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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका १६७ किये हुए चरित्रको रोमांच होकर प्रसन्न मनसे सुना और कहा ही ॥४॥ अब जब कि बुढ़ापेने दौड़कर अंग-प्रत्यंगको व्याकुल करके पीस डाला है, तब मणिहीन सर्पकी भाँति सोचा करता हूँ, सिर पीटकर तथा हाथ मींजकर पछताता हूँ, पर इस असह्य दावानलको बुझानेवाला कोई भी मित्र या हितू नहीं ! ॥५॥ जिनके लिए अपना परलोक बिगाड़ दिया, वे भी निकट खड़े होनेमें शर्माते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि अब भी उस श्रीरामजीका स्मरण कर, जिनका एक बार नाम लेनेसे गजेन्द्र तर गया था ॥६॥ विशेष १—‘तह्यो गयंद’—एक बार तालाबमें जल-क्रीड़ा करते समय एक हाथी- का पैर एक मगरने पकड़ लिया था। जब सारी शक्ति लगानेपर भी हाथी अपना पैर न छुड़ा सका, तब उसने निराश होकर भगवान्‌को पुकारा। भगवान्‌ने ग्राहको मारकर उस हाथीको मुक्त कर दिया। [ ८४ ] तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ भयो है सुगम तोको अमर-अगम तन, समुझि धौं कत खोवत अकाथ॥१॥ सुख-साधन हरि-विमुख वृथा जैसे श्रम-फल घृत हित मथे पाथ। यह विचारि, तजि कुपथ-कुसंगति, चलि सुपंथ मिलि भले साथ ॥२॥ देखु राम-सेवक, सुनि कीरति, रटहि नाम करि गान गाथ। हृदय आनु धनु बान-पानि प्रभु, लसे मुनिपट, कटि कसे भाथ ॥३॥ तुलसिदास परिहरि प्रपंच सब, नाउ रामपद-कमल माथ। जनि डरपहि तोसे अनेक खल, अपनाये जानकीनाथ ॥४॥ शब्दार्थ—तौ = तब, तो। मींजि = मलकर। अमर = देवता। अगम = दुर्लभ। धौँ = न-जानें। कत = क्यों। अकाथ = व्यर्थ। पाथ = जल। भाथ = तरकस। भावार्थ—रे मन ! तब (पीछे) तू हाथ मलकर पछतायेगा। तुझे देवताओं- के लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर सुगमतासे मिल गया है, यह समझकर भी न-जानें क्यों तू उसे व्यर्थ खो रहा है ॥१॥ परमात्मासे विमुख रहकर सुखका साधन करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे घी निकालनेके लिए पानी मँथनेपर केवल परि-

१६८ विनय-पत्रिका श्रमरुपी फल हाथ लगता है। यह सोचकर तू कुमार्ग और कुसंगको छोड़कर सज्जनोंके साथ मिलकर सुमार्गपर चल एवं ॥२॥ राम-भक्तोंके दर्शन कर और उनके मुखसे भगवान्‌की कीर्त्ति सुनकर नामको रट—रामकी गुण-गाथाओंका गान कर। हाथमें धनुष-बाण लिये मुनियोंके वस्त्र धारण किये तथा कमरमें तरकस कसे हुए प्रभुका अपने हृदयमें ध्यान कर ॥३॥ हे तुलसीदास ! तू सब प्रपंचोंको छोड़कर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंपर मस्तक झुका। तू डर न, तेरे जैसे बहुत-से खलोंको जानकी-वल्लभ श्री रघुनाथजी अपना चुके हैं ॥४॥ राग-धनाश्री [ ८५ ] मन ! माधव को नेकु निहारहि । सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहि सँभारहि ॥१॥ सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि । रंजन संत, अखिल अघ-गंजन, भंजन विषय-विकारहि ॥२॥ जो बिनु जोग-जग्ग-ब्रत-संजम गयो चहै भव पारहि । तौ जनि तुलसिदास निसि-बासर हरि-पद-कमल बिसारहि ॥३॥ शब्दार्थ—नेकु = जरा, तनिक। रंजन = प्रसन्न करनेवाले। अघ = पाप। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! भगवान् माधवकी ओर तनिक देख। रे शठ ! सुन, जैसे कंगाल सदैव अपने धनकी सँभाल किया करता है, उसी प्रकार तू प्रतिक्षण परमात्माको सँभालनेमें लगा रह ॥१॥ (किस परमात्माको सँभालनेमें यह मन लगा रहे ?) परम सुन्दर और उदार (दानी) परमात्माको। वह परमात्मा शोभा, शील, ज्ञान और गुणोंके घर हैं। वह संत-जनोंको प्रसन्न करनेवाले, सम्पूर्ण पापोंको नाश करनेवाले तथा विषय-विकारको दूर करनेवाले हैं ॥२॥ यदि तू बिना योग, यज्ञ, व्रत और संयमके ही संसार-सागरसे पार होना चाहता है, तो ऐ तुलसीदास ! रातदिन भगवान्‌के चरणारविन्दोंको न भूल, अर्थात् रात- दिन उनके चरणारविन्दोंका स्मरण किया कर ॥३॥

विनय-पत्रिका १६९ विशेष १ 'सुंदर परम उदारहिं'—में 'परम' शब्द 'देहरी दीपक' है। जो शब्द ड्योढ़ीके दीपककी भाँति अपनेसे पूर्व और पर दोनों शब्दोंके साथ लगता है उसे 'देहरी दीपक' कहते हैं। जैसे ड्योढ़ीका दीपक भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश करता है, उसी प्रकार यह शब्द दोनों ओर लगता है। [ ८६ ] इहै कह्यो सुत ! वेद चहूँ । श्रीरघुवीर-चरन-चिंतन तजि नाहिंन ठौर कहूँ ॥१॥ जाके चरन विरंचि सेइ सिधि पाई संकर हूँ । सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ ॥२॥ जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ । हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-वचन-मन हूँ ॥३॥ करुनासिंधु, भगत—चिंतामनि, सोभा सेवत हूँ । और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ ॥४॥ सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष वचन जवहूँ । तुलसिदास रघुनाथ-विमुख नहिं मिटइ विपति कवहूँ ॥५॥ शब्दार्थ—विरंचि = ब्रह्मा । श्री = लक्ष्मी । संतत = सदा । सुर = देवता । उरग = (उर+ग) छातीके बल गमन करनेवाला, सर्प । तात = पुत्र । परुष = कठोर । प्रसंग—महाराज उत्तानपादकी दो रानियाँ थीं—सुनीति और सुरुचि । सुनीतिके पुत्र ध्रुव थे और सुरुचिके उत्तम । राजाका स्नेह छोटी रानीपर अधिक था । एक दिन राजा अपने पुत्र उत्तमको गोदमें लिये बैठे थे, उसी समय ध्रुव वहाँ आकर उनकी गोदमें बैठने लगे । विमाताने उनसे कड़े शब्दोंमें कहा, पहले तप करके राजाकी गोदमें बैठनेके अधिकारी बनो, पीछे गोदमें बैठनेका साहस करना । यह सुनकर ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीतिके पास लौट आये । सारा हाल सुननेके बाद ध्रुवकी माता सुनीतिने उन्हें जो उपदेश दिया, उसीके प्रसंगमें यह पद बनाया गया है । भावार्थ—हे पुत्र (ध्रुव) ! चारों वेदोंने यही कहा है कि श्रीरामजीके चरणों-

१७० विनय-पत्रिका का ध्यान किये बिना कहीं भी ठौर नहीं है ॥१॥ जिनके चरणोंकी सेवा करके ब्रह्मा और शिवने भी सिद्धि प्राप्त की है, शुक-सनकादि जीवन्मुक्