विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १७ भावार्थ—कल्याणकर्ता, कल्याणदाता, सज्जनोंको आनन्द देनेवाले, पार्वती- जीके स्वामी, अत्यन्त सुन्दर, कामदेवके मदको चूर्ण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले भावगम्य शिवजीको मैं भजता हूँ ॥१॥ आपका सुन्दर शरीर शंख, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान गौर है। आप सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप हैं। आपके चरणारविन्दकी वन्दना सिद्ध, सनकादि (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार), बड़े-बड़े योगी, देवता, विष्णु और ब्रह्मा करते हैं॥२॥ आपको ब्राह्मण- कुल प्रिय है अथवा ब्रह्मवंशके आप परमप्रिय हैं; आपका प्राप्त होना सुलभ भी है और दुर्लभ भी। आपका वेष विकट है; आप व्यापक हैं और वेदोंके ज्ञानसे परे हैं। ऐसे करुणाकर, हलाहल विष और गंगाजीको धारण करनेवाले, निर्मल, निर्गुण और निर्विकार शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ आप सब लोकोंके स्वामी, शोकों और दुःखोंको निर्मूल करनेवाले, त्रिशूलधारी और मोहान्धकारको दूर करनेके लिए अनन्त सूर्यके समान हैं। आप कालके भी काल और कलातीत अर्थात् सदा एकरस और अजर हैं। शिवजी कठिन कलिकालरूपी वनको भस्म कर डालनेके लिए अग्नि-स्वरूप हैं ॥४॥ आप तत्त्ववेत्ता हैं और, अज्ञानरूपी समुद्रको पी जानेके लिए साक्षात् अगस्त्य हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं और सब प्रकारके सौभाग्यके मूल कारण हैं। आप संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंका नाश करनेवाले, तथा शरणागतोंको आनन्द देनेवाले हैं। सेवक तुलसीदास आपकी शरण है—उसपर कृपा कीजिये ॥५॥ विशेष 'पाथोधि-घट-सम्भवं'—समुद्रके तटपर एक टिटिहा अपनी टिटिहरीके साथ निवास करता था। समुद्र उनके अण्डे बराबर बहा ले जाता था। इससे एक बार वे दोनों समुद्रपर बहुत क्रुद्ध हुए। दोनों ही चोंचमें बालू भर-भरकर लगे समुद्रमें छोड़ने। इस प्रकार वे समुद्रको पाट डालना चाहते थे। अचानक वहाँ अगस्त्य ऋषि पहुँच गये। पक्षियोंका दुःख देखकर उनका दिल भर आया। उन्होंने उन्हें सान्त्वना देते हुए 'ॐ राम' मन्त्रका उच्चारण कर तीन बार आच- मन किया। तीन ही आचमनमें समुद्रका जल बिलकुल सूख गया। इससे जलमें रहनेवाले जीव व्याकुल हो उठे। देवताओंके विनय करनेपर महर्षिने मूत्र- द्वारा समुद्रको बाहर निकाला। तभीसे समुद्र अपेय (खारा) हो गया। २