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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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( ८ ) अस्तु । उक्त टीकाको आद्योपान्त पढ़ जानेके बाद मैंने एक-एककर कई टीकाएँ पढ़ डालीं । उन टीकाओंकी चर्चा करनेसे वक्तव्य बहुत बढ़ जायगा । निश्चय किया कि अभी उक्त ग्रन्थपर टीका लिखनेकी आवश्यकता बनी हुई है । तदनुसार ही मैंने यह टीका लिखनेका प्रयास किया है । मैं जानता हूँ कि इस टीकामें भी बहुत-सी भूलें रह जायँगी । फिर भी इस टीकासे यदि दस-पाँच भ्रामक स्थलोंका भी स्पष्टीकरण हो सका—मेरा विश्वास है कि अवश्य होगा— तो इस टीकाका उद्देश्य सफल हो जायगा । इस टीकाके सम्बन्धमें एक अभिलाषा यह थी कि इसकी भूमिका महामना मालवीयजीसे लिखाऊँगा । इसके लिए मैंने 'सेवा उपवन', काशीमें नियमित रूपसे जा-जाकर पूज्य पण्डितजीको पुस्तक- का अधिकांश भाग सुनाया । एक तो वृद्धावस्था, दूसरे कार्याधिक्य; इतनेपर भी मालवीयजी महाराज इसे बड़े प्रेमसे सुनते थे और स्थल-स्थलपर कुछ बातें नोट कराते जाते थे । जैसे, पद १०२ में 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों' के स्थानपर 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हें', एक स्थानपर 'सरकार' के स्थानपर 'महाराज' इत्यादि । किन्तु पुस्तक निकलनेमें एक तो यों ही वर्षोंकी देर हो चुकी थी, दूसरे भूमिकाके लिए और भी देर होती जा रही थी; भूमिका लिखाने- के लिए कितने दिनोंतक रुकना पड़ता, कुछ ठीक नहीं था । अतः मैंने पूज्य पण्डितजीको इसके लिए कष्ट देना उचित नहीं समझा और उनसे भूमिका लिखानेका विचार छोड़ देना पड़ा । यह टीका कैसी है, इसका निर्णय विद्वज्जन स्वयं ही करेंगे । माघ कृष्ण १०, } सं० १९९५ वि० } देवनारायण द्विवेदी कविका यह भाव रहा होता तो वह इस ग्रन्थमें भी रामायणकी तरह ठेठ शब्दोंका अधिक प्रयोग न करके प्रचलित शब्दोंका ही प्रयोग करता । हाँ, इससे यदि दूसरेके हृदयमें वे मनोवेग पैदा हो जायँ तो कविने उससे अपनी रचनाको बचानेकी भी चेष्टा नहीं की है । उसने अपने मनोवेगोंको स्वतन्त्र शब्दोंमें प्रकट किया है; इस बातकी परवाह नहीं की है कि ये मनोवेग दूसरेके हृदयमें पैदा होंगे या नहीं । यह बात भी इस पत्रिकाकी विशेषताओंमें है । क्योंकि 'पाती' तो हृदयके ही शब्दोंमें लिखी जानी चाहिये । फिर भी विनयपत्रिकाकी प्रसाद-गुण-युक्त मधुर रचना पाठकोंमें वह मनोवेग पैदा कर ही देती है ।