विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४. श्री लक्ष्मण, भरत व सीता स्तुति
१५० विनय-पत्रिका शब्दार्थ-जूड़ी = कँपाकर आनेवाला ज्वर। सहाय = सेना। भीरु = डरपोक। वाम = प्रतिकूल। दाग = अङ्क। दागिहै = लिख सकेंगे। बागिहै = घूमेगा। खाँगिहै = घटेगा। भावार्थ-रे मन! यदि तू मेरे कहेपर चलकर स्वभावसे ही राम-नामसे प्रेम करेगा, तो तेरा हर तरहसे भला होगा ॥१॥ तू यह जान ले कि जैसे गुड़गुड़ी देकर आनेवाले ज्वरके लिए आग है, उसी प्रकार सेना-सहित डरपोंक कलिकाल- के लिए रामनामका प्रभाव है। नामके प्रभावसे कलिकाल भाग जायगा ॥२॥ राम-नामके प्रभावसे वैराग्य, योग, जप आदि जाग्रत् हो जायेंगे, और ब्रह्मा प्रतिकूल रहनेपर भी ललाटको कर्मरूप दागसे न दाग सकेंगे ॥३॥ यदि तू राम- नामरूपी मोदकको प्रेम-सुधामें पागेगा अर्थात् पकावेगा, तो तू सन्तोष प्राप्त करके द्वार-द्वार न घूमेगा ॥४॥ राम-नाम कल्पवृक्ष है, उससे तू जो-जो वस्तु माँगेगा, सब पायेगा। ऐ तुलसीदास, उससे न तो तुझे स्वार्थकी ही कमी रहेगी और न परमार्थकी ही ॥५॥ विशेष १- 'जूड़ी आगि है-' इसके कई अर्थ हो सकते हैं। राम-नामका प्रभाव सर्दी दूर करनेके लिए अग्निके समान है; अथवा नामके प्रभावसे आग भी ठण्डी जान पड़ेगी; या नामके प्रभावको शीतल अग्नि जानकर (तात्पर्य यह कि राम- नामके प्रभावमें कहने या देखनेमें तो किसी प्रकारका ताप प्रतीत नहीं होता, पर नामके आश्रित जीवको यदि कोई बाधाएँ ग्रहण करती हैं तो वे जलकर भस्म हो जाती हैं; जैसे पाला शीतल प्रतीत होता है, किन्तु लताओं और वृक्षोंको झुलस देता है, उसी प्रकार राम-नाम सबके लिए शीतल है, किन्तु कलिकालके लिए अग्निरूप है।) कलिकाल भाग जायगा। २- 'न करम दाग दागिहै' - अर्थात् नामके प्रभावसे सब कर्म क्षीण हो जायेंगे। कहा भी है- 'मेटत कठिन कुअंक भालके।' अथवा- 'भाविउ मेटि सकहिं 'त्रिपुरारी'। -रामचरितमानस
विनय-पत्रिका १५१ ७१ ) ऐसेहुँ साहब की सेवा सों होत चोर रे । अपनी न बूझ, न कहै को राँडरार रे ॥१॥ मुनि-मन-अगम, सुगम माइ-बापु सो। कृपासिन्धु, सहज सखा, सनेही आपु सो ॥२॥ लोक-वेद-विदित बड़ो न रघुनाथ सो। सब दिन सब देस, सबहि के साथ सो ॥३॥ स्वामी सर्वग्य सों चलै न चोरी चार की। प्रीति पहिचानि यह रीति दरवार की ॥४॥ काय न कलेस-लेस, लेत मानि मन की। सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जन की ॥५॥ रीझे बस होत, खीझे देत निज धाम रे। फलत सकल फल कामतरु-नाम रे ॥६॥ बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखै काम रे। सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥७॥ शब्दार्थ—राँडरौर = राँड़ोंकी आवाज। चार = सेवक, दूत। जोगवत = बचाते हैं, रखते हैं। खीझे = नाराज होनेपर। निवाज्यो = निहाल किया। भावार्थ—रे मन ! तू ऐसे भी स्वामीकी सेवा करनेसे जी चुरा रहा है! न तो तुझमें अपना हित पहचाननेकी समझ है और न किसीके कहनेका ही तुझपर कुछ असर पड़ता है। तू बिलकुल ही निकम्मा है ॥१॥ वह मुनियोंके मनके लिए भी अगम और भक्तोंके लिए माँ-बापकी तरह सुगम हैं। वह कृपाके समुद्र हैं, सहज सखा हैं और स्वभावतः स्नेही हैं ॥२॥ लोक और वेदमें यह बात प्रकट है कि रघुनाथजीसे बड़ा कोई नहीं है। वह सर्वदा (भूत, वर्तमान, भविष्य) सर्वत्र (स्वर्ग और नरक) और सबके साथ रहते हैं ॥३॥ सर्वज्ञ स्वामीसे सेवककी चोरी नहीं चलती। उनके दरबारकी यह रीति है कि केवल प्रेमकी ही पहचान की जाती है ॥४॥ उनकी सेवामें शरीरको रंचमात्र भी क्लेश नहीं होता। वह मनकी भावनाको ही मान लेते हैं। स्मरण करनेपर वह ससंकोच भक्तोंकी रुचि रखते हैं। सारांश, भक्तकी रुचिके अनुसार बड़ीसे बड़ी वस्तु दे डालनेपर भी
१५२ विनय-पत्रिका संकोच करते हैं कि कुछ नहीं दिया ॥५॥ वह रीझनेपर वशीभूत हो जाते हैं (जैसे हनुमान्जीपर रीझकर उनके वशीभूत हुए थे) और खीझनेपर मुक्ति (निज धाम) देते हैं (जैसे रावण, बालि आदिको)। कल्पवृक्ष-सदृश जो राम-नाम है, वह सब फल फलता है ॥६॥ जिसे (तुलसीदासको) न तो बेचनेपर फूटी कौड़ी मिल सकती है और न रखनेसे कोई काम ही निकल सकता है, उस तुलसीदासको भी निहाल कर दिया—ऐसे महाराज रामचन्द्रजी हैं ॥७॥ विशेष १—'मुनि-मन.......