैसे, पद १०२ में 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों' के स्थानपर 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हें', एक स्थानपर 'सरकार' के स्थानपर 'महाराज' इत्यादि । किन्तु पुस्तक निकलनेमें एक तो यों ही वर्षोंकी देर हो चुकी थी, दूसरे भूमिकाके लिए और भी देर होती जा रही थी; भूमिका लिखाने- के लिए कितने दिनोंतक रुकना पड़ता, कुछ ठीक नहीं था । अतः मैंने पूज्य पण्डितजीको इसके लिए कष्ट देना उचित नहीं समझा और उनसे भूमिका लिखानेका विचार छोड़ देना पड़ा । यह टीका कैसी है, इसका निर्णय विद्वज्जन स्वयं ही करेंगे । माघ कृष्ण १०, } सं० १९९५ वि० } देवनारायण द्विवेदी कविका यह भाव रहा होता तो वह इस ग्रन्थमें भी रामायणकी तरह ठेठ शब्दोंका अधिक प्रयोग न करके प्रचलित शब्दोंका ही प्रयोग करता । हाँ, इससे यदि दूसरेके हृदयमें वे मनोवेग पैदा हो जायँ तो कविने उससे अपनी रचनाको बचानेकी भी चेष्टा नहीं की है । उसने अपने मनोवेगोंको स्वतन्त्र शब्दोंमें प्रकट किया है; इस बातकी परवाह नहीं की है कि ये मनोवेग दूसरेके हृदयमें पैदा होंगे या नहीं । यह बात भी इस पत्रिकाकी विशेषताओंमें है । क्योंकि 'पाती' तो हृदयके ही शब्दोंमें लिखी जानी चाहिये । फिर भी विनयपत्रिकाकी प्रसाद-गुण-युक्त मधुर रचना पाठकोंमें वह मनोवेग पैदा कर ही देती है ।
श्रीसीतावल्लभाय नमः विनय-पत्रिका राग बिलावल श्रीगणेश-स्तुति ( १ ) गाइये गणपति जगबन्दन । संकर - सुवन भवानी - नन्दन ॥१॥ सिद्धि-सदन, गजवदन, विनायक । कृपा-सिन्धु, सुन्दर, सब लायक ॥२॥ मोदक-प्रिय, मुद - मंगल-दाता। विद्या - वारिधि, बुद्धि - विधाता ॥३॥ माँगत तुलसीदास कर जोरे । बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥४॥ शब्दार्थ - गणपति = गणोंके स्वामी । संकर = कल्याण करनेवाले, शिवजी । नन्दन = आनन्द बढ़ानेवाले या प्रसन्न करनेवाले । सिद्धि = एक अलौकिक शक्तिका नाम । यह आठ प्रकारकी है-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राकाम्य और प्राप्ति । मोदक = दूधसे गूँधे आटेमें मेवा आदि भर कर बनाया गया मिष्टान्नविशेष, लड्डू । भावार्थ-संसारके वन्दनीय, श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये । वह शिव- पार्वतीके पुत्र हैं, और उनको (माता-पिताको) प्रसन्न करनेवाले हैं ॥१॥ वह अष्टसिद्धियोंके स्थान हैं; उनका मुख हाथीके समान है; वह समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी उनकी कृपासे सब विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं; वह कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर हैं और हर तरहसे योग्य हैं ॥२॥ उन्हें मोदक अत्यन्त प्रिय है । वह आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं । वह विद्याके समुद्र और बुद्धिके विधाता हैं ॥३॥ ऐसे मंगलमय गणेशजीसे यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मानसमें श्रीराम-जानकी निवास करें ॥४॥
