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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

( ८ ) अस्तु । उक्त टीकाको आद्योपान्त पढ़ जानेके बाद मैंने एक-एककर कई टीकाएँ पढ़ डालीं । उन टीकाओंकी चर्चा करनेसे वक्तव्य बहुत बढ़ जायगा । निश्चय किया कि अभी उक्त ग्रन्थपर टीका लिखनेकी आवश्यकता बनी हुई है । तदनुसार ही मैंने यह टीका लिखनेका प्रयास किया है । मैं जानता हूँ कि इस टीकामें भी बहुत-सी भूलें रह जायँगी । फिर भी इस टीकासे यदि दस-पाँच भ्रामक स्थलोंका भी स्पष्टीकरण हो सका—मेरा विश्वास है कि अवश्य होगा— तो इस टीकाका उद्देश्य सफल हो जायगा । इस टीकाके सम्बन्धमें एक अभिलाषा यह थी कि इसकी भूमिका महामना मालवीयजीसे लिखाऊँगा । इसके लिए मैंने 'सेवा उपवन', काशीमें नियमित रूपसे जा-जाकर पूज्य पण्डितजीको पुस्तक- का अधिकांश भाग सुनाया । एक तो वृद्धावस्था, दूसरे कार्याधिक्य; इतनेपर भी मालवीयजी महाराज इसे बड़े प्रेमसे सुनते थे और स्थल-स्थलपर कुछ बातें नोट कराते जाते थे । जैसे, पद १०२ में 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों' के स्थानपर 'हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हें', एक स्थानपर 'सरकार' के स्थानपर 'महाराज' इत्यादि । किन्तु पुस्तक निकलनेमें एक तो यों ही वर्षोंकी देर हो चुकी थी, दूसरे भूमिकाके लिए और भी देर होती जा रही थी; भूमिका लिखाने- के लिए कितने दिनोंतक रुकना पड़ता, कुछ ठीक नहीं था । अतः मैंने पूज्य पण्डितजीको इसके लिए कष्ट देना उचित नहीं समझा और उनसे भूमिका लिखानेका विचार छोड़ देना पड़ा । यह टीका कैसी है, इसका निर्णय विद्वज्जन स्वयं ही करेंगे । माघ कृष्ण १०, } सं० १९९५ वि० } देवनारायण द्विवेदी कविका यह भाव रहा होता तो वह इस ग्रन्थमें भी रामायणकी तरह ठेठ शब्दोंका अधिक प्रयोग न करके प्रचलित शब्दोंका ही प्रयोग करता । हाँ, इससे यदि दूसरेके हृदयमें वे मनोवेग पैदा हो जायँ तो कविने उससे अपनी रचनाको बचानेकी भी चेष्टा नहीं की है । उसने अपने मनोवेगोंको स्वतन्त्र शब्दोंमें प्रकट किया है; इस बातकी परवाह नहीं की है कि ये मनोवेग दूसरेके हृदयमें पैदा होंगे या नहीं । यह बात भी इस पत्रिकाकी विशेषताओंमें है । क्योंकि 'पाती' तो हृदयके ही शब्दोंमें लिखी जानी चाहिये । फिर भी विनयपत्रिकाकी प्रसाद-गुण-युक्त मधुर रचना पाठकोंमें वह मनोवेग पैदा कर ही देती है ।

श्रीसीतावल्लभाय नमः विनय-पत्रिका राग बिलावल श्रीगणेश-स्तुति ( १ ) गाइये गणपति जगबन्दन । संकर - सुवन भवानी - नन्दन ॥१॥ सिद्धि-सदन, गजवदन, विनायक । कृपा-सिन्धु, सुन्दर, सब लायक ॥२॥ मोदक-प्रिय, मुद - मंगल-दाता। विद्या - वारिधि, बुद्धि - विधाता ॥३॥ माँगत तुलसीदास कर जोरे । बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥४॥ शब्दार्थ - गणपति = गणोंके स्वामी । संकर = कल्याण करनेवाले, शिवजी । नन्दन = आनन्द बढ़ानेवाले या प्रसन्न करनेवाले । सिद्धि = एक अलौकिक शक्तिका नाम । यह आठ प्रकारकी है-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राकाम्य और प्राप्ति । मोदक = दूधसे गूँधे आटेमें मेवा आदि भर कर बनाया गया मिष्टान्नविशेष, लड्डू । भावार्थ-संसारके वन्दनीय, श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये । वह शिव- पार्वतीके पुत्र हैं, और उनको (माता-पिताको) प्रसन्न करनेवाले हैं ॥१॥ वह अष्टसिद्धियोंके स्थान हैं; उनका मुख हाथीके समान है; वह समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी उनकी कृपासे सब विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं; वह कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर हैं और हर तरहसे योग्य हैं ॥२॥ उन्हें मोदक अत्यन्त प्रिय है । वह आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं । वह विद्याके समुद्र और बुद्धिके विधाता हैं ॥३॥ ऐसे मंगलमय गणेशजीसे यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मानसमें श्रीराम-जानकी निवास करें ॥४॥

२ विनय-पत्रिका सूर्य-स्तुति ( २ ) दीन-दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा ॥१॥ हिम-तम-करि केहरि करमाली। दहन दोष-दुख-दुरित-रुजाली ॥२॥ कोक-कोकनद-लोक-प्रकासी। तेज - प्रताप - रूप - रस - रासी ॥३॥ सारथि पंगु दिव्य रथ-गामी। हरि-संकर-विधि-मूरति स्वामी ॥४॥ बेद-पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर माँगै ॥५॥ शब्दार्थ—दिवाकर = सूर्य। हिम = बर्फ। तम = अन्धकार। करि = हाथी। केहरि = सिंह। करमाली = किरणोंकी माला धारण करनेवाले। दहन = अग्नि। दुरित = पाप। रुजाली = रोग-समूह। कोक = चकवा-चकवी। कोकनद = कमल। भावार्थ—हे दीनोंपर दया करनेवाले सूर्यदेव ! मुनि, मनुष्य, देवता और राक्षस सभी आपकी सेवा करते हैं ॥१॥ हे किरणोंकी माला धारण करनेवाले ! आप बर्फ और अन्धकाररूपी हाथियोंको मारनेके लिए सिंह हैं। अर्थात् आपकी किरणोंसे बर्फ पिघल जाता है और अन्धकार दूर हो जाता है। दोष, दुःख, पाप और रोग-समूहको आप अग्निके समान जला डालनेवाले हैं ॥२॥ आप चकवा-चकवीको प्रसन्न करनेवाले हैं; अर्थात् उनका रात्रिके कारण उत्पन्न वियोग आपके उदय होते ही नष्ट हो जाता है। चकवा-चकवी सन्ध्या होते ही एक-दूसरेसे अलग हो जाते हैं और सबेरा होते ही फिर मिल जाते हैं। आप कमलको प्रफुल्लित करनेवाले तथा समूचे ब्रह्माण्डको प्रकाशित करनेवाले हैं। आप तेज, प्रताप, रूप और रसकी राशि हैं ॥३॥ आप हैं तो दिव्य रथपर चलनेवाले, पर आपका सारथी (अरुण) पंगु है। हे स्वामी ! आप विष्णु, शिव और ब्रह्मा इन त्रिदेवोंके रूप हैं ॥४॥ वेदों और पुराणोंमें आपका यश जगमगा रहा है। तुलसीदास आपसे राम-भक्तिका वर माँगता है ॥ ५ ॥ विशेष १—पंगु सारथीका रहना सूर्य भगवान्‌की दीन-दयालुताका परिचायक है। —भविष्यपुराणमें लिखा है कि सूर्यनारायण सबेरे ब्रह्मरूप, दोपहरके समय