बापु सो'—श्रीरामजी अगम भी हैं और सुगम भी। अगम तो ऐसे हैं कि मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं आते, और सुगम भी इस कदर हैं कि अवधवासियों और ब्रजवासियोंको हर समय दर्शन दिया करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बच्चोंकी शुश्रूषा करनेमें सदैव लगे रहते हैं, उसी प्रकार भगवान् भी अपने भक्तोंके पीछे-पीछे रहा करते हैं। २—'सनेही आपु सो'--वह किसी भी समयमें किसी जीवको नहीं भूलते। गर्भ सरीखे निषिद्ध स्थानमें भी परमात्मा प्रत्येक प्राणीका पालन करते हैं। ३—'सकल फल'—कल्पवृक्ष तीन फल देता है, पर राम-नाम चारों फल। इसीसे 'सकल फल' लिखा गया है। ७२ ) मेरो भलो कियो राम आपनी भलाई। हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक हित साईं ॥१॥ राम सों बड़ो है कौन, मो सों कौन छोटो। राम सों खरो है कौन, मो सों कौन खोटो ॥२॥ लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावों। एतो बड़ो अपराध भो न मन बावों ॥३॥ पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यों नीचो। बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो ॥४॥ शब्दार्थ—द्रोही = शत्रु। पै = पर। भो = हुआ। बावों = बाम, टेढ़ा। पाथ = जल।
विनय-पत्रिका १५३ भावार्थ—श्रीरामजीने अपनी भलाईके लिए (अपना बाना रखनेके लिए) मेरा भला कर दिया। मैं तो स्वामीका शत्रु हूँ, पर स्वामी श्रीरामजी सेवकके हितू हैं ॥१॥ भला श्रीरामजीसे बड़ा कौन है, और मुझसे छोटा कौन है ? रामजीके समान कौन खरा है और मुझ-सा कौन खोटा है ? ॥२॥ संसार कहता है कि मैं रामजीका गुलाम हूँ; (किन्तु वह तब कहता है जब) मैं ऐसा कहलवाता हूँ। मुझसे इतना बड़ा अपराध हुआ, तो भी श्रीरामजीका मन मेरी ओरसे बाम नहीं हुआ ॥३॥ हे तुलसी ! यह बात ठीक वैसी ही है, जैसे नीच तृण (तिनका) जलके मस्तकपर चढ़ जाता है, फिर भी जल यह जानकर उसे नहीं डुबोता कि उसने उसे सींचा है या पाला-पोसा है ॥४॥ विशेष १—'साईं-द्रोही'—कहनेका यह आशय है कि तुच्छ और बुरा होनेपर भी जो मैं अपनेको श्रीरामजीका गुलाम कहलवाता हूँ, उससे श्रीरामजीकी बदनामी होगी; क्योंकि श्रीरामजीके सेवकको संसार बहुत उच्च दृष्टिसे देखता है, पर मेरे जैसे अकिंचनको देखकर लोगोंकी क्या धारणा होगी ? भला यह स्वामीके द्रोहीका काम नहीं तो और किसका है ? २—'नीचो'--जलसे ही तृण उत्पन्न होता है और समय पाकर वह उसके माथेपर चढ़ जाता है। जन्मदाताके मस्तकपर चढ़ना घोर नीचता है। इसीसे ग्रन्थकारने 'नीचो' शब्द लिखा है। ३—'पाथ······सींचो'—यह चरण बड़ा सरस है। एक ओर जल हूँ और दूसरी ओर कृपा । आह ! धन्य हैं गोस्वामीजी ! [ ७३ ] जागु, जागु, जीव जड़ ! जोहै जग-जामिनी । देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥१॥ सोवत सपनेहुँ सहै संसृति-संताप रे । बूड्यो मृग-वारि खायो जेवरी को साँप रे ॥२॥ कहँहिं वेद बुध, तू तो बूझि मन माँहिं रे । दोष-दुख सपने के जागे ही पै जाहिं रे ॥३॥
१५४ विनय-पत्रिका तुलसी जागे ते जाय ताप तिहूँ ताय रे । राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥४॥ शब्दार्थ—नेह = स्नेह । दामिनी = बिजली । संसृति = संसार । बुध = पण्डित । भावार्थ—ऐ जड़ जीव ! जाग, जाग; और संसाररूपी रात्रिको देख; अर्थात् सांसारिक अविद्या या मोहको समझ । यह जान ले कि देह और घरका स्नेह मानो बादलोंके बीचकी बिजली है (जो जरा-सी देरके लिए कौंधकर गायब हो जाती है) । (यदि तू यह समझता हो कि जागनेपर कष्टका ही अनुभव होगा तो ) जो आदमी सो जाता है, वह स्वप्नमें ही मृगजालमें डूबा, रस्सीके साँपसे डस लिया, इस प्रकार संसारका सन्ताप सहता है ॥२॥ चारों वेदों और पंडितोंका कथन है और तू भी अपने मनमें समझ ले कि स्वप्नके दोष और दुःख जागनेपर ही दूर होते हैं ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीनों तापोंके दुःख जागनेपर ही जाते हैं और तभी राम-नाममें पवित्र प्रीति सहज स्वभावसे उत्पन्न होती है ॥४॥ विशेष १—‘जागु जागु’ इस विषयमें गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें कहा है:— ‘इहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथ एरपंच वियोगी ॥ २—‘मृगजाल’—यहाँ पुत्र, कलत्र, धन आदि ही मृगजल है । राग-विभास [ ७४ ] जानकीस की कृपा जगावती सुजान जीव, जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे । करि विचार, तजि विकार, भजु उदार रामचंद्र- भद्रसिंधु, दीनबंधु, वेद वदत रे ॥१॥ मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो, खोयो सो अनूप रूप स्वप्न जो परे ।
