भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 18

विनय-पत्रिका ७ २—'वेद बड़ाई भानी'—का अर्थ कुछ लोगोंने 'वेदोंकी मर्यादा तोड़कर' किया है। पर यह अर्थ ठीक नहीं। क्योंकि एक तो 'बड़ाई' का अर्थ 'मर्यादा' हो ही नहीं सकता, दूसरे शिवजी वेदोंकी मर्यादाके रक्षक हैं, उसके तोड़नेवाले नहीं। लिखा है:— वेदानुवर्त्तिनं रुद्रं देवं नारायणं तथा। —इति कौर्मे १३ अध्यायः ३—'निज घरकी घर बात'के स्थानपर कहीं-कहीं 'निज घरकी बर बात' पाठ भी है। इसका अर्थ है अपने घरकी बड़ी बात। राग रामकली ( ६ ) जाँचिये गिरिजापति, कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥ औढर-दानि द्रवत पुनि थोरे। सकत न देखि दीन कर जोरे ॥२॥ सुख संपति मति सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥३॥ गये सरन आरत के लीन्हे। निरखि निहाल निमिष महँ कीन्हे ॥४॥ तुलसिदास जाचक जस गावै। बिमल भगति रघुपति की पावै ॥५॥ शब्दार्थ—अनिमादिक = अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ। औढर-दानि = बिना समझे बूझे बड़ी से बड़ी वस्तुको दे डालनेवाले। द्रवत = पिघल जाते हैं। सुगति = मोक्ष। निमिष = पलभरमें। भावार्थ—पार्वतीके पति शिवजीसे ही याचना करनी चाहिये। जिनका घर काशीमें है और अणिमा आदि आठो सिद्धियाँ जिनकी चेरी हैं॥१॥ एक तो शिवजी औढरदानी हैं, दूसरे थोड़ी ही सेवामें पिघल जाते हैं। वह दीनोंको हाथ जोड़कर (अपने सामने) खड़े नहीं देख सकते ॥२॥ शंकरकी सेवासे सुख, सम्पत्ति, सुबुद्धि और सुन्दर गति आदि सब वस्तुएँ सुलभ हो जाती हैं ॥३॥ उन्होंने आर्त्त होकर शरणमें गये हुए जीवोंको अपना लिया और पलभरमें ही देखते-देखते उन्हें निहाल कर दिया है ॥४॥ याचक तुलसीदास इसी आशासे उनका यश गाता है ताकि उसे श्रीरघुनाथजीकी पवित्र भक्ति मिले ॥५॥