विनय-पत्रिका ३ शिव-रूप तथा शामके वक्त विष्णु-रूप रहते हैं। इसीसे गोस्वामीजीने उन्हें 'हरि-संकर-विधि-मूरति' कहा है। शिव-स्तुति ( ३ ) को जाँचिये सम्भु तजि आन दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ॥१॥ कालकूट-जुर-जरत सुरासुर, निज प्रन लागि किये विष-पान। दारुन दनुज जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही वान ॥२॥ जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत सन्त, श्रुति, सकल पुरान । सो गति मरनकाल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥३॥ सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारवती-पति परम सुजान । देहु काम-रिपु राम-चरन रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥४॥ शब्दार्थ—आन = दूसरा, और कोई। आरति = कष्ट । भगवान् = ऐश्वर्यवान् । काल- कूट = हलाहल विष । जुर = ज्वाला, ज्वर, ताप । कामरिपु = शिवजी । भावार्थ—शिवजीको छोड़कर और किससे याचना की जाय ? आप दीनों- पर दया करनेवाले, भक्तोंका कष्ट हरण करनेवाले, हर तरहसे समर्थ और ऐश्वर्य- वान् हैं ॥१॥ समुद्र-मंथनके बाद जब हलाहल विषकी ज्वालासे देवता और असुर जलने लगे, तब आप अपनी दीन-दयालुताका प्रण निभानेके लिए उस विषको पान कर गये । संसारको दुःख देनेवाले भयंकर दानव त्रिपुरासुरको आपने एक ही बाणमें मार डाला था ॥२॥ सन्त, वेद और सब पुराण कहते हैं कि जिस गतिकी प्राप्ति महामुनियोंके लिए अगम और दुर्लभ है, वही गति या मुक्ति आप अपने पुरमें अर्थात् काशीमें मृत्युके समय सदैव सबको समभावसे दिया करते हैं ॥ ३ ॥ सेवा करनेमें आप सुलभ हैं यानी सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। हे पार्वतीके पति ! हे परमज्ञानी ! आप कल्पवृक्षके समान उदार हैं। हे कामदेवको भस्म करनेवाले ! हे कृपानिधान ! तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें भक्ति दे दीजिये।

४ विनय-पत्रिका विशेष १—एक बार देवताओं और असुरोंने सुमेरु गिरिकी मथानी और शेषनाग- का दण्ड बनाकर समुद्रका मन्थन किया। मन्थन करनेपर सबसे पहले हलाहल विष निकला। उसकी असह्य ज्वालासे दशों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं। देवता और दैत्य त्राहि-त्राहि करने लगे। और कोई उपाय न देखकर सबने भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी शरण ली। शिवजी प्रकट हुए और देवों-दैत्योंके कल्याणार्थ उसे पान कर गये। परन्तु शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि उनके हृदयमें ईश्वर अपनी अखिल सृष्टिके साथ विराजमान हैं। अतः उन्होंने उस विषको कण्ठमें ही रोक लिया—नीचे नहीं उतरने दिया। इससे उनका कण्ठ नीला हो गया। तभीसे वह 'नीलकण्ठ' कहलाने लगे। २—त्रिपुरासुरके घोर अत्याचारसे तीनों लोकोंको पीड़ित देखकर शिवजीने एक ही बाणमें उसे मार गिराया था। तभीसे उनका नाम 'त्रिपुरारि' पड़ा। ३—काशीखण्डमें लिखा है 'काश्यां मरणान्मुक्तिः' अर्थात् काशीमें मरनेसे मुक्ति होती है। कहते हैं कि यहाँ मृत्युके समय भगवान् शंकर रामतारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, इसलिए उस मनुष्यका अज्ञानान्धकार तत्क्षण दूर हो जाता है और वह ज्ञानोदय होनेके कारण मुक्त हो जाता है। राग धनाश्री ( ४ ) दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीनदयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं ॥१॥ मारिकै मार थप्यो जगमें, जाकी प्रथम रेख भट माहीं। ता ठाकुर को रीझि निवाजिबौ, कह्यो क्यों परत मो पाहीं॥२॥ जोग कोटि करि जो गति हरिसों, मुनि माँगत सकुचाहीं। वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं ॥३॥ ईस उदार उमापति परिहरि, अनत जे जाचन जाहीं। तुलसिदास ते मूढ़ माँगने, कबहुँ न पेट अघाहीं ॥४॥

विनय-पत्रिका ५ शब्दार्थ—दिबोई = देना ही। सोहाहीं = अच्छे लगते हैं। मार = कामदेव। थप्यो = स्थापित किया, रहने दिया। निवाजिबौ = कृपा करना। पुरारि-पुर = काशी। अनत = अन्यत्र। जाँचन = माँगने। भावार्थ—शिवजीके समान दानी कहीं (कोई) नहीं है। वह दीनदयालु हैं, देना ही उन्हें अच्छा लगता है। भिखमंगे उन्हें सदैव प्रिय लगते हैं ॥१॥ योद्धाओंमें अग्रगण्य कामदेवको भस्म करके फिर उसे संसारमें रहने दिया, ऐसे प्रभुका रीझकर कृपा करना मुझसे कैसे कहा जा सकता है! ॥२॥ अनेक तरहसे योगाभ्यास करके मुनिगण जिस मोक्षको भगवान्‌से माँगनेमें संकोच करते हैं, उस मोक्षपदको शिवकी पुरी काशीमें कीट-पतंगतक पा जाते हैं, यह वेदोंमें विदित या प्रकट है ॥३॥ ऐसे ऐश्वर्यवान् परम उदार शिवजीको छोड़ कर जो लोग अन्यत्र माँगने जाते हैं, वे मूर्ख हैं; तुलसीदास कहते हैं कि उन मूर्खोंका पेट माँगनेसे कभी भी नहीं भरता ॥४॥ विशेष १—जब शिवजीने कामदेवको भस्म किया, तब कामदेवकी स्त्री रति अत्यन्त दुःखिनी होकर विरह-विलाप करने लगी। इससे महाराज शिवजीको दया आ गयी और उन्होंने कामदेवको अनंग (बिना शरीर) रूपसे संसारमें रहने दिया। इससे उनकी दयालुताका परिचय मिलता है। बावरो रावरो नाह भवानी। दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद बड़ाई भानी ॥१॥ निज घर की घर-बात बिलोकहु, हौ तुम परम सयानी। सिव की दयी सम्पदा देखत, श्री सारदा सिहानी ॥२॥ जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुख की नहीं निसानी। तिन रंकन को नाके सँवारत, हौं आयौ नकबानी ॥३॥ दुख दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी। यह अधिकार सौंपिये औरहिं, भीख भली मैं जानी ॥४॥