विनय-पत्रिका १५५ अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकास वास- ना, सराग मोह-द्वेष निविड़ तम टरे ॥२॥ भागे मद-मान चोर-भोर जानि जातुधान । काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे । देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप, ताप त्रिविध प्रेम-आप दूर ही करे ॥३॥ श्रवन सुनि गिरा गँभीर, जागे अतिधीर बीर, बर विराग-तोष सकल संत आदरे । तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीवजन विहालु, भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥ शब्दार्थ—वदत = कहते हैं। कुहू = अमावास्या। विपुल = बहुत । आप = जल । गिरा = वाणी। विहालु = व्याकुल । भंज्यो = तोड़ दिया, नष्ट कर दिया । भावार्थ—बुद्धिमान् जीवोंको श्रीरामजीकी कृपा जगा देती है। तू जागकर और मूर्खताको त्यागकर परमात्माके साथ प्रीति कर। तू (सत-असतका) विचार करके (कामक्रोधादि) विकारोंको छोड़ दे, उदार श्रीरामजीका भजन कर; क्योंकि चारों वेद उन्हें कल्याण-सागर और दीनबन्धु कहते हैं ॥१॥ मोह- मयी अमावास्याकी रात्रिमें तू चिरकालतक खूब सोया। जो माया-स्वप्नमें पड़ जाता है, वह अनुपम आत्म-स्वरूपको खो बैठता है। अब सबेरा प्रकट हो गया है; ज्ञान-सूर्यका प्रकाश होते ही वासना तथा राग-सहित मोह और द्वेषरूपी सघनान्धकार टल गया है ॥२॥ भोर हुआ जानकर मद और मानरूपी चोर भाग गये हैं और काम, क्रोध, लोभ, क्षोभरूपी राक्षस-समूह स्वयं ही डर गये हैं। श्रीरामजीका प्रताप देखते ही पाप-सन्ताप समाप्त हो गये हैं और तीनों तापोंको प्रेम-रूपी जलने दूर कर दिया है ॥३॥ अपने कानसे यह गम्भीर वाणी सुनकर अत्यन्त धीर-वीर सन्त मोह-निद्रासे जाग उठे हैं और श्रेष्ठ वैराग्य, सन्तोष आदिका आदर करने लगे हैं। हे तुलसीदास ! कृपालु श्रीरामजीने सब प्राणियों- को व्याकुल देखकर संसार-रूपी जालको नष्ट कर दिया है और परमानन्द देने लगे हैं ॥४॥
१५६ विनय-पत्रिका विशेष १—'विसाल काल···सोयो'—संसारमें कर्मानुसार अनन्त बार जन्म लेना और मरना ही सोना है । २—'खोयो'—कहा भी है, 'जो सोया सो खोया, जो जागा सो पाया' । राग-ललित ( ७५ ) खोटो खरो रावरो हौं, रावरे सों झूठ क्यों कहौंगो, जानौ सबही के मनकी । करम-वचन-हिये, कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि, पानी परे सनकी ॥१॥ दूसरो भरोसो नाहिं, वासना उपासना की, वासव, विरंचि सुर-नर-मुनिगन की । स्वारथ के साथी मेरे हाथी खान लेवा देई, काहू तो न पीर रघुबीर ! दीन जन की ॥२॥ साँप-सभा साबरैं लबार भये, देव दिव्य, दुसह साँसति कीजै आगे ही या तन की । साँचे परौं पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान, तुलसी चातक आस राम स्यामघन की ॥३॥ शब्दार्थ—खोटो = बुरा । खरो = भला । रावरो = आपका । वासव = इन्द्र । लेवा देई = लेन-देन । तो = तुम्हारे सदृश । साबर = एक मंत्रका नाम है । लबार = झूठा । भावार्थ—मैं बुरा हूँ तो भी आपका हूँ और भला हूँ तो भी आपका ही । भला मैं आपसे झूठ क्यों कहूँगा ? क्योंकि आप प्रत्येक प्राणीके दिलकी बात जानते हैं । इसे मैं निष्कपट होकर मन, वचन और कर्मसे कहता हूँ । मेरे हठकी ठीक वही दशा है जैसे पानी पड़नेपर सनकी गाँठकी । न तो मुझे दूसरा कोई सहारा है और न इन्द्र, ब्रह्मा, देवता, मनुष्य तथा मुनियोंकी उपासना करनेकी इच्छा है । ये सब मतलबके यार हैं, हाथीसे कुत्तेकी लेन-देन करनेवाले हैं—
विनय-पत्रिका १५७ अर्थात् मेरे आयुर्बलरूप हाथीको अपनी सेवामें खपाकर श्वान (कुत्ता) रूपी स्त्री- पुत्रादि नश्वर पदार्थ देनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! दीनोंकी पीड़ाका ध्यान तुम्हारे समान किसीको भी नहीं है ॥२॥ यदि मेरी यह बात झूठी हो तो हे दिव्यदेव ! आप अपने आगे ही मेरे इस शरीरकी कठिनसे कठिन वही दुर्दशा कीजिये, जो दुर्दशा सर्पोंकी सभामें सावर मंत्र झूठा साबित होनेपर सँपेरेकी हुआ करती है; किन्तु यदि मैं सच्चा साबित हो जाऊँ, तो मुझे पंचोंके बीचमें प्रतिज्ञाके प्रमाण- स्वरूप पानका बीड़ा मिलना चाहिये-ताकि भक्तमंडली समझ सके कि तुलसी- रूपी चातकको केवल रामरूपी श्याम-मेघकी ही आशा है ॥३॥ विशेष १—इस पदमें ग्रंथकारने अपनी अनन्य भक्तिका पुष्टीकरण किया है। अनन्य भक्तिका लक्षण गुसाईंजीने इस प्रकार कथन किया है:— सो अनन्य जाके असि, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक सचराचर, रूप-स्वामि भगवन्त ॥ -रामचरितमानस ७६ ) राम को गुलाम, नाम 'रामबोला' राख्यो राम, काम इहै, नाम द्वै हौं कबहुँ कहत हौं। रोटी-लूगा नीके राखे, आगे हू की वेद भाखे, भलो है है तेरो, ताते आनँद लहत हौं ॥१॥ बाँध्यो हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़, सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं। आरत-अनाथ-नाथ, कौसलपाल, कृपाल, लीन्हों छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥२॥ बूझ्यो ज्यों, कह्यो, मैं हूँ चेरो है रावरोजू, मेरो कोऊ कहूँ नाहिं चरन गहत हौं। मींजो गुरु पीठ, अपनाइ गहि बाँह, बोलि सेवक-सुखद, सदा विरद वहत हौं ॥३॥
