विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्व-ब्रह्माण्डको भस्म कर डालते हैं; कैलास आपका घर है, और काशीमें आप बैठे रहते हैं ॥५॥ आप तत्त्वके जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, यज्ञोंके स्वामी हैं, अच्युत हैं और व्यापक हैं। हे पुरारि, यह विश्व-ब्रह्मांड आपके ही अंशसे उत्पन्न हुआ है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, अग्नि, अष्टवसु, उनचास पवन और यमराज आपके ही चरणकी पूजा करके सब तरहके अधिकारी हुए हैं ॥६॥ आप कला-रहित (यानी घटते-बढ़ते नहीं), उपाधि-रहित, निर्गुण, माया-रहित साक्षात् ब्रह्म हैं। आप कर्म-पथमें एक हैं। आप जन्म-रहित और विकार-रहित हैं। हे शंकरजी, सारा ब्रह्माण्ड आपका शरीर है, आपका रूप बड़ा भयानक है; आप देवताओंके स्वामी हैं। हे शिव ! आप सर्वगत और सबका उपकार करने- वाले हैं ॥७॥ हे शिवजी, आपके प्रसन्न रहनेपर ज्ञान, वैराग्य, धन, धर्म, मोक्ष और सुन्दर सौभाग्य यह सब प्राप्त हो जाते हैं। फिर भी मूर्ख मनुष्य आपके चरणारविन्दोंसे विमुख होकर सांसारिक मार्गपर आरूढ़ हैं और संसारमें ही भटक रहे हैं ॥८॥ हे शम्भो ! नष्टबुद्धि, अत्यन्त दुष्ट, कष्टमें लीन और दुःखी तुलसीदास आपकी शरण आया है। हे कामारि ! माया-जनित भेद-बुद्धि दूर करके उसे श्रीरामचन्द्रके चरण-कमलोंमें अनन्य भक्ति दीजिये ॥१०॥
विशेष १- 'कम्बु कुन्देन्दु-कर्पूर' - चारोका तात्पर्य उज्ज्वलतासे है। शिवजीका शरीर शंखके समान उज्ज्वल और चिकना है, कुन्दपुष्पके समान कोमल है, चन्द्रमाके समान शीतल है और कपूरके समान सुगन्धित है। इसीसे गोस्वामी- जी ने 'कम्बु-कुन्देन्दु कर्पूर विग्रह' कहा है। २-जिस समय विष्णु भगवान्ने वामनरूप धारण करके राजा बलिकी दी हुई तीन पैर भूमि नापनेके लिए अपना शरीर बढ़ाया था, उस समय ब्रह्माने पैरको धोकर चरणोदकको कमण्डलुमें रख लिया था। वही जल गंगाका मूल कारण है, इसीसे 'हरिचरण-पूतं' कहा गया है। ३- 'निर्विकार'-जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश ये षट्-विकार हैं; भगवान् शिव इन षट्-विकारोंसे रहित हैं, इसलिए उन्हें निर्विकार कहा गया है।