६ विनय-पत्रिका प्रेम-प्रसंसा-विनय-व्यंगजुत, सुनि बिधि की वरबानी। तुलसी मुदित महेस मनहि मन, जगत-मातु मुसुकानी ॥५॥ शब्दार्थ—बावरो = बावला, पागल। रावरो = आपके। नाह = स्वामी। सिहानी = सिहाती हैं। नाक=स्वर्ग। नकवानी = नाकों दम। भानी (यह भणित शब्दका अपभ्रंश है) = कहा है। भावार्थ—(शिवजीकी अत्यधिक उदारता देखकर पार्वतीके पास जाकर ब्रह्मा कहने लगे) हे भवानी ! आपके पति पागल हैं। वह ऐसे दानी हैं कि जिन्होंने कभी कुछ भी नहीं दिया है, उन्हें भी वे प्रतिदिन दिया करते हैं; (तारीफ तो यह है कि) उनकी यह बड़ाई वेदने कही है ॥१॥ आप परम सयानी हैं, जरा अपने घरकी घरेलू बातको देखिये (देते-देते अपना घर खाली करते जा रहे हैं)। शिवकी दी हुई सम्पत्तिको देखकर लक्ष्मी और सरस्वती भी सिहा रही हैं॥२॥ जिन लोगोंके ललाटमें मैंने सुखका नाम-निशानतक नहीं लिखा था, उन कंगालोंके लिए स्वर्गकी सजावट करते-करते मेरे नाकोंदम आ गया है ॥३॥ दुखियोंके दुःख और दीनता भी दुखी है; याचकता व्याकुल हो गयी है (क्योंकि अब दुःख, दीनता और याचकताको कहीं भी रहनेके लिए ठौर नहीं है)। यह अधिकार किसी दूसरेको सौंप दीजिये; (मैं इसे नहीं ले सकता) मैं समझ गया कि इस पदका अधिकारी होनेकी अपेक्षा भीख अच्छी है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि प्रेम, प्रशंसा, विनय और व्यंग्य-भरी ब्रह्माकी सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी मन् ही मन् प्रसन्न हो उठे और जगज्जननी पार्वतीजी मुसकराने लगीं ॥५॥ विशेष १—इस पदमें 'ब्याज-स्तुति' अलंकार है। जहाँ सीधे अर्थको छोड़कर घुमाव-फिरावसे दूसरा भाव प्रकट किया जाता है, वहाँ ब्याज या व्यंग्य होता है। निन्दामें स्तुति प्रकट करनेको ब्याज-स्तुति कहते हैं और स्तुतिमें निन्दाका भाव प्रकट करनेको ब्याज-निन्दा कहते हैं। ये ही इस अलंकारके दो भेद हैं। ब्याज-स्तुतिका उदाहरण सामने है। ब्याज-निन्दा अलंकारका भी एक उदाहरण ले लीजिये— नीक दीन हरि सुन्दरताई। —रामचरितमानस

विनय-पत्रिका ७ २—'वेद बड़ाई भानी'—का अर्थ कुछ लोगोंने 'वेदोंकी मर्यादा तोड़कर' किया है। पर यह अर्थ ठीक नहीं। क्योंकि एक तो 'बड़ाई' का अर्थ 'मर्यादा' हो ही नहीं सकता, दूसरे शिवजी वेदोंकी मर्यादाके रक्षक हैं, उसके तोड़नेवाले नहीं। लिखा है:— वेदानुवर्त्तिनं रुद्रं देवं नारायणं तथा। —इति कौर्मे १३ अध्यायः ३—'निज घरकी घर बात'के स्थानपर कहीं-कहीं 'निज घरकी बर बात' पाठ भी है। इसका अर्थ है अपने घरकी बड़ी बात। राग रामकली ( ६ ) जाँचिये गिरिजापति, कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥ औढर-दानि द्रवत पुनि थोरे। सकत न देखि दीन कर जोरे ॥२॥ सुख संपति मति सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥३॥ गये सरन आरत के लीन्हे। निरखि निहाल निमिष महँ कीन्हे ॥४॥ तुलसिदास जाचक जस गावै। बिमल भगति रघुपति की पावै ॥५॥ शब्दार्थ—अनिमादिक = अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ। औढर-दानि = बिना समझे बूझे बड़ी से बड़ी वस्तुको दे डालनेवाले। द्रवत = पिघल जाते हैं। सुगति = मोक्ष। निमिष = पलभरमें। भावार्थ—पार्वतीके पति शिवजीसे ही याचना करनी चाहिये। जिनका घर काशीमें है और अणिमा आदि आठो सिद्धियाँ जिनकी चेरी हैं॥१॥ एक तो शिवजी औढरदानी हैं, दूसरे थोड़ी ही सेवामें पिघल जाते हैं। वह दीनोंको हाथ जोड़कर (अपने सामने) खड़े नहीं देख सकते ॥२॥ शंकरकी सेवासे सुख, सम्पत्ति, सुबुद्धि और सुन्दर गति आदि सब वस्तुएँ सुलभ हो जाती हैं ॥३॥ उन्होंने आर्त्त होकर शरणमें गये हुए जीवोंको अपना लिया और पलभरमें ही देखते-देखते उन्हें निहाल कर दिया है ॥४॥ याचक तुलसीदास इसी आशासे उनका यश गाता है ताकि उसे श्रीरघुनाथजीकी पवित्र भक्ति मिले ॥५॥