१५८ विनय-पत्रिका लोग कहैं पोचु, सो न सोच न सँकोच मेरे ब्याह न बरेखी, जाति-पाँति न चहत हौं। तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे, प्रीति की प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥४॥ शब्दार्थ—लूगा = धोती, वस्त्र। निगड़=बेड़ी। दुरित = पाप। मींजो = हाथ रख दिया, ठोंक दिया। विरद = बाना। अकाज-काज = नफा-नुकसान। भावार्थ—मैं श्रीरामजीका गुलाम हूँ। रामजीने मेरा नाम 'रामबोला' रखा है। मेरा काम यही है कि दो अक्षरका राम-नाम कभी-कभी कह लेता हूँ। इससे रामजीने मुझे अन्न-वस्त्रसे खुशहाल रखा है, और आगे (परलोक) के लिए भी वेदोंका कथन है कि तेरा भला होगा। इससे मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ ॥१॥ रामजीका गुलाम होनेके पहले मैं जड़ कर्मोंकी अभिमानरूपी पुष्ट बेड़ियोंसे बँधा हुआ था, यह सुनते ही कि मैं तो असह्य कष्ट सह रहा हूँ, आत्तों और अनाथोंके स्वामी कृपालु श्रीरघुनाथजीने देखा कि मैं दीन हूँ और पापोंसे जल रहा हूँ, अतः उन्होंने मुझे कर्मबन्धनसे छुड़ा लिया ॥२॥ उन्होंने ज्यों ही मुझसे पूछा, त्यों ही मैंने भी कहा कि मैं भी आपका दास होना चाहता हूँ, मेरा कोई कहीं नहीं है, मैं आपके चरणोंको पकड़ता हूँ। इसपर गुरुरूप श्रीरामजीने मेरी पीठ ठोंक दी और बुलाकर मेरी बाँह पकड़ ली; तभीसे मैं भक्तों- को सुख पहुँचानेवाला (भगवान्का वैष्णवी) बाना धारण किये रहता हूँ ॥३॥ इससे लोग मुझे नीच कहते हैं; किन्तु इसका न तो मुझे सोच है और न मेरे दिलमें किसी तरह का संकोच ही हो रहा है। क्योंकि न तो मुझे ब्याह-बरेखी (सगाई) करनेकी ही जरूरत है और न मैं जाति-पाँतिका ही कायल हूँ। तुलसीदासका नफा-नुकसान श्रीरामजीके ही रीझने और खीझनेपर निर्भर है; किन्तु मुझे उनके प्रेमपर विश्वास है, इसीसे मैं मन ही मन प्रसन्न रहा करता हूँ ॥ विशेष १—'रामबोला'—कुछ लोग जो यह कहते हैं कि गोसाईंजीका पूर्व नाम रामबोला था, वह इसीके आधारपर जान पड़ता है। काशी नागरीप्रचारिणी
विनय-पत्रिका १५९ सभाके पाँच सदस्यों द्वारा सम्पादित रामचरितमानसमें लिखा है कि “इससे हमारा यह भी अनुमान होता है कि इनका विवाह नहीं हुआ था। माता- पिताको छोड़ देना तथा बचपनसे गुरुके साथ घूमना रामायण आदिसे भी प्रमाणित होता है और उसकी दृढ़ता इस पदसे भी होती है।” २—'रोटी लूगा'—के स्थानपर श्रीरामेश्वर भट्टने तो 'रोटी लूँगा' अर्थ किया ही है, वियोगी हरिजीने भी टीकाके प्रथम संस्करणमें 'सिर्फ रोटी लूँगा' (और कुछ नहीं चाहिये), अर्थ लिखा है। उक्त टीकाकारोंने यह नहीं सोचा कि 'लेना' क्रियाका 'लूगा' रूप हो सकता है या नहीं। इसीसे ऐसी भद्दी भूल हुई है। ( ७७ ) जानकी-जीवन, जग जीवन, जगत हित, जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम। सरद-बिधु-वदन, सुखसील, श्रीसदन, सहज सुंदर तनु, सोभा अगनित काम ॥१॥ जग-सुपिता, सुमातु, सुगुरु, सुहित, सुमीत, सबको दाहिनो, दीनबन्धु, काहू को न बाम। आरतिहरन, सरनद, अतुलित दानि, प्रनतपाल, कृपालु, पतित-पावन नाम ॥२॥ सकल विस्व बंदित, सकल सुर-सेवित, आगम-निगम कहैं रावरेई गुनग्राम। इहै जानिकै तुलसी तिहारो जन भयो, न्यारो कै गनिबो जहाँ गने गरीब गुलाम ॥३॥ शब्दार्थ—बिधु = चन्द्रमा। श्रीसदन = लक्ष्मीका निवासस्थान। दाहिनो = अनु- कूल। आगम = वेद। निगम = शास्त्र। कै = या, अथवा। सरनद = शरण देनेवाले। भावार्थ—हे रामजी ! आप जानकीजीके, और संसारके जीवन, जगत्के हितकारी, जगदीश, रघुकुलके स्वामी तथा कमलके समान नेत्रवाले हैं। आपका मुख शारदीय पूर्णिमाके समान है। आप सुख प्रदान करनेवाले हैं और लक्ष्मीजी-
१६० विनय-पत्रिका के निवासस्थान हैं। सहज (बिना बनावट-सजावटके) ही आपके सुन्दर शरीर- की शोभा अगणित कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्के पिता, माता, गुरु, हितू, मित्र, सबपर अनुकूल रहनेवाले, दीनबन्धु तथा किसीके भी प्रतिकूल न रहनेवाले हैं। आप दुःखोंके हरनेवाले, (शरणागतोंको) शरण देनेवाले, अमित- दानी, भक्तोंका पालन करनेवाले और कृपालु हैं। आपका नाम पापियोंको पवित्र करनेवाला है ॥२॥ विश्व-ब्रह्माण्ड आपकी वन्दना करता है, समस्त देवता आपकी सेवा करते हैं तथा वेद और शास्त्र आपकी ही गुणावली गाते हैं ! यही सब जानकर तुलसीदास आपका सेवक हुआ है; आप इसे (तुलसीदासको) अलग गिनेंगे या गरीब गुलामोंमें गिनेंगे ? ॥