विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १६७ किये हुए चरित्रको रोमांच होकर प्रसन्न मनसे सुना और कहा ही ॥४॥ अब जब कि बुढ़ापेने दौड़कर अंग-प्रत्यंगको व्याकुल करके पीस डाला है, तब मणिहीन सर्पकी भाँति सोचा करता हूँ, सिर पीटकर तथा हाथ मींजकर पछताता हूँ, पर इस असह्य दावानलको बुझानेवाला कोई भी मित्र या हितू नहीं ! ॥५॥ जिनके लिए अपना परलोक बिगाड़ दिया, वे भी निकट खड़े होनेमें शर्माते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि अब भी उस श्रीरामजीका स्मरण कर, जिनका एक बार नाम लेनेसे गजेन्द्र तर गया था ॥६॥ विशेष १—‘तह्यो गयंद’—एक बार तालाबमें जल-क्रीड़ा करते समय एक हाथी- का पैर एक मगरने पकड़ लिया था। जब सारी शक्ति लगानेपर भी हाथी अपना पैर न छुड़ा सका, तब उसने निराश होकर भगवान्को पुकारा। भगवान्ने ग्राहको मारकर उस हाथीको मुक्त कर दिया। [ ८४ ] तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ भयो है सुगम तोको अमर-अगम तन, समुझि धौं कत खोवत अकाथ॥१॥ सुख-साधन हरि-विमुख वृथा जैसे श्रम-फल घृत हित मथे पाथ। यह विचारि, तजि कुपथ-कुसंगति, चलि सुपंथ मिलि भले साथ ॥२॥ देखु राम-सेवक, सुनि कीरति, रटहि नाम करि गान गाथ। हृदय आनु धनु बान-पानि प्रभु, लसे मुनिपट, कटि कसे भाथ ॥३॥ तुलसिदास परिहरि प्रपंच सब, नाउ रामपद-कमल माथ। जनि डरपहि तोसे अनेक खल, अपनाये जानकीनाथ ॥४॥ शब्दार्थ—तौ = तब, तो। मींजि = मलकर। अमर = देवता। अगम = दुर्लभ। धौँ = न-जानें। कत = क्यों। अकाथ = व्यर्थ। पाथ = जल। भाथ = तरकस। भावार्थ—रे मन ! तब (पीछे) तू हाथ मलकर पछतायेगा। तुझे देवताओं- के लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर सुगमतासे मिल गया है, यह समझकर भी न-जानें क्यों तू उसे व्यर्थ खो रहा है ॥१॥ परमात्मासे विमुख रहकर सुखका साधन करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे घी निकालनेके लिए पानी मँथनेपर केवल परि-