८ विनय-पत्रिका विशेष १—अणिमादिक—आठ सिद्धियोंमें एक सिद्धिका नाम है। आठ सिद्धियाँ ये हैं—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। ( ७ ) कस न दीन पर द्रबहु उमावर। दारुन बिपति हरन, करुनाकर ॥१॥ बेद पुरान कहत उदार हर। हमरि बेर कंस भयउ कृपिनतर ॥२॥ कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज। ह्वै प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज॥ जो गति अगम महामुनि गावहिं। तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥४॥ देहु काम-रिपु, राम-चरन-रति। तुलसिदास प्रभु हरहु भेद-मति ॥५॥ शब्दार्थ—कृपिनतर = अधिक कृपण। भेदमति = भेदबुद्धि; 'मैं और मेरा' यही भेद- बुद्धि है। भावार्थ—हे उमावर ! आप मुझ दीनपर क्यों नहीं दयार्द्र होते ? आप तो घोर विपत्तियोंको हरनेकी कृपा करनेवाले हैं॥१॥ वेद और पुराण तो कहते हैं कि शिवजी अत्यन्त उदार हैं; किन्तु मेरी बारी आनेपर आप इतने अधिक कृपण क्यों हो गये ? ॥२॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मणने कौन-सी भक्ति की थी, जिसे आपने प्रसन्न होकर कैवल्य पद दे डाला ? ॥३॥ बड़े-बड़े मुनि जिस मोक्षको दुर्लभ कहते हैं, आपके पुर (काशी) में वह मोक्ष कीट-पतंगोंको भी मिल जाता है ॥४॥ हे कामदेवको दहन करनेवाले शिवजी ! तुलसीदासको श्रीरामचरणोंकी भक्ति दीजिये। हे प्रभो ! उसकी भेदबुद्धि हर लीजिये ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने शिवजीके लिए उदार दानी तथा काशीमें कीट-पतंगको मुक्त करनेकी बात कई बार कही है। जैसे, 'वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं।' 'तव पुर कीट पतंगहु पावहिं।' इससे तुलसीदासजीका यह भाव प्रकट होता है कि क्या शिवजी उन्हें कीट-पतंग समझ कर भी उनकी मनोभिलाषा पूरी न करेंगे ? शिवजी बड़े दानी हैं, क्या याचककी माँग पूरी न

करेंगे ? क्योंकि काशीमें ही तो गोस्वामीजी भी रहते थे ! “गाँव बसत वामदेव”—कहा भी है। २—गुणनिधि नामक ब्राह्मण चोर था। एक दिन वह घण्टा चुरानेके लिए शिव-मन्दिरमें गया। घण्टा ऊँचा था, अतः उसे खोलनेके लिए वह शिवमूत्तिके ऊपर चढ़ गया। शिवजीने प्रसन्न होकर कहा,—माँग वर। और लोग तो पत्र- पुष्प चढ़ाते हैं, पर तूने आज हमपर अपना शरीर ही चढ़ा दिया, इससे हम तुझपर बहुत प्रसन्न हैं। इस प्रकार शिवजीकी कृपासे वह कैवल्य-पदका अधि- कारी हो गया।

( ८ ) देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे। किये दूर दुख सबनिके, जिन जिन कर जोरे ॥१॥ सेवा सुमिरन पूजिबो, पात आखत थोरे। दियो जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ॥२॥ गाँव बसत बामदेव, मैं कबहुँ न निहोरे। अधिभौतिक बाधा भई, ते किंकर तोरे ॥३॥ वेगि बोलि बलि बरजिये, करतूति कठोरे। तुलसी दलि रुँध्यो चहँ, सठ साखि सिहोरे ॥४॥

शब्दार्थ—भोरे = भोले। पात = बेलपत्र। आखत = अक्षत। गज = हाथी। बामदेव = शिवजी। किंकर = दास। वरजिये = मना कर दीजिये। सिहोरे = धूहड़का वृक्ष, सेहुड़।

भावार्थ—हे शंकर ! आप महादेव हैं, महादानी हैं और बहुत भोले हैं। जिन-जिन लोगोंने आपके सामने हाथ जोड़े, आपने उन सबके दुःख दूर कर दिये ॥१॥ आपकी सेवा, स्मरण और पूजा थोड़े-से बेलपत्र और अक्षतसे ही हो जाती है। उसके बदले आप संसारकी सब सुख-सामग्री—हाथी, रथ, घोड़े इत्यादि दे डालते हैं ॥ २ ॥ हे बामदेव ! मैं आपके गाँव (काशी) में रहता हूँ, पर अबतक आपसे कुछ नहीं माँगा। अब मुझे आधिभौतिक बाधाएँ सता रही हैं, वे आधिभौतिक दुःख आपके दास हैं ॥ ३ ॥ इसलिए आप इन कठोर करतूत- वालोंको शीघ्र बुलाकर मना कर दीजिये, मैं आपकी बलैया लेता हूँ। क्योंकि

१. गणेश, सूर्य व शिव स्तुति

१० विनय-पत्रिका ये दुष्ट तुलसीदलको थूहड़की डालियोंसे रुँधना चाहते हैं, तुलसीदासको आधि- भौतिक बाधाएँ कुचल डालना चाहती हैं ॥ ४ ॥ विशेष १—'अधिभौतिक'—ताप तीन तरहके माने गये हैं, आधिदैविक, आधि- भौतिक और आध्यात्मिक । शारीरिक रोगादि आधिदैविक ताप हैं । किसी प्राणीसे जो कष्ट पहुँचता है, उसे आधिभौतिक ताप कहते हैं; इसी प्रकार प्रारब्धवशात् दैवेच्छासे जो कुछ भोगना पड़ता है उसे आध्यात्मिक ताप कहते हैं । 'तुलसी'—यहाँ तुलसी शब्दसे तुलसीदास और तुलसी-वृक्ष दोनोंका ही बोध होता है । ( ९ ) सिव सिव होइ प्रसन्न करु दाया । करुनामय उदार कीरति, वलि जाउँ, हरहु निज माया ॥१॥ जलज-नयन, गुन-अयन मयन-रिपु, महिमा जान न कोई । बिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई ॥२॥ ऋषय, सिद्ध, मुनि, मनुज, दनुज, सुर अपर जीव जग माहीं । तव पद बिमुख न पार पाव कोउ, कलप कोटि चलि जाहीं ॥३॥ अहि-भूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव, त्रिपुरारी । मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन सोक-भयहारी ॥४॥ गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी । तुलसिदास हरि-चरन-कमल-बर, देहु भक्ति अविनासी ॥५॥ शब्दार्थ—मयन = कामदेव । अपर = दूसरे । अहि = सर्प । निहार = पाला । मराल = हंस । कासीस = काशीके ईश, शंकरजी । भावार्थ—हे शिव ! हे शिव ! प्रसन्न होकर दया करो । आप करुणामय हैं, आपकी यश-कीर्ति सब ओर फैली हुई है । मैं आपकी बलि जाता हूँ, अपनी माया हर लो ॥ १ ॥ हे कमल-नेत्र ! आप सर्वगुणसम्पन्न हैं, और कामदेवको भस्म करनेवाले हैं; आपकी महिमा कोई नहीं जानता । आपकी कृपाके बिना