३॥ राग तोड़ी ( ७८ ) देव— दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ । जाहि दीनता कहौं हौं देखौं दीन सोऊ ॥१॥ सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तौ घनेरे । पै तौ लों जौ लों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥२॥ त्रिभुवन, तिहुँकाल विदित, वेद वदति चारी । आदि-अंत-मध्य राम ! साहिबी तिहारी ॥३॥ तोहि माँगि माँगनौ न माँगनो कहायो । सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो ॥४॥ पाहन-पसु, विटप-विहँग अपने करि लीन्हे । महाराज दसरथ के ! रंक राय कीन्हे ॥५॥ तू गरीब को निवाज, हौं गरीब तेरो । बारक कहिये कृपालु ! तुलसिदास मेरो ॥६॥ शब्दार्थ—हौं = मै । घनेरे = बहुतेरे । लौ = तक । कहति = कहते हैं । पाहन = पत्थर, यहाँ यह शब्द अहिल्याके अर्थमें है । विटप = पेड़, (यमलार्जुन) । विहँग = पक्षी (गीध जटायु और काकभुशुंडि) । रंक = भिखारी । राय = राजा । बारक = एक बार ।
विनय-पत्रिका १६१ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! दीनोंके लिए दयालु दानी (आपके सिवा) दूसरा कोई नहीं है। मैं जिसे अपनी दीनता सुनाता हूँ, वह (स्वयं ही) दीन नजर आता है ॥१॥ यों तो देवता, मनुष्य, मुनि, दैत्य, नाग आदि बहुत-से मालिक हैं, पर ये सब तभीतक हैं, जबतक आपकी दृष्टि जरा भी टेढ़ी नहीं होती ॥२॥ तीनों लोक और तीनों कालमें यही प्रसिद्ध है तथा चारों वेद भी कह रहे हैं कि हे राम ! आदि, अन्त और मध्यमें (केवल) आपकी ही साहबी है ॥३॥ आपसे माँगनेके बाद कोई भी भिक्षुक फिर मंगन नहीं रह गया। आपका यही स्वभाव, शील और सुयश सुनकर यह दास माँगने आया है ॥४॥ आपने पाषाण (अहल्या), पशु (वानर-भालू), वृक्ष (यमलार्जुन) और पक्षी (जटायु, काक- भुशुंडि आदि) तकको अपना लिया है। हे महाराज दशरथके पुत्र ! आपने दरिद्रोंको राजा बना दिया है ॥५॥ आप गरीबोंको निहाल करनेवाले हैं, और मैं आपका गरीब दास हूँ। हे कृपालु ! एक बार कह दीजिये कि तुलसीदास मेरा है ॥६॥ विशेष १—'विटप'—एक बार कुबेरके पुत्र नलकुबर और मणिग्रीवके मजाक उड़ानेपर नारदजीने उन्हें वृक्ष हो जानेके लिए शाप दे दिया था। अन्तमें उनके प्रार्थना करनेपर नारदजीने कह दिया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके स्पर्शसे तुम्हारा उद्धार हो जायगा। वे दोनों भाई नारदके शापसे गोकुलमें अर्जुन वृक्ष बन गये। एक दिन यशोदाजीने किसी अपराधके कारण बालक श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। भगवान् धीरे-धीरे उन जुड़े हुए पेड़ोंके पास पहुँचे और ऊखलको दोनों वृक्षोंके बीचमें फँसाकर ऐसा झटका दिया कि दोनों पेड़ गिर पड़े। इस प्रकार वे दोनों वृक्ष-योनि छोड़कर यक्ष हो गये और भगवान्की स्तुति करने लगे। परमात्माने उन्हें मुक्त कर दिया। २—विहंग—(जटायु) ४३ वें पदके विशेषमें देखिये। ( ७९ ) देव— तू दयालु, दीन हों, तू दानि, हों भिखारी। हों प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी ॥१॥ १०
१६२ विनय-पत्रिका नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसों ? मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसों ॥२॥ ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो । तात-मातु, गुरु-सखा तू सब बिधि हितु मेरो ॥३॥ तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिये जो भावै । ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥ शब्दार्थ—पातकी = पापी । आरत = दुखी । आरतिहर = पीड़ाको हरनेवाला । ठाकुर = स्वामी । चेरो = दास, सेवक । तात = पिता । नाते = सम्बन्ध । भावार्थ—हे प्रभो ! तुम दयालु हो, और मैं दीन हूँ । तुम दानी हो और मैं भिखारी हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, और तुम पाप-समूहका नाश करनेवाले हो ॥१॥ तुम अनाथोंके नाथ हो, और मेरे जैसा अनाथ कोई भी नहीं है । न तो मेरे समान कोई दुखिया है, और न तुम्हारे जैसा कोई दुःखका हरनेवाला ही है ॥२॥ तुम साक्षात् ब्रह्म हो, और मैं जीव हूँ । तुम स्वामी हो, मैं सेवक हूँ । तुम्हीं मेरे पिता, माता, गुरु, सखा तथा सब प्रकारसे हितकारी हो ॥३॥ तुम्हारे और मेरे बीच बहुत-से नाते हैं, उनमें जो रुचे उसे मान लो । हे कृपालु ! किसी तरह भी हो, तुलसीदासको तुम्हारे चरणोंकी शरण मिलनी चाहिये ॥४॥ विशेष १—'तोहि मोहि नाते अनेक'—कविने ऊपर कई नाते गिना दिये हैं; जैसे—तुम दयालु हो और मैं दीन हूँ; अर्थात् दयालुको दीनोंकी ही आवश्यकता रहा करती है । यदि दीन ही न हों तो आप दयालुता किसपर दिखायेंगे ? इसी प्रकार दीनको भी दयालुकी आवश्यकता रहती है । [ ८० ] दंद— और काहि माँगिये, को माँगिवो निवारै । अभिमतदातार कौन, दुख दरिद्र दारै ॥१॥ धरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरो । साहब सब बिधि सुजान, दान-खड्ग-सूरो ॥२॥
