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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 20

करेंगे ? क्योंकि काशीमें ही तो गोस्वामीजी भी रहते थे ! “गाँव बसत वामदेव”—कहा भी है। २—गुणनिधि नामक ब्राह्मण चोर था। एक दिन वह घण्टा चुरानेके लिए शिव-मन्दिरमें गया। घण्टा ऊँचा था, अतः उसे खोलनेके लिए वह शिवमूत्तिके ऊपर चढ़ गया। शिवजीने प्रसन्न होकर कहा,—माँग वर। और लोग तो पत्र- पुष्प चढ़ाते हैं, पर तूने आज हमपर अपना शरीर ही चढ़ा दिया, इससे हम तुझपर बहुत प्रसन्न हैं। इस प्रकार शिवजीकी कृपासे वह कैवल्य-पदका अधि- कारी हो गया।

( ८ ) देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे। किये दूर दुख सबनिके, जिन जिन कर जोरे ॥१॥ सेवा सुमिरन पूजिबो, पात आखत थोरे। दियो जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ॥२॥ गाँव बसत बामदेव, मैं कबहुँ न निहोरे। अधिभौतिक बाधा भई, ते किंकर तोरे ॥३॥ वेगि बोलि बलि बरजिये, करतूति कठोरे। तुलसी दलि रुँध्यो चहँ, सठ साखि सिहोरे ॥४॥

शब्दार्थ—भोरे = भोले। पात = बेलपत्र। आखत = अक्षत। गज = हाथी। बामदेव = शिवजी। किंकर = दास। वरजिये = मना कर दीजिये। सिहोरे = धूहड़का वृक्ष, सेहुड़।

भावार्थ—हे शंकर ! आप महादेव हैं, महादानी हैं और बहुत भोले हैं। जिन-जिन लोगोंने आपके सामने हाथ जोड़े, आपने उन सबके दुःख दूर कर दिये ॥१॥ आपकी सेवा, स्मरण और पूजा थोड़े-से बेलपत्र और अक्षतसे ही हो जाती है। उसके बदले आप संसारकी सब सुख-सामग्री—हाथी, रथ, घोड़े इत्यादि दे डालते हैं ॥ २ ॥ हे बामदेव ! मैं आपके गाँव (काशी) में रहता हूँ, पर अबतक आपसे कुछ नहीं माँगा। अब मुझे आधिभौतिक बाधाएँ सता रही हैं, वे आधिभौतिक दुःख आपके दास हैं ॥ ३ ॥ इसलिए आप इन कठोर करतूत- वालोंको शीघ्र बुलाकर मना कर दीजिये, मैं आपकी बलैया लेता हूँ। क्योंकि