विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० विनय-पत्रिका ये दुष्ट तुलसीदलको थूहड़की डालियोंसे रुँधना चाहते हैं, तुलसीदासको आधि- भौतिक बाधाएँ कुचल डालना चाहती हैं ॥ ४ ॥ विशेष १—'अधिभौतिक'—ताप तीन तरहके माने गये हैं, आधिदैविक, आधि- भौतिक और आध्यात्मिक । शारीरिक रोगादि आधिदैविक ताप हैं । किसी प्राणीसे जो कष्ट पहुँचता है, उसे आधिभौतिक ताप कहते हैं; इसी प्रकार प्रारब्धवशात् दैवेच्छासे जो कुछ भोगना पड़ता है उसे आध्यात्मिक ताप कहते हैं । 'तुलसी'—यहाँ तुलसी शब्दसे तुलसीदास और तुलसी-वृक्ष दोनोंका ही बोध होता है । ( ९ ) सिव सिव होइ प्रसन्न करु दाया । करुनामय उदार कीरति, वलि जाउँ, हरहु निज माया ॥१॥ जलज-नयन, गुन-अयन मयन-रिपु, महिमा जान न कोई । बिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई ॥२॥ ऋषय, सिद्ध, मुनि, मनुज, दनुज, सुर अपर जीव जग माहीं । तव पद बिमुख न पार पाव कोउ, कलप कोटि चलि जाहीं ॥३॥ अहि-भूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव, त्रिपुरारी । मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन सोक-भयहारी ॥४॥ गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी । तुलसिदास हरि-चरन-कमल-बर, देहु भक्ति अविनासी ॥५॥ शब्दार्थ—मयन = कामदेव । अपर = दूसरे । अहि = सर्प । निहार = पाला । मराल = हंस । कासीस = काशीके ईश, शंकरजी । भावार्थ—हे शिव ! हे शिव ! प्रसन्न होकर दया करो । आप करुणामय हैं, आपकी यश-कीर्ति सब ओर फैली हुई है । मैं आपकी बलि जाता हूँ, अपनी माया हर लो ॥ १ ॥ हे कमल-नेत्र ! आप सर्वगुणसम्पन्न हैं, और कामदेवको भस्म करनेवाले हैं; आपकी महिमा कोई नहीं जानता । आपकी कृपाके बिना