विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ विनय-पत्रिका 'निर्विकार'—विकार छः हैं—जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और नाश। इन छ विकारोंसे भगवान् शिव रहित हैं। राग बसन्त ( १३ ) सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु । कल्यान-अखिल-प्रद कामधेनु ॥१॥ कर्पूर गौर करुना उदार । संसार-सार, भुजगेन्द्र हार ॥२॥ सुख-जन्म-भूमि, महिमा अपार । निर्गुन, गुन-नायक, निराकार ॥३॥ त्रय नयन, मयन-मर्दन महेस । अहंकार निहार उदित दिनेस ॥४॥ वर बाल-निसाकर मौलि भ्राज । त्रैलोक-सोकहर प्रमथराज ॥५॥ जिन्ह कहँ बिधि सुगति न लिखी भाल । तिन्हकी गति कासीपति कृपाल उपकारी कोऽपर हर समान । सुर-असुर जरत कृत गरल पान ॥७॥ बहु कल्प उपायन करि अनेक । बिनु संभु कृपा नहिं भव-विवेक ॥८॥ विज्ञान-भवन, गिरिसुता-रमन । कह तुलसिदास मम त्रास समन ॥९॥ शब्दार्थ—रेनु = रज, धूल। अखिल = सब। भुजगेन्द्र = वासुकि नाग। निहार = कुहरा, पाला। दिनेस = सूर्य। निसाकर = चन्द्रमा। प्रमथनाथ = गणोंके स्वामी। कोऽपर = (कः+अपर) दूसरा कौन। गरल = विष। भावार्थ—शिवजीके चरण-कमलोंकी रजका सेवन करो, वह रज सर्व कल्याणदायिनी कामधेनु है ॥१॥ शिवजी कपूरके समान गौर हैं। वह करुणा करनेमें उदार हैं; संसारके सार हैं और वासुकि नागका हार धारण करने- वाले हैं ॥२॥ वह सुखके जन्म-स्थान हैं, उनकी महिमा अपार है। वह त्रिगुणातीत हैं, सब गुणोंके स्वामी हैं और आकार-रहित हैं ॥३॥ शिवजी तीन नेत्रवाले हैं, कामदेवको ध्वंस करनेवाले हैं और अहंकाररूपी कुहरेके लिए उगे हुए सूर्य हैं ॥४॥ उनके मस्तकपर दूजके चन्द्रमा शोभा पा रहे हैं। वह तीनों लोकोंका शोक दूर करनेवाले हैं और गणोंके स्वामी हैं ॥५॥ ब्रह्माने जिन लोगोंके ललाटमें अच्छी गति नहीं लिखी, शिवजी ऐसे कृपालु हैं कि उन्हें भी मुक्ति दे देते हैं ॥६॥ देवों और दैत्योंको जलते देखकर जिन्होंने हलाहल