२ विनय-पत्रिका सूर्य-स्तुति ( २ ) दीन-दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा ॥१॥ हिम-तम-करि केहरि करमाली। दहन दोष-दुख-दुरित-रुजाली ॥२॥ कोक-कोकनद-लोक-प्रकासी। तेज - प्रताप - रूप - रस - रासी ॥३॥ सारथि पंगु दिव्य रथ-गामी। हरि-संकर-विधि-मूरति स्वामी ॥४॥ बेद-पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर माँगै ॥५॥ शब्दार्थ—दिवाकर = सूर्य। हिम = बर्फ। तम = अन्धकार। करि = हाथी। केहरि = सिंह। करमाली = किरणोंकी माला धारण करनेवाले। दहन = अग्नि। दुरित = पाप। रुजाली = रोग-समूह। कोक = चकवा-चकवी। कोकनद = कमल। भावार्थ—हे दीनोंपर दया करनेवाले सूर्यदेव ! मुनि, मनुष्य, देवता और राक्षस सभी आपकी सेवा करते हैं ॥१॥ हे किरणोंकी माला धारण करनेवाले ! आप बर्फ और अन्धकाररूपी हाथियोंको मारनेके लिए सिंह हैं। अर्थात् आपकी किरणोंसे बर्फ पिघल जाता है और अन्धकार दूर हो जाता है। दोष, दुःख, पाप और रोग-समूहको आप अग्निके समान जला डालनेवाले हैं ॥२॥ आप चकवा-चकवीको प्रसन्न करनेवाले हैं; अर्थात् उनका रात्रिके कारण उत्पन्न वियोग आपके उदय होते ही नष्ट हो जाता है। चकवा-चकवी सन्ध्या होते ही एक-दूसरेसे अलग हो जाते हैं और सबेरा होते ही फिर मिल जाते हैं। आप कमलको प्रफुल्लित करनेवाले तथा समूचे ब्रह्माण्डको प्रकाशित करनेवाले हैं। आप तेज, प्रताप, रूप और रसकी राशि हैं ॥३॥ आप हैं तो दिव्य रथपर चलनेवाले, पर आपका सारथी (अरुण) पंगु है। हे स्वामी ! आप विष्णु, शिव और ब्रह्मा इन त्रिदेवोंके रूप हैं ॥४॥ वेदों और पुराणोंमें आपका यश जगमगा रहा है। तुलसीदास आपसे राम-भक्तिका वर माँगता है ॥ ५ ॥ विशेष १—पंगु सारथीका रहना सूर्य भगवान्की दीन-दयालुताका परिचायक है। —भविष्यपुराणमें लिखा है कि सूर्यनारायण सबेरे ब्रह्मरूप, दोपहरके समय
विनय-पत्रिका ३ शिव-रूप तथा शामके वक्त विष्णु-रूप रहते हैं। इसीसे गोस्वामीजीने उन्हें 'हरि-संकर-विधि-मूरति' कहा है। शिव-स्तुति ( ३ ) को जाँचिये सम्भु तजि आन दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ॥१॥ कालकूट-जुर-जरत सुरासुर, निज प्रन लागि किये विष-पान। दारुन दनुज जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही वान ॥२॥ जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत सन्त, श्रुति, सकल पुरान । सो गति मरनकाल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥३॥ सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारवती-पति परम सुजान । देहु काम-रिपु राम-चरन रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥४॥ शब्दार्थ—आन = दूसरा, और कोई। आरति = कष्ट । भगवान् = ऐश्वर्यवान् । काल- कूट = हलाहल विष । जुर = ज्वाला, ज्वर, ताप । कामरिपु = शिवजी । भावार्थ—शिवजीको छोड़कर और किससे याचना की जाय ? आप दीनों- पर दया करनेवाले, भक्तोंका कष्ट हरण करनेवाले, हर तरहसे समर्थ और ऐश्वर्य- वान् हैं ॥