विनय-पत्रिका १६३ सुसमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथ के ! दानि तैं गरीब निवाजै ॥३॥ सेवा बिनु गुनविहीन दीनता सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये ॥४॥ तुलसिदास जाचक-रुचि जानि दान दीजै। रामचन्द्र चन्द्र तू, चकोर मोहिं कीजै ॥५॥ शब्दार्थ—निवारै = निवारण करने या छुड़ानेवाला। अभिमतदातार = मनोवांछित या इच्छित फल देनेवाला। दारै = दूर करता है। रूरो = सुन्दर। निसान = नगाड़ा। भावार्थ—हे देव ! और किससे माँगूँ ? कौन मेरा माँगना (सदाके लिए) छुड़ानेवाला है ? कौन मनोवांछित फल देनेवाला है जो मेरे दुःख-दरिद्रको दूर कर दे ? ॥१॥ हे धर्मके स्थान श्रीरामजी ! आप करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यसे भी अधिक सुन्दर हैं। आप सब प्रकारसे बुद्धिमान्, मालिक और दान-रूपी तलवारके चलानेमें बहादुर हैं ॥२॥ अच्छे दिनमें तो दो दिन सबके दरवाजेपर नगाड़े बजते हैं (सब लोग चार पैसा खैरात करते हैं); पर हे दशरथ-नन्दन ! आप ऐसे दानी हैं कि बुरे समयमें भी (वनवासके समयमें भी जटायु, सुग्रीव, विभीषण आदि) गरीबोंको निहाल कर देते हैं ॥३॥ बिना सेवाके ही (अहल्या, शबरी) जिन-जिन गुणहीनोंको (बन्दर, भालू आदिको) दीनता सुनानेपर आपने निहाल किया है वे पैर फुलाये फिरते हैं ॥४॥ अब भिखारी तुलसीदासकी रुचि जानकर उसे भी दान दीजिये। हे श्रीरामचन्द्रजी ! आप चन्द्रमा हैं, अतः मुझे चकोर बना दीजिये—बस यही दान मुझे दीजिये ॥५॥ [ ८१ ] दीनबन्धु, सुखसिन्धु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई। सुनहु नाथ ! मन जरत त्रिबिध जुर, करत फिरत बौराई ॥१॥ कबहूँ जोग रत, भोग-निरत सठ हठ वियोग बस होई। कवहूँ मोह-बस द्रोह-करत बहु, कबहूँ दया अति सोई ॥२॥ कवहूँ दीन, मतिहीन, रंकतर, कवहूँ भूप अभिमानी। कवहूँ मूढ़, पंडित विडंबरत, कवहूँ धर्मरत ग्यानी ॥३॥
१६४ विनय-पत्रिका कवहूँ देव ! जग धनमय रिपुमय, कवहूँ नारिमय भासै । संसृति-सन्निपात दारुन दुख, बिनु हरि-कृपा न नासै ॥४॥ संजम, जप, तप, नेम, धरम, व्रत, बहु भेषज-समुदाई । तुलसिदास भव-रोग , रामपद-प्रेम-हीन नहिं जाई ॥५॥ शब्दार्थ—जुर = ज्वर । सठ = दुष्ट । बिडंबरत = दम्भ या पाखंडमें रत । संसृति = संसार । भेषज = दवा । भावार्थ—हे दीनबन्धु, आनन्दके समुद्र, कृपाकी खानि और कारुणिक रामजी ! हे नाथ ! सुनिये, मेरा मन तीनों तापोंसे जल रहा है, इसीसे वह पागलपन करता फिर रहा है (ज्वरमें मनुष्य अचेत होकर बकता है) ॥१॥ (उसका पागलपन यही है कि) कभी तो वह योगाभ्यास करता है, कभी भोग- विलासमें फँस जाता है, कभी वह दुष्ट हठपूर्वक वियोगके वशमें हो जाता है, कभी मोहवश होकर अनेक तरहकी शत्रुता करता है और कभी वह बड़ा दया- वान् बन जाता है ॥२॥ कभी दीन, बुद्धिहीन और बड़ा ही कंगाल बन जाता है, कभी घमंडी राजा बन जाता है, कभी मूढ़, पंडित और ढोंगी बन जाता है एवं कभी धर्मरत ज्ञानी बन जाता है ॥३॥ हे देव ! कभी उसे यह संसार धनमय दीखता है, कभी शत्रुमय और स्त्री-मय दीखता है (अर्थात् कभी तो वह लोभमें, कभी क्रोधमें और कभी काममें फँसा रहता है) । इस संसाररूपी सन्नि- पात ज्वरका दारुण दुःख बिना ईश्वर-कृपाके नष्ट नहीं होता ॥४॥ यद्यपि संयम, जप, तप, नेम, धर्म, व्रत आदि बहुत-सी औषधियाँ हैं, पर तुलसीदास कहते हैं कि यह संसाररूपी रोग श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हुए विना दूर नहीं हो सकता ॥५॥ विशेष १—इस पदमें मनकी विभिन्न दशाओंका वर्णन किया गया है । [ ८२ ] मोहजनित मल लाग विविध विधि कोटिहु जतन न जाई । जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥१॥