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विनय-पत्रिका ११ रामचन्द्रजीके चरण-कमलोंमें, स्वप्नमें भी भक्ति नहीं हो सकती ॥ २ ॥ ऋषि, सिद्ध, मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता तथा संसारमें अन्य जितने जीव हैं, आपके चरणोंसे विमुख होकर भव-सागरका पार नहीं पाते—कल्प-कल्पान्त बीतता चला जाता है ॥ ३ ॥ सर्प आपके आभूषण हैं और दूषण दैत्यके मारनेवाले श्रीरामजीके आप सेवक हैं। हे देवाधिदेव, आप त्रिपुरासुरके संहारकर्ता हैं। हे शंकर ! आप अज्ञान-रूपी पालाके लिए सूर्य हैं, और शरणागतोंका शोक और भय दूर करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ हे काशीपुरीके स्वामी ! आप पार्वतीके मन- रूपी मानसरोवरके हंस हैं, और श्मशान-निवासी हैं। तुलसीदासको श्रीहरिके श्रेष्ठ चरणारविन्दोंमें अटल भक्ति दीजिये ॥ ५ ॥ विशेष १—प्रारम्भमें दो बार 'सिव सिव' कहना आर्त्ति-सूचक है। इसे वीप्सा कहते हैं। राग धनाश्री ( १० ) मोह-तम तरनि, हर रुद्र संकर सरन, हरन मम सोक लोकाभिरामं । बाल-ससि भाल, सुविसाल लोचन-कमल, काम-सत-कोटि-लावन्य-धामं कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-विग्रह रुचिर, तरुन-रबि कोटि तनु-तेज भ्राजै । भस्म सर्वांग अर्धांग सैलात्मजा, ब्याल-नृकपाल-माला विराजै ॥२॥ मौलि संकुल जटा-मुकुट विद्युच्छटा, तटिनि-बर-वारि हरि-चरन-पूतं श्रवन कुंडल, गरल कंठ, करुनाकन्द, सच्चिदानन्द वन्देऽवधूतं ॥३॥ सूल-सायक-पिनाकासि कर, सत्रु-वन,दहन इव धूमध्वज, वृषभ-जानं व्याघ्र-गज-चर्म-परिधान, विज्ञान-घन, सिद्ध-सुर-मुनि मनुज-सेव्यमानं तांडवित-नृत्यपर, डमरु डिंडिम प्रवर, असुभ इव भाति कल्यानरासी महा कल्पान्त ब्रह्मांड मंडल दवन, भवन कैलास आसीन कासी ॥५॥ तज्ञ, सर्वज्ञ, जज्ञेस, अच्युत, विभो, विस्व भवदस संभव पुरारी । ब्रह्मेन्द्र, चन्द्रार्क, वरुनाग्नि, वसु, मरुत, जम, अर्चि भवदंघ्रि सर्वाधिकारी

१२ विनय-पत्रिका अकल, निरुपाधि, निर्गुन, निरंजन ब्रह्म, कर्म-पथमेकमज निर्विकारं। अखिल विग्रह, उग्ररूप, सिव, भूप सुर, सर्वगत, सर्व, सर्वोपकारं ॥७॥ ज्ञान-वैराग्य धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य सिव सानुकूलं। तदपि नर मूढ़ आरूढ़ संसार-पथ, भ्रमत भव विमुख तव पाद मूलं॥८॥ नष्टमति, दुष्ट अति, कष्ट-रत खेद-गत, दास तुलसी संभु सरन आया। देहि कामारि ! श्रीरामपदपंकजे, भक्ति अनवरत गत भेद माया ॥९॥ शब्दार्थ-मम = मेरा। लोकाभिरामं = समूचे संसारको प्रसन्न करनेवाले। बाल ससि = द्वितीयाके चन्द्रमा। कम्बु = शंख। कुन्देन्दु = कुन्द+इन्दु। विग्रह = शरीर। रुचिर = सुन्दर। ब्याल = सर्प। मौलि = मस्तक। पूत = पवित्र किया हुआ। तज्ञ = ब्रह्मस्वरूपको जाननेवाले। भवदंघ्रि = आपके चरणोंकी। भावार्थ-हे हर, हे रुद्र, हे शंकर ! आप शरणागतजनोंके मोहान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्य-स्वरूप हैं। इसलिए हे लोकाभिराम, मेरे शोकको आप दूर कीजिये। आपके ललाटपर दूजके बाल-चन्द्र हैं, आपकी बड़ी-बड़ी आँखें कमलके समान हैं। आप करोड़ों कामदेवके समान सुन्दरताके घर हैं ॥१॥ आपका सुन्दर शरीर शंख, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान है। आपके शरीर- में करोड़ों मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेज विराजमान है। आप अंग-प्रत्यंगमें भस्म लगाये रहते हैं और आपके आधे शरीरमें हिमाचल-कन्या पार्वती सुशोभित हैं। आपके गलेमें सर्पों और नर-मुण्डोंकी माला विराजमान है ॥२॥ मस्तकपर जटा-जूटका मुकुट है, उसपर विष्णु भगवान्के चरणोंसे पवित्र हुई गंगाजीकी छटा बिजलीके समान चमक रही है। कानोंमें कुण्डल और कण्ठमें हलाहल विष धारण करनेवाले करुणाकन्द, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप अवधूत भगवान् शंकरजी, मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥३॥ आपके हाथमें त्रिशूल, बाण, धनुष और तलवार है। शत्रु-रूपी वनको जलानेके लिए आप अग्निस্বরূপ हैं; बैल ही आपकी सवारी है। बाघ और हाथीका चमड़ा आपका वस्त्र है। आप ब्रह्मज्ञानकी वर्षा करनेवाले मेघ हैं। सिद्ध, देवता, मुनि, मनुष्यसे आप सेवित हैं ॥४॥ तांडव नृत्यपर आप डमरू बजाते हैं। उसकी आवाज डिम-डिम-डिम- डिम होती है। (उसीसे व्याकरणके चौदहो सूत्र निकले हैं) आप अशुभके समान जान पड़ते हैं; पर हैं कल्याणमूर्ति। महाप्रलयके समय आप समूचे-