१॥ समुद्र-मंथनके बाद जब हलाहल विषकी ज्वालासे देवता और असुर जलने लगे, तब आप अपनी दीन-दयालुताका प्रण निभानेके लिए उस विषको पान कर गये । संसारको दुःख देनेवाले भयंकर दानव त्रिपुरासुरको आपने एक ही बाणमें मार डाला था ॥२॥ सन्त, वेद और सब पुराण कहते हैं कि जिस गतिकी प्राप्ति महामुनियोंके लिए अगम और दुर्लभ है, वही गति या मुक्ति आप अपने पुरमें अर्थात् काशीमें मृत्युके समय सदैव सबको समभावसे दिया करते हैं ॥ ३ ॥ सेवा करनेमें आप सुलभ हैं यानी सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। हे पार्वतीके पति ! हे परमज्ञानी ! आप कल्पवृक्षके समान उदार हैं। हे कामदेवको भस्म करनेवाले ! हे कृपानिधान ! तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें भक्ति दे दीजिये।
४ विनय-पत्रिका विशेष १—एक बार देवताओं और असुरोंने सुमेरु गिरिकी मथानी और शेषनाग- का दण्ड बनाकर समुद्रका मन्थन किया। मन्थन करनेपर सबसे पहले हलाहल विष निकला। उसकी असह्य ज्वालासे दशों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं। देवता और दैत्य त्राहि-त्राहि करने लगे। और कोई उपाय न देखकर सबने भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी शरण ली। शिवजी प्रकट हुए और देवों-दैत्योंके कल्याणार्थ उसे पान कर गये। परन्तु शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि उनके हृदयमें ईश्वर अपनी अखिल सृष्टिके साथ विराजमान हैं। अतः उन्होंने उस विषको कण्ठमें ही रोक लिया—नीचे नहीं उतरने दिया। इससे उनका कण्ठ नीला हो गया। तभीसे वह 'नीलकण्ठ' कहलाने लगे। २—त्रिपुरासुरके घोर अत्याचारसे तीनों लोकोंको पीड़ित देखकर शिवजीने एक ही बाणमें उसे मार गिराया था। तभीसे उनका नाम 'त्रिपुरारि' पड़ा। ३—काशीखण्डमें लिखा है 'काश्यां मरणान्मुक्तिः' अर्थात् काशीमें मरनेसे मुक्ति होती है। कहते हैं कि यहाँ मृत्युके समय भगवान् शंकर रामतारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, इसलिए उस मनुष्यका अज्ञानान्धकार तत्क्षण दूर हो जाता है और वह ज्ञानोदय होनेके कारण मुक्त हो जाता है। राग धनाश्री ( ४ ) दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीनदयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं ॥१॥ मारिकै मार थप्यो जगमें, जाकी प्रथम रेख भट माहीं। ता ठाकुर को रीझि निवाजिबौ, कह्यो क्यों परत मो पाहीं॥२॥ जोग कोटि करि जो गति हरिसों, मुनि माँगत सकुचाहीं। वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं ॥३॥ ईस उदार उमापति परिहरि, अनत जे जाचन जाहीं। तुलसिदास ते मूढ़ माँगने, कबहुँ न पेट अघाहीं ॥४॥