विनय-पत्रिका १६५ नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन विषय सँग लागे । हृदय मलिन वासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥२॥ परनिन्दा सुनि श्रवन मलिन भे, वचन दोष पर गाये । सब प्रकार मलभार लाग निज, नाथ-चरन बिसराये ॥३॥ तुलसिदास व्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धि हेतु श्रुति गावै । राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥४॥ शब्दार्थ—मल = पाप । नयन = नेत्र । श्रवन = कान । नीर = जल । भावार्थ—मोह-जनित अनेक प्रकारके लगे हुए पाप करोड़ों यत्न करनेपर भी नहीं छूटते। जन्म-जन्मान्तरसे अभ्यास-रत चित्त (पापमें) अधिकाधिक लिपटता जाता है ॥१॥ परायी स्त्रियोंको देखनेसे नेत्र मलिन हो गये हैं, और मन विषयोंके साथ लगा रहनेसे मलिन हो गया है। मान-मदादिक वासनाओंसे हृदय मलिन हो गया है, इसलिए जीवन अपने स्वाभाविक आनन्द-(आत्मानन्द) को त्याग बैठा है ॥२॥ दूसरोंकी निन्दा सुननेसे कान अपवित्र हो गये हैं तथा दूसरोंके दोष कहते-कहते वाणी भी मलिन हो गयी है। अपने स्वामी (श्रीरामजी) के चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सब तरहसे मेरे पीछे लग गया है ॥३॥ ऐ तुलसीदास, वेदका कथन है कि व्रत, दान, ज्ञान और तप आदि शुद्धिके कारण अवश्य हैं, पर श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम-जलके बिना पापोंका समूल नाश नहीं हुआ करता ॥४॥ राग जैतश्री [ ८३ ] कछु ह्वै न आइ गयो जनम जाय ।१ अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि, भजे न राम मन-बचन-काय ॥१॥ १. ऐसा ही भाव महात्मा सूरदासने भी व्यक्त किया है— दो मैं एकौ तौ न भई । ना हरि भजे न गृह सुख पाये, वृथा विहाइ गई ॥ ठानी हुती और कछु मनमें, औरै आनि ठई । अविगत गति कछु समुझि परति नहिं, जो कछु करत दई ॥
१६६ विनय-पत्रिका लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय । जोवन-जुर जुवती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन वाय ॥२॥ मध्य बयस धन हेतु गँवाई, कृषी वनिज नाना उपाय । राम-विमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसि बासर तयौ तिहूँ ताय ॥३॥ सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय । सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन, किये जे चरित रघुबंसराय ॥४॥ अब सोचत मनि बिनु भुजंग ज्यों, विकल अंग दले जरा धाय । सिर धुनि-धुनि पछितात्त मींजि कर, कोउ न मीत हित दुसह दाय ॥५॥ जिन्ह लागि निज परलोक बिगाऱ्यौ, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय । तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तन्यो गयंद जाके एक नाँय ॥६॥ शब्दार्थ-जाय = व्यर्थ ही। काय = कर्म । चाय = चाव, इच्छा। मदनबाय = कामोन्माद । ताय = ताप । भाय = भाव । जरा = बुढ़ापा, वृद्धावस्था । दाय = दावानल । ठाँय = ठाँव, निकट । नाँय = नाम । भावार्थ-व्यर्थ ही जन्म बीत चला, कुछ भी न बन पड़ा ! अत्यन्त दुर्लभ शरीर पाकर निष्कपट भावसे मन, वचन और कर्मसे राम भजन नहीं किया ॥१॥ लड़कपन तो अज्ञानमें बीत गया, उस समय चित्तमें चंचलताकी चौगुनी चाव थी। जवानीका ज्वर चढ़नेपर स्त्री (प्रसंग) का कुपथ्य करनेके कारण त्रिदोष (सन्निपात) हो गया और (समूचे शरीरमें) कामदेवरूपी वायु भर गयी ॥२॥ उसके बाद बीचकी अवस्था मैंने खेती, व्यापार आदि अनेक उपायोंसे धन पैदा करनेमें खो दी । किन्तु श्रीरामजीसे विमुख होनेके कारण स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला, रात-दिन तीनों तापोंसे तपता ही रहा ॥३॥ न तो श्रीरामजीके भक्तों, एवं ज्ञानी संतोंकी भक्ति-भावसे भली-भाँति सेवा ही की और न श्रीरघुनाथजीके सुत सनेह तिय सकल कुटुम मिलि, निसि दिन होत खई । पद-नख चन्द्र-चकोर-विमुख मन, खात अँगार मई ॥ विषम विकार-दवानल उपजी, मोह बयार बई । भ्रमत भ्रमत बहुतक दुख पायो, अजहुँ न टेव गई ॥ कहा होत अबके पछताने, होनी सिर बितई । सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥
विनय-पत्रिका १६७ किये हुए चरित्रको रोमांच होकर प्रसन्न मनसे सुना और कहा ही ॥४॥ अब जब कि बुढ़ापेने दौड़कर अंग-प्रत्यंगको व्याकुल करके पीस डाला है, तब मणिहीन सर्पकी भाँति सोचा करता हूँ, सिर पीटकर तथा हाथ मींजकर पछताता हूँ, पर इस असह्य दावानलको बुझानेवाला कोई भी मित्र या हितू नहीं ! ॥५॥ जिनके लिए अपना परलोक बिगाड़ दिया, वे भी निकट खड़े होनेमें शर्माते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि अब भी उस श्रीरामजीका स्मरण कर, जिनका एक बार नाम लेनेसे गजेन्द्र तर गया था ॥६॥ विशेष १—‘तह्यो गयंद’—एक बार तालाबमें जल-क्रीड़ा करते समय एक हाथी- का पैर एक मगरने पकड़ लिया था। जब सारी शक्ति लगानेपर भी हाथी अपना पैर न छुड़ा सका, तब उसने निराश होकर भगवान्को पुकारा। भगवान्ने ग्राहको मारकर उस हाथीको मुक्त कर दिया। [ ८४ ] तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ भयो है सुगम तोको अमर-अगम तन, समुझि धौं कत खोवत अकाथ॥१॥ सुख-साधन हरि-विमुख वृथा जैसे श्रम-फल घृत हित मथे पाथ। यह विचारि, तजि कुपथ-कुसंगति, चलि सुपंथ मिलि भले साथ ॥