विश्व-ब्रह्माण्डको भस्म कर डालते हैं; कैलास आपका घर है, और काशीमें आप बैठे रहते हैं ॥५॥ आप तत्त्वके जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, यज्ञोंके स्वामी हैं, अच्युत हैं और व्यापक हैं। हे पुरारि, यह विश्व-ब्रह्मांड आपके ही अंशसे उत्पन्न हुआ है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, अग्नि, अष्टवसु, उनचास पवन और यमराज आपके ही चरणकी पूजा करके सब तरहके अधिकारी हुए हैं ॥६॥ आप कला-रहित (यानी घटते-बढ़ते नहीं), उपाधि-रहित, निर्गुण, माया-रहित साक्षात् ब्रह्म हैं। आप कर्म-पथमें एक हैं। आप जन्म-रहित और विकार-रहित हैं। हे शंकरजी, सारा ब्रह्माण्ड आपका शरीर है, आपका रूप बड़ा भयानक है; आप देवताओंके स्वामी हैं। हे शिव ! आप सर्वगत और सबका उपकार करने- वाले हैं ॥७॥ हे शिवजी, आपके प्रसन्न रहनेपर ज्ञान, वैराग्य, धन, धर्म, मोक्ष और सुन्दर सौभाग्य यह सब प्राप्त हो जाते हैं। फिर भी मूर्ख मनुष्य आपके चरणारविन्दोंसे विमुख होकर सांसारिक मार्गपर आरूढ़ हैं और संसारमें ही भटक रहे हैं ॥८॥ हे शम्भो ! नष्टबुद्धि, अत्यन्त दुष्ट, कष्टमें लीन और दुःखी तुलसीदास आपकी शरण आया है। हे कामारि ! माया-जनित भेद-बुद्धि दूर करके उसे श्रीरामचन्द्रके चरण-कमलोंमें अनन्य भक्ति दीजिये ॥१०॥

विशेष १- 'कम्बु कुन्देन्दु-कर्पूर' - चारोका तात्पर्य उज्ज्वलतासे है। शिवजीका शरीर शंखके समान उज्ज्वल और चिकना है, कुन्दपुष्पके समान कोमल है, चन्द्रमाके समान शीतल है और कपूरके समान सुगन्धित है। इसीसे गोस्वामी- जी ने 'कम्बु-कुन्देन्दु कर्पूर विग्रह' कहा है। २-जिस समय विष्णु भगवान्ने वामनरूप धारण करके राजा बलिकी दी हुई तीन पैर भूमि नापनेके लिए अपना शरीर बढ़ाया था, उस समय ब्रह्माने पैरको धोकर चरणोदकको कमण्डलुमें रख लिया था। वही जल गंगाका मूल कारण है, इसीसे 'हरिचरण-पूतं' कहा गया है। ३- 'निर्विकार'-जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश ये षट्-विकार हैं; भगवान् शिव इन षट्-विकारोंसे रहित हैं, इसलिए उन्हें निर्विकार कहा गया है।

१४ विनय-पत्रिका भैरवरूप शिवस्तुति ( ११ ) भीषणाकार भैरव भयंकर भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति विपत्ति-हरता । मोह-मूपक-मार्जार, संसार-भय-हरन, तारन-तरन, अभय-करता ॥१॥ अतुल-बल विपुल विस्तार विग्रह गौर, अमल अति धवल धरनीधरभं । सिरसि संकुलित-कल-जूटपिंगलजटा, पटल सत-कोटि विद्युच्छटाभं ॥२॥ भ्राज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव सोभा विचित्रं । ललित ललाटपर राज रजनीस-कल, कलाधर नौमि हर धनद मित्रं ॥३॥ इन्दु-पावक भानु-नयन मर्दन मयन, गुन-अयन ज्ञान-विज्ञान-रूपं । ख्वन-गिरिजा भवन भूधराधिप सदा, श्रवन कुंडल वदन छवि अनूपं ॥४॥ चर्म्म-असि-सूल-धर,डमरु-सर-चाप कर, जान वृषभेस करुना-निधानं । जरत सुर-असुर नर-लोक सोकाकुलं,मृदुलचित अजित कृत गरलपानं ॥५॥ भस्म तनु भूषनं, व्याघ्र चम्मोम्बरं, उरग-नर-मौलि उर-मालधारी । डाकिनी साकिनी खेचरं भूचरं जंत्र मंत्र भंजन प्रवल कल्मपारी ॥६॥ काल अतिकाल कलिकाल व्यालाद खग, त्रिपुर-मर्दन भीम कर्मभारी । सकल लोकान्त-कल्पान्त सूलाग्रकृत, दिग्गजाब्यक्त गुन नृत्यकारी ॥७॥ पाप-सन्ताप घनघोर-संस्कृति दीन भ्रमत जग-जोनि नहिं कोपि त्राता । पाहि भैरव रूप राम रूपी रुद्र, बन्धु, गुरु, जनक जननी विधाता ॥८॥ यस्य गुन-गन गनति विमलमसि सारदा, निगम नारद प्रमुख ब्रह्मचारी । सेस सर्वैस आसीन आनन्द-वन, दास तुलसी प्रनत त्रासहारी ॥९॥ शब्दार्थ—एक भैरव = शिवजीका एक नाम। वामन पुराणके ६७ वें अध्यायमें अष्ट भैरवका उल्लेख है। विग्रह = शरीर। मार्जार = बिलाव। धरनीधर = शेषनाग अथवा हिमालय पर्वत। कल = सुन्दर। पटल = समूह, राशि। विबुधापगा = देवनदी गंगा। मौलि = मस्तक। धनद = कुबेर। मयन = कामदेव। ख्वन = कान। चर्म = ढाल। वृषभ + ईस = बैलोंमें श्रेष्ठ नन्दी। खेचर = आकाशमें विचरण करनेवाले। कल्मष + अरि = पापको भस्म करने- वाले। ब्याल + आद = साँपको भक्षण करनेवाले। कोपि = कोई भी। निगम = वेद। भावार्थ—हे भीषणाकार भैरव ! हे भयंकर भूत-प्रेत और गणोंके स्वामी !

