भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 475 में से

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पृष्ठ 16

विनय-पत्रिका ५ शब्दार्थ—दिबोई = देना ही। सोहाहीं = अच्छे लगते हैं। मार = कामदेव। थप्यो = स्थापित किया, रहने दिया। निवाजिबौ = कृपा करना। पुरारि-पुर = काशी। अनत = अन्यत्र। जाँचन = माँगने। भावार्थ—शिवजीके समान दानी कहीं (कोई) नहीं है। वह दीनदयालु हैं, देना ही उन्हें अच्छा लगता है। भिखमंगे उन्हें सदैव प्रिय लगते हैं ॥१॥ योद्धाओंमें अग्रगण्य कामदेवको भस्म करके फिर उसे संसारमें रहने दिया, ऐसे प्रभुका रीझकर कृपा करना मुझसे कैसे कहा जा सकता है! ॥२॥ अनेक तरहसे योगाभ्यास करके मुनिगण जिस मोक्षको भगवान्‌से माँगनेमें संकोच करते हैं, उस मोक्षपदको शिवकी पुरी काशीमें कीट-पतंगतक पा जाते हैं, यह वेदोंमें विदित या प्रकट है ॥३॥ ऐसे ऐश्वर्यवान् परम उदार शिवजीको छोड़ कर जो लोग अन्यत्र माँगने जाते हैं, वे मूर्ख हैं; तुलसीदास कहते हैं कि उन मूर्खोंका पेट माँगनेसे कभी भी नहीं भरता ॥४॥ विशेष १—जब शिवजीने कामदेवको भस्म किया, तब कामदेवकी स्त्री रति अत्यन्त दुःखिनी होकर विरह-विलाप करने लगी। इससे महाराज शिवजीको दया आ गयी और उन्होंने कामदेवको अनंग (बिना शरीर) रूपसे संसारमें रहने दिया। इससे उनकी दयालुताका परिचय मिलता है। बावरो रावरो नाह भवानी। दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद बड़ाई भानी ॥१॥ निज घर की घर-बात बिलोकहु, हौ तुम परम सयानी। सिव की दयी सम्पदा देखत, श्री सारदा सिहानी ॥२॥ जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुख की नहीं निसानी। तिन रंकन को नाके सँवारत, हौं आयौ नकबानी ॥३॥ दुख दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी। यह अधिकार सौंपिये औरहिं, भीख भली मैं जानी ॥४॥