२॥ देखु राम-सेवक, सुनि कीरति, रटहि नाम करि गान गाथ। हृदय आनु धनु बान-पानि प्रभु, लसे मुनिपट, कटि कसे भाथ ॥३॥ तुलसिदास परिहरि प्रपंच सब, नाउ रामपद-कमल माथ। जनि डरपहि तोसे अनेक खल, अपनाये जानकीनाथ ॥४॥ शब्दार्थ—तौ = तब, तो। मींजि = मलकर। अमर = देवता। अगम = दुर्लभ। धौँ = न-जानें। कत = क्यों। अकाथ = व्यर्थ। पाथ = जल। भाथ = तरकस। भावार्थ—रे मन ! तब (पीछे) तू हाथ मलकर पछतायेगा। तुझे देवताओं- के लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर सुगमतासे मिल गया है, यह समझकर भी न-जानें क्यों तू उसे व्यर्थ खो रहा है ॥१॥ परमात्मासे विमुख रहकर सुखका साधन करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे घी निकालनेके लिए पानी मँथनेपर केवल परि-
१६८ विनय-पत्रिका श्रमरुपी फल हाथ लगता है। यह सोचकर तू कुमार्ग और कुसंगको छोड़कर सज्जनोंके साथ मिलकर सुमार्गपर चल एवं ॥२॥ राम-भक्तोंके दर्शन कर और उनके मुखसे भगवान्की कीर्त्ति सुनकर नामको रट—रामकी गुण-गाथाओंका गान कर। हाथमें धनुष-बाण लिये मुनियोंके वस्त्र धारण किये तथा कमरमें तरकस कसे हुए प्रभुका अपने हृदयमें ध्यान कर ॥३॥ हे तुलसीदास ! तू सब प्रपंचोंको छोड़कर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंपर मस्तक झुका। तू डर न, तेरे जैसे बहुत-से खलोंको जानकी-वल्लभ श्री रघुनाथजी अपना चुके हैं ॥४॥ राग-धनाश्री [ ८५ ] मन ! माधव को नेकु निहारहि । सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहि सँभारहि ॥१॥ सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि । रंजन संत, अखिल अघ-गंजन, भंजन विषय-विकारहि ॥२॥ जो बिनु जोग-जग्ग-ब्रत-संजम गयो चहै भव पारहि । तौ जनि तुलसिदास निसि-बासर हरि-पद-कमल बिसारहि ॥३॥ शब्दार्थ—नेकु = जरा, तनिक। रंजन = प्रसन्न करनेवाले। अघ = पाप। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! भगवान् माधवकी ओर तनिक देख। रे शठ ! सुन, जैसे कंगाल सदैव अपने धनकी सँभाल किया करता है, उसी प्रकार तू प्रतिक्षण परमात्माको सँभालनेमें लगा रह ॥१॥ (किस परमात्माको सँभालनेमें यह मन लगा रहे ?) परम सुन्दर और उदार (दानी) परमात्माको। वह परमात्मा शोभा, शील, ज्ञान और गुणोंके घर हैं। वह संत-जनोंको प्रसन्न करनेवाले, सम्पूर्ण पापोंको नाश करनेवाले तथा विषय-विकारको दूर करनेवाले हैं ॥२॥ यदि तू बिना योग, यज्ञ, व्रत और संयमके ही संसार-सागरसे पार होना चाहता है, तो ऐ तुलसीदास ! रातदिन भगवान्के चरणारविन्दोंको न भूल, अर्थात् रात- दिन उनके चरणारविन्दोंका स्मरण किया कर ॥३॥
विनय-पत्रिका १६९ विशेष १ 'सुंदर परम उदारहिं'—में 'परम' शब्द 'देहरी दीपक' है। जो शब्द ड्योढ़ीके दीपककी भाँति अपनेसे पूर्व और पर दोनों शब्दोंके साथ लगता है उसे 'देहरी दीपक' कहते हैं। जैसे ड्योढ़ीका दीपक भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश करता है, उसी प्रकार यह शब्द दोनों ओर लगता है। [ ८६ ] इहै कह्यो सुत ! वेद चहूँ । श्रीरघुवीर-चरन-चिंतन तजि नाहिंन ठौर कहूँ ॥१॥ जाके चरन विरंचि सेइ सिधि पाई संकर हूँ । सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ ॥२॥ जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ । हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-वचन-मन हूँ ॥३॥ करुनासिंधु, भगत—चिंतामनि, सोभा सेवत हूँ । और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ ॥४॥ सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष वचन जवहूँ । तुलसिदास रघुनाथ-विमुख नहिं मिटइ विपति कवहूँ ॥५॥ शब्दार्थ—विरंचि = ब्रह्मा । श्री = लक्ष्मी । संतत = सदा । सुर = देवता । उरग = (उर+ग) छातीके बल गमन करनेवाला, सर्प । तात = पुत्र । परुष = कठोर । प्रसंग—महाराज उत्तानपादकी दो रानियाँ थीं—सुनीति और सुरुचि । सुनीतिके पुत्र ध्रुव थे और सुरुचिके उत्तम । राजाका स्नेह छोटी रानीपर अधिक था । एक दिन राजा अपने पुत्र उत्तमको गोदमें लिये बैठे थे, उसी समय ध्रुव वहाँ आकर उनकी गोदमें बैठने लगे । विमाताने उनसे कड़े शब्दोंमें कहा, पहले तप करके राजाकी गोदमें बैठनेके अधिकारी बनो, पीछे गोदमें बैठनेका साहस करना । यह सुनकर ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीतिके पास लौट आये । सारा हाल सुननेके बाद ध्रुवकी माता सुनीतिने उन्हें जो उपदेश दिया, उसीके प्रसंगमें यह पद बनाया गया है । भावार्थ—हे पुत्र (ध्रुव) ! चारों वेदोंने यही कहा है कि श्रीरामजीके चरणों-