विनय-पत्रिका १५

आप विपत्तियोंको हरनेवाले हैं। आप अज्ञानरूपी चूहेका नाश करनेवाले बिलाव हैं; संसारका भय हरनेवाले हैं; संसारके जीवोंको तारनेवाले और स्वयं मुक्त- स्वरूप तथा अभयदान करनेवाले हैं ॥१॥ आपके बलकी तुलना नहीं की जा सकती। आपका अत्यन्त विशाल गौर शरीर बहुत निर्मल है और उसकी उज्ज्वलता हिमालय पर्वतकी कान्तिके समान है। सिरपर पीले रंगका सुन्दर जटाजूट सुशोभित है जिसकी आभा करोड़ों बिजलियोंकी राशिके समान है ॥२॥ मस्तकपर मालाके समान गंगाजीका परम पवित्र जल विराजमान है, जिसकी शोभा ही विचित्र है। आपके सुन्दर ललाटपर निशानाथ चन्द्रमाकी कला शोभित है। ऐसे कुबेरके मित्र शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य आपके नेत्र हैं; आप कामदेवको जला चुके हैं; आप गुणोंके भण्डार हैं और ज्ञान-विज्ञानस्वरूप हैं। हे गिरिजा-रमण, आपका भवन कैलास-पर्वत है; आप सदैव कानोंमें कुण्डल धारण किये रहते हैं; आपके मुखकी छवि अनुपम है ॥४॥ आप अपने हाथमें ढाल, तलवार, शूल, डमरू, बाण और धनुष धारण किये रहते हैं। नन्दी नामक बैल आपकी सवारी है और आप करुणाके भण्डार हैं। (करुणा-निधान होनेके कारण ही आपने) विषकी अजेय ज्वालासे देव-दैत्य और मनुष्यलोकको जलते हुए तथा शोकमें व्याकुल देखकर उसे पान कर लिया था,—ऐसे आप कोमल चित्तवाले हैं ॥५॥ भस्म ही आपके शरीरका आभूषण है, बाघका चमड़ा ही वस्त्र है; आप अपने हृदयपर सर्पों और नरमुण्डोंकी माला धारण किये हुए हैं। डाकिनी, शाकिनी, खेचर, भूचर तथा यन्त्र-मन्त्रका आप नाश करनेवाले हैं। बड़े-बड़े पापोंके तो आप शत्रु हैं ॥६॥ आप कालके महाकाल हैं, कलिकालरूपी सर्पको भक्षण करनेके लिए गरुड़ हैं। आप त्रिपुरासुरको मारनेवाले तथा बड़े-बड़े भयंकर कर्म करनेवाले हैं। आप सब लोकोंके नाशक, तथा महाप्रलयके समय अपने त्रिशूलकी नोकसे दिशारूपी हाथियोंको छेदकर निर्गुणरूपसे नृत्य करनेवाले हैं ॥७॥ इस पाप-सन्तापसे परिपूर्ण भयानक संसारकी चौरासी लाख योनियोंमें मैं दीन होकर भ्रमण कर रहा हूँ, मेरी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हे भैरवरूप ! हे रामरूपी रुद्र ! मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता आप ही हैं ॥८॥ निर्मल बुद्धिवाली सरस्वती, वेद और नारदके समान प्रधान ब्रह्मचारी

१६ विनय-पत्रिका तथा शेषनाग जिनकी गुणावलीका वर्णन करते हैं, ऐसे सर्वेश्वर, आनन्दवन (काशी) में विराजमान भयको हरनेवाले शिवजीको तुलसीदास प्रणाम करता है ॥९॥ विशेष १—शिवजीका भैरवरूप चतुर्भुजी कहा गया है कालिकापुराणके ६० वें अध्यायमें लिखा है— भैरवः पाण्डुनाथश्च रक्तगौरश्चतुर्भुजः। किन्तु यहाँ गोस्वामीजीने उस रूपका वर्णन न करके किसी और ही रूपका वर्णन किया है,। २—धरणीधराभं—का अर्थ 'शेषनागकी कान्तिके समान' भी किया जा सकता है। ३—'भैरवरूप रामरूपी रुद्र'—कहनेका आशय यह है कि भैरवरूपसे संसारका भय दूर कीजिये और रामरूपसे मुझे अपनाइये। दनुज-वधके समय भगवान्‌का रुद्ररूप था। ( १२ ) संकरं सम्प्रदं सज्जनानन्ददं, सैल-कन्या-वरं परम रम्यं। काम-मद-मोचनं तामरस-लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥ कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-गौरं शिवं, सुन्दरं सच्चिदानन्द कन्दं। सिद्ध-सनकादि योगीन्द्र-वृन्दारका, विष्णु-विधि-वन्द्य चरनारविन्दं ॥२ ब्रह्म कुल वल्लभं, सुलभमति दुर्लभं, विकट वेषं विभुं, वेदपारं। नौमि करुनाकरं गरल गंगाधरं, निर्मलं निर्गुनं निर्विकारं ॥३॥ लोकनाथं सोकसूल निर्मूलिनं, सूलिनं मोह-तम-भूरि-भानुं। कालकालं, कलातीतमजरं हरं, कठिन कलिकाल कानन कृसानुं ॥४॥ तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसम्भवं, सर्वगं सर्वसौभाग्यमूलं। प्रचुर भव-भंजनं, प्रनत जनरंजनं, दासतुलसी सरन सानुकूलं ॥५॥ शब्दार्थ—तामरस = कमल। कन्द = मेघ। वृन्दारका = देवता। विभु = व्यापक। निर्विकार = विकाररहित। भानु = सूर्य। कृसानु = अग्नि। तज्ञ = तत्त्ववेत्ता। पाथोधि = समुद्र। घट-सम्भव = घड़ेसे उत्पन्न, अगस्त्य ऋषि।

