भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 175

१६४ विनय-पत्रिका कवहूँ देव ! जग धनमय रिपुमय, कवहूँ नारिमय भासै । संसृति-सन्निपात दारुन दुख, बिनु हरि-कृपा न नासै ॥४॥ संजम, जप, तप, नेम, धरम, व्रत, बहु भेषज-समुदाई । तुलसिदास भव-रोग , रामपद-प्रेम-हीन नहिं जाई ॥५॥ शब्दार्थ—जुर = ज्वर । सठ = दुष्ट । बिडंबरत = दम्भ या पाखंडमें रत । संसृति = संसार । भेषज = दवा । भावार्थ—हे दीनबन्धु, आनन्दके समुद्र, कृपाकी खानि और कारुणिक रामजी ! हे नाथ ! सुनिये, मेरा मन तीनों तापोंसे जल रहा है, इसीसे वह पागलपन करता फिर रहा है (ज्वरमें मनुष्य अचेत होकर बकता है) ॥१॥ (उसका पागलपन यही है कि) कभी तो वह योगाभ्यास करता है, कभी भोग- विलासमें फँस जाता है, कभी वह दुष्ट हठपूर्वक वियोगके वशमें हो जाता है, कभी मोहवश होकर अनेक तरहकी शत्रुता करता है और कभी वह बड़ा दया- वान् बन जाता है ॥२॥ कभी दीन, बुद्धिहीन और बड़ा ही कंगाल बन जाता है, कभी घमंडी राजा बन जाता है, कभी मूढ़, पंडित और ढोंगी बन जाता है एवं कभी धर्मरत ज्ञानी बन जाता है ॥३॥ हे देव ! कभी उसे यह संसार धनमय दीखता है, कभी शत्रुमय और स्त्री-मय दीखता है (अर्थात् कभी तो वह लोभमें, कभी क्रोधमें और कभी काममें फँसा रहता है) । इस संसाररूपी सन्नि- पात ज्वरका दारुण दुःख बिना ईश्वर-कृपाके नष्ट नहीं होता ॥४॥ यद्यपि संयम, जप, तप, नेम, धर्म, व्रत आदि बहुत-सी औषधियाँ हैं, पर तुलसीदास कहते हैं कि यह संसाररूपी रोग श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हुए विना दूर नहीं हो सकता ॥५॥ विशेष १—इस पदमें मनकी विभिन्न दशाओंका वर्णन किया गया है । [ ८२ ] मोहजनित मल लाग विविध विधि कोटिहु जतन न जाई । जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥१॥

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