विनय-पत्रिका ५ शब्दार्थ—दिबोई = देना ही। सोहाहीं = अच्छे लगते हैं। मार = कामदेव। थप्यो = स्थापित किया, रहने दिया। निवाजिबौ = कृपा करना। पुरारि-पुर = काशी। अनत = अन्यत्र। जाँचन = माँगने। भावार्थ—शिवजीके समान दानी कहीं (कोई) नहीं है। वह दीनदयालु हैं, देना ही उन्हें अच्छा लगता है। भिखमंगे उन्हें सदैव प्रिय लगते हैं ॥१॥ योद्धाओंमें अग्रगण्य कामदेवको भस्म करके फिर उसे संसारमें रहने दिया, ऐसे प्रभुका रीझकर कृपा करना मुझसे कैसे कहा जा सकता है! ॥२॥ अनेक तरहसे योगाभ्यास करके मुनिगण जिस मोक्षको भगवान्से माँगनेमें संकोच करते हैं, उस मोक्षपदको शिवकी पुरी काशीमें कीट-पतंगतक पा जाते हैं, यह वेदोंमें विदित या प्रकट है ॥३॥ ऐसे ऐश्वर्यवान् परम उदार शिवजीको छोड़ कर जो लोग अन्यत्र माँगने जाते हैं, वे मूर्ख हैं; तुलसीदास कहते हैं कि उन मूर्खोंका पेट माँगनेसे कभी भी नहीं भरता ॥४॥ विशेष १—जब शिवजीने कामदेवको भस्म किया, तब कामदेवकी स्त्री रति अत्यन्त दुःखिनी होकर विरह-विलाप करने लगी। इससे महाराज शिवजीको दया आ गयी और उन्होंने कामदेवको अनंग (बिना शरीर) रूपसे संसारमें रहने दिया। इससे उनकी दयालुताका परिचय मिलता है। बावरो रावरो नाह भवानी। दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद बड़ाई भानी ॥१॥ निज घर की घर-बात बिलोकहु, हौ तुम परम सयानी। सिव की दयी सम्पदा देखत, श्री सारदा सिहानी ॥२॥ जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुख की नहीं निसानी। तिन रंकन को नाके सँवारत, हौं आयौ नकबानी ॥३॥ दुख दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी। यह अधिकार सौंपिये औरहिं, भीख भली मैं जानी ॥४॥
६ विनय-पत्रिका प्रेम-प्रसंसा-विनय-व्यंगजुत, सुनि बिधि की वरबानी। तुलसी मुदित महेस मनहि मन, जगत-मातु मुसुकानी ॥५॥ शब्दार्थ—बावरो = बावला, पागल। रावरो = आपके। नाह = स्वामी। सिहानी = सिहाती हैं। नाक=स्वर्ग। नकवानी = नाकों दम। भानी (यह भणित शब्दका अपभ्रंश है) = कहा है। भावार्थ—(शिवजीकी अत्यधिक उदारता देखकर पार्वतीके पास जाकर ब्रह्मा कहने लगे) हे भवानी ! आपके पति पागल हैं। वह ऐसे दानी हैं कि जिन्होंने कभी कुछ भी नहीं दिया है, उन्हें भी वे प्रतिदिन दिया करते हैं; (तारीफ तो यह है कि) उनकी यह बड़ाई वेदने कही है ॥१॥ आप परम सयानी हैं, जरा अपने घरकी घरेलू बातको देखिये (देते-देते अपना घर खाली करते जा रहे हैं)। शिवकी दी हुई सम्पत्तिको देखकर लक्ष्मी और सरस्वती भी सिहा रही हैं॥२॥ जिन लोगोंके ललाटमें मैंने सुखका नाम-निशानतक नहीं लिखा था, उन कंगालोंके लिए स्वर्गकी सजावट करते-करते मेरे नाकोंदम आ गया है ॥३॥ दुखियोंके दुःख और दीनता भी दुखी है; याचकता व्याकुल हो गयी है (क्योंकि अब दुःख, दीनता और याचकताको कहीं भी रहनेके लिए ठौर नहीं है)। यह अधिकार किसी दूसरेको सौंप दीजिये; (मैं इसे नहीं ले सकता) मैं समझ गया कि इस पदका अधिकारी होनेकी अपेक्षा भीख अच्छी है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि प्रेम, प्रशंसा, विनय और व्यंग्य-भरी ब्रह्माकी सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी मन् ही मन् प्रसन्न हो उठे और जगज्जननी पार्वतीजी मुसकराने लगीं ॥५॥ विशेष १—इस पदमें 'ब्याज-स्तुति' अलंकार है। जहाँ सीधे अर्थको छोड़कर घुमाव-फिरावसे दूसरा भाव प्रकट किया जाता है, वहाँ ब्याज या व्यंग्य होता है। निन्दामें स्तुति प्रकट करनेको ब्याज-स्तुति कहते हैं और स्तुतिमें निन्दाका भाव प्रकट करनेको ब्याज-निन्दा कहते हैं। ये ही इस अलंकारके दो भेद हैं। ब्याज-स्तुतिका उदाहरण सामने है। ब्याज-निन्दा अलंकारका भी एक उदाहरण ले लीजिये— नीक दीन हरि सुन्दरताई। —रामचरितमानस
विनय-पत्रिका ७ २—'वेद बड़ाई भानी'—का अर्थ कुछ लोगोंने 'वेदोंकी मर्यादा तोड़कर' किया है। पर यह अर्थ ठीक नहीं। क्योंकि एक तो 'बड़ाई' का अर्थ 'मर्यादा' हो ही नहीं सकता, दूसरे शिवजी वेदोंकी मर्यादाके रक्षक हैं, उसके तोड़नेवाले नहीं। लिखा है:— वेदानुवर्त्तिनं रुद्रं देवं नारायणं तथा। —इति कौर्मे १३ अध्यायः ३—'निज घरकी घर बात'के स्थानपर कहीं-कहीं 'निज घरकी बर बात' पाठ भी है। इसका अर्थ है अपने घरकी बड़ी बात। राग रामकली ( ६ ) जाँचिये गिरिजापति, कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥ औढर-दानि द्रवत पुनि थोरे। सकत न देखि दीन कर जोरे ॥२॥ सुख संपति मति सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥३॥ गये सरन आरत के लीन्हे। निरखि निहाल निमिष महँ कीन्हे ॥४॥ तुलसिदास जाचक जस गावै। बिमल भगति रघुपति की पावै ॥५॥ शब्दार्थ—अनिमादिक = अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ। औढर-दानि = बिना समझे बूझे बड़ी से बड़ी वस्तुको दे डालनेवाले। द्रवत = पिघल जाते हैं। सुगति = मोक्ष। निमिष = पलभरमें। भावार्थ—पार्वतीके पति शिवजीसे ही याचना करनी चाहिये। जिनका घर काशीमें है और अणिमा आदि आठो सिद्धियाँ जिनकी चेरी हैं॥१॥ एक तो शिवजी औढरदानी हैं, दूसरे थोड़ी ही सेवामें पिघल जाते हैं। वह दीनोंको हाथ जोड़कर (अपने सामने) खड़े नहीं देख सकते ॥२॥ शंकरकी सेवासे सुख, सम्पत्ति, सुबुद्धि और सुन्दर गति आदि सब वस्तुएँ सुलभ हो जाती हैं ॥३॥ उन्होंने आर्त्त होकर शरणमें गये हुए जीवोंको अपना लिया और पलभरमें ही देखते-देखते उन्हें निहाल कर दिया है ॥४॥ याचक तुलसीदास इसी आशासे उनका यश गाता है ताकि उसे श्रीरघुनाथजीकी पवित्र भक्ति मिले ॥५॥
८ विनय-पत्रिका विशेष १—अणिमादिक—आठ सिद्धियोंमें एक सिद्धिका नाम है। आठ सिद्धियाँ ये हैं—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। ( ७ ) कस न दीन पर द्रबहु उमावर। दारुन बिपति हरन, करुनाकर ॥१॥ बेद पुरान कहत उदार हर। हमरि बेर कंस भयउ कृपिनतर ॥२॥ कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज। ह्वै प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज॥ जो गति अगम महामुनि गावहिं। तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥४॥ देहु काम-रिपु, राम-चरन-रति। तुलसिदास प्रभु हरहु भेद-मति ॥५॥ शब्दार्थ—कृपिनतर = अधिक कृपण। भेदमति = भेदबुद्धि; 'मैं और मेरा' यही भेद- बुद्धि है। भावार्थ—हे उमावर ! आप मुझ दीनपर क्यों नहीं दयार्द्र होते ? आप तो घोर विपत्तियोंको हरनेकी कृपा करनेवाले हैं॥१॥ वेद और पुराण तो कहते हैं कि शिवजी अत्यन्त उदार हैं; किन्तु मेरी बारी आनेपर आप इतने अधिक कृपण क्यों हो गये ? ॥२॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मणने कौन-सी भक्ति की थी, जिसे आपने प्रसन्न होकर कैवल्य पद दे डाला ? ॥३॥ बड़े-बड़े मुनि जिस मोक्षको दुर्लभ कहते हैं, आपके पुर (काशी) में वह मोक्ष कीट-पतंगोंको भी मिल जाता है ॥४॥ हे कामदेवको दहन करनेवाले शिवजी ! तुलसीदासको श्रीरामचरणोंकी भक्ति दीजिये। हे प्रभो ! उसकी भेदबुद्धि हर लीजिये ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने शिवजीके लिए उदार दानी तथा काशीमें कीट-पतंगको मुक्त करनेकी बात कई बार कही है। जैसे, 'वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं।' 'तव पुर कीट पतंगहु पावहिं।' इससे तुलसीदासजीका यह भाव प्रकट होता है कि क्या शिवजी उन्हें कीट-पतंग समझ कर भी उनकी मनोभिलाषा पूरी न करेंगे ? शिवजी बड़े दानी हैं, क्या याचककी माँग पूरी न
करेंगे ? क्योंकि काशीमें ही तो गोस्वामीजी भी रहते थे ! “गाँव बसत वामदेव”—कहा भी है। २—गुणनिधि नामक ब्राह्मण चोर था। एक दिन वह घण्टा चुरानेके लिए शिव-मन्दिरमें गया। घण्टा ऊँचा था, अतः उसे खोलनेके लिए वह शिवमूत्तिके ऊपर चढ़ गया। शिवजीने प्रसन्न होकर कहा,—माँग वर। और लोग तो पत्र- पुष्प चढ़ाते हैं, पर तूने आज हमपर अपना शरीर ही चढ़ा दिया, इससे हम तुझपर बहुत प्रसन्न हैं। इस प्रकार शिवजीकी कृपासे वह कैवल्य-पदका अधि- कारी हो गया।
( ८ ) देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे। किये दूर दुख सबनिके, जिन जिन कर जोरे ॥१॥ सेवा सुमिरन पूजिबो, पात आखत थोरे। दियो जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ॥२॥ गाँव बसत बामदेव, मैं कबहुँ न निहोरे। अधिभौतिक बाधा भई, ते किंकर तोरे ॥३॥ वेगि बोलि बलि बरजिये, करतूति कठोरे। तुलसी दलि रुँध्यो चहँ, सठ साखि सिहोरे ॥४॥
शब्दार्थ—भोरे = भोले। पात = बेलपत्र। आखत = अक्षत। गज = हाथी। बामदेव = शिवजी। किंकर = दास। वरजिये = मना कर दीजिये। सिहोरे = धूहड़का वृक्ष, सेहुड़।
भावार्थ—हे शंकर ! आप महादेव हैं, महादानी हैं और बहुत भोले हैं। जिन-जिन लोगोंने आपके सामने हाथ जोड़े, आपने उन सबके दुःख दूर कर दिये ॥१॥ आपकी सेवा, स्मरण और पूजा थोड़े-से बेलपत्र और अक्षतसे ही हो जाती है। उसके बदले आप संसारकी सब सुख-सामग्री—हाथी, रथ, घोड़े इत्यादि दे डालते हैं ॥ २ ॥ हे बामदेव ! मैं आपके गाँव (काशी) में रहता हूँ, पर अबतक आपसे कुछ नहीं माँगा। अब मुझे आधिभौतिक बाधाएँ सता रही हैं, वे आधिभौतिक दुःख आपके दास हैं ॥ ३ ॥ इसलिए आप इन कठोर करतूत- वालोंको शीघ्र बुलाकर मना कर दीजिये, मैं आपकी बलैया लेता हूँ। क्योंकि