विनय-पत्रिका १७ भावार्थ—कल्याणकर्ता, कल्याणदाता, सज्जनोंको आनन्द देनेवाले, पार्वती- जीके स्वामी, अत्यन्त सुन्दर, कामदेवके मदको चूर्ण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले भावगम्य शिवजीको मैं भजता हूँ ॥१॥ आपका सुन्दर शरीर शंख, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान गौर है। आप सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप हैं। आपके चरणारविन्दकी वन्दना सिद्ध, सनकादि (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार), बड़े-बड़े योगी, देवता, विष्णु और ब्रह्मा करते हैं॥२॥ आपको ब्राह्मण- कुल प्रिय है अथवा ब्रह्मवंशके आप परमप्रिय हैं; आपका प्राप्त होना सुलभ भी है और दुर्लभ भी। आपका वेष विकट है; आप व्यापक हैं और वेदोंके ज्ञानसे परे हैं। ऐसे करुणाकर, हलाहल विष और गंगाजीको धारण करनेवाले, निर्मल, निर्गुण और निर्विकार शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ आप सब लोकोंके स्वामी, शोकों और दुःखोंको निर्मूल करनेवाले, त्रिशूलधारी और मोहान्धकारको दूर करनेके लिए अनन्त सूर्यके समान हैं। आप कालके भी काल और कलातीत अर्थात् सदा एकरस और अजर हैं। शिवजी कठिन कलिकालरूपी वनको भस्म कर डालनेके लिए अग्नि-स्वरूप हैं ॥४॥ आप तत्त्ववेत्ता हैं और, अज्ञानरूपी समुद्रको पी जानेके लिए साक्षात् अगस्त्य हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं और सब प्रकारके सौभाग्यके मूल कारण हैं। आप संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंका नाश करनेवाले, तथा शरणागतोंको आनन्द देनेवाले हैं। सेवक तुलसीदास आपकी शरण है—उसपर कृपा कीजिये ॥५॥ विशेष 'पाथोधि-घट-सम्भवं'—समुद्रके तटपर एक टिटिहा अपनी टिटिहरीके साथ निवास करता था। समुद्र उनके अण्डे बराबर बहा ले जाता था। इससे एक बार वे दोनों समुद्रपर बहुत क्रुद्ध हुए। दोनों ही चोंचमें बालू भर-भरकर लगे समुद्रमें छोड़ने। इस प्रकार वे समुद्रको पाट डालना चाहते थे। अचानक वहाँ अगस्त्य ऋषि पहुँच गये। पक्षियोंका दुःख देखकर उनका दिल भर आया। उन्होंने उन्हें सान्त्वना देते हुए 'ॐ राम' मन्त्रका उच्चारण कर तीन बार आच- मन किया। तीन ही आचमनमें समुद्रका जल बिलकुल सूख गया। इससे जलमें रहनेवाले जीव व्याकुल हो उठे। देवताओंके विनय करनेपर महर्षिने मूत्र- द्वारा समुद्रको बाहर निकाला। तभीसे समुद्र अपेय (खारा) हो गया। २

१८ विनय-पत्रिका 'निर्विकार'—विकार छः हैं—जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और नाश। इन छ विकारोंसे भगवान् शिव रहित हैं। राग बसन्त ( १३ ) सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु । कल्यान-अखिल-प्रद कामधेनु ॥१॥ कर्पूर गौर करुना उदार । संसार-सार, भुजगेन्द्र हार ॥२॥ सुख-जन्म-भूमि, महिमा अपार । निर्गुन, गुन-नायक, निराकार ॥३॥ त्रय नयन, मयन-मर्दन महेस । अहंकार निहार उदित दिनेस ॥४॥ वर बाल-निसाकर मौलि भ्राज । त्रैलोक-सोकहर प्रमथराज ॥५॥ जिन्ह कहँ बिधि सुगति न लिखी भाल । तिन्हकी गति कासीपति कृपाल उपकारी कोऽपर हर समान । सुर-असुर जरत कृत गरल पान ॥७॥ बहु कल्प उपायन करि अनेक । बिनु संभु कृपा नहिं भव-विवेक ॥८॥ विज्ञान-भवन, गिरिसुता-रमन । कह तुलसिदास मम त्रास समन ॥९॥ शब्दार्थ—रेनु = रज, धूल। अखिल = सब। भुजगेन्द्र = वासुकि नाग। निहार = कुहरा, पाला। दिनेस = सूर्य। निसाकर = चन्द्रमा। प्रमथनाथ = गणोंके स्वामी। कोऽपर = (कः+अपर) दूसरा कौन। गरल = विष। भावार्थ—शिवजीके चरण-कमलोंकी रजका सेवन करो, वह रज सर्व कल्याणदायिनी कामधेनु है ॥१॥ शिवजी कपूरके समान गौर हैं। वह करुणा करनेमें उदार हैं; संसारके सार हैं और वासुकि नागका हार धारण करने- वाले हैं ॥२॥ वह सुखके जन्म-स्थान हैं, उनकी महिमा अपार है। वह त्रिगुणातीत हैं, सब गुणोंके स्वामी हैं और आकार-रहित हैं ॥३॥ शिवजी तीन नेत्रवाले हैं, कामदेवको ध्वंस करनेवाले हैं और अहंकाररूपी कुहरेके लिए उगे हुए सूर्य हैं ॥४॥ उनके मस्तकपर दूजके चन्द्रमा शोभा पा रहे हैं। वह तीनों लोकोंका शोक दूर करनेवाले हैं और गणोंके स्वामी हैं ॥५॥ ब्रह्माने जिन लोगोंके ललाटमें अच्छी गति नहीं लिखी, शिवजी ऐसे कृपालु हैं कि उन्हें भी मुक्ति दे देते हैं ॥६॥ देवों और दैत्योंको जलते देखकर जिन्होंने हलाहल

विनय-पत्रिका १९ विष पान किया, ऐसे महादेवजीके समान उपकारी संसारमें दूसरा कौन है ! ॥७॥ कल्प-कल्पान्ततक अनेक तरहके उपाय क्यों न करो, शिवजीकी कृपाके बिना संसारका विवेक यानी संसारके सत्-असत् आदिका ज्ञान नहीं हो सकता ॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि विज्ञानके घर तथा पार्वतीके पति शिवजी मेरे भयका नाश करनेवाले हैं ॥९॥ विशेष १—'निर्गुन'का अर्थ अशरीरी या निराकार भी है। किन्तु इस पदमें आगे निराकार भी कहा गया है, इसलिए यहाँ निर्गुनका अर्थ त्रिगुणातीत करना ही अधिक संगत है। सत्त्व-रज-तम ये ही तीन गुण हैं जिनसे सृष्टिकी उत्पत्ति होती है। २—'निराकार'—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच भूतोंसे बने हुए शरीरसे रहित। ३—'भव-विवेक'—इसका शाब्दिक अर्थ है संसारके स्वरूपका निश्चय। आशय यह कि शिव-कृपाके बिना वास्तविक ज्ञान—सत् और असत्‌का बोध नहीं होता। ( १४ ) देखो देखो, बन बन्यो आजु उमाकन्त । मानो देखन तुमहि आयी ऋतु बसन्त ॥१॥ जनु तनुदुति चम्पक-कुसुम-माल । वर बसन नील नूतन तमाल ॥२॥ कल कदलि जंघ पद कमल लाल । सूचत कटि केहरि, गति मराल ॥ भूषन प्रसून बहु विविध रंग । नूपुर किंकिनि कलरव विहंग ॥४॥ कर नवल बकुल-पल्लव रसाल । श्रीफल कुच, कंचुकि लता-जाल ॥५॥ आनन सरोज, कच मधुप गुंज । लोचन विसाल नवनील कंज ॥६॥ पिक बचन चरित बर बरहि कीरि । सित सुमन हास, लीला समीर७ कह तुलसिदास सुनु सिव सुजान । उर वसि प्रपंच रचे पंचवान ॥८॥ करि कृपा हरिय भ्रम फन्द काम । जेहि हृदय बसहिं सुखरासि राम९.