विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ विनय-पत्रिका विशेष १—अणिमादिक—आठ सिद्धियोंमें एक सिद्धिका नाम है। आठ सिद्धियाँ ये हैं—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। ( ७ ) कस न दीन पर द्रबहु उमावर। दारुन बिपति हरन, करुनाकर ॥१॥ बेद पुरान कहत उदार हर। हमरि बेर कंस भयउ कृपिनतर ॥२॥ कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज। ह्वै प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज॥ जो गति अगम महामुनि गावहिं। तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥४॥ देहु काम-रिपु, राम-चरन-रति। तुलसिदास प्रभु हरहु भेद-मति ॥५॥ शब्दार्थ—कृपिनतर = अधिक कृपण। भेदमति = भेदबुद्धि; 'मैं और मेरा' यही भेद- बुद्धि है। भावार्थ—हे उमावर ! आप मुझ दीनपर क्यों नहीं दयार्द्र होते ? आप तो घोर विपत्तियोंको हरनेकी कृपा करनेवाले हैं॥१॥ वेद और पुराण तो कहते हैं कि शिवजी अत्यन्त उदार हैं; किन्तु मेरी बारी आनेपर आप इतने अधिक कृपण क्यों हो गये ? ॥२॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मणने कौन-सी भक्ति की थी, जिसे आपने प्रसन्न होकर कैवल्य पद दे डाला ? ॥३॥ बड़े-बड़े मुनि जिस मोक्षको दुर्लभ कहते हैं, आपके पुर (काशी) में वह मोक्ष कीट-पतंगोंको भी मिल जाता है ॥४॥ हे कामदेवको दहन करनेवाले शिवजी ! तुलसीदासको श्रीरामचरणोंकी भक्ति दीजिये। हे प्रभो ! उसकी भेदबुद्धि हर लीजिये ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने शिवजीके लिए उदार दानी तथा काशीमें कीट-पतंगको मुक्त करनेकी बात कई बार कही है। जैसे, 'वेद-विदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पतंग समाहीं।' 'तव पुर कीट पतंगहु पावहिं।' इससे तुलसीदासजीका यह भाव प्रकट होता है कि क्या शिवजी उन्हें कीट-पतंग समझ कर भी उनकी मनोभिलाषा पूरी न करेंगे ? शिवजी बड़े दानी हैं, क्या याचककी माँग पूरी न