भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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श्रीसीतावल्लभाय नमः विनय-पत्रिका राग बिलावल श्रीगणेश-स्तुति ( १ ) गाइये गणपति जगबन्दन । संकर - सुवन भवानी - नन्दन ॥१॥ सिद्धि-सदन, गजवदन, विनायक । कृपा-सिन्धु, सुन्दर, सब लायक ॥२॥ मोदक-प्रिय, मुद - मंगल-दाता। विद्या - वारिधि, बुद्धि - विधाता ॥३॥ माँगत तुलसीदास कर जोरे । बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥४॥ शब्दार्थ - गणपति = गणोंके स्वामी । संकर = कल्याण करनेवाले, शिवजी । नन्दन = आनन्द बढ़ानेवाले या प्रसन्न करनेवाले । सिद्धि = एक अलौकिक शक्तिका नाम । यह आठ प्रकारकी है-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राकाम्य और प्राप्ति । मोदक = दूधसे गूँधे आटेमें मेवा आदि भर कर बनाया गया मिष्टान्नविशेष, लड्डू । भावार्थ-संसारके वन्दनीय, श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये । वह शिव- पार्वतीके पुत्र हैं, और उनको (माता-पिताको) प्रसन्न करनेवाले हैं ॥१॥ वह अष्टसिद्धियोंके स्थान हैं; उनका मुख हाथीके समान है; वह समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी उनकी कृपासे सब विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं; वह कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर हैं और हर तरहसे योग्य हैं ॥२॥ उन्हें मोदक अत्यन्त प्रिय है । वह आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं । वह विद्याके समुद्र और बुद्धिके विधाता हैं ॥३॥ ऐसे मंगलमय गणेशजीसे यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मानसमें श्रीराम-जानकी निवास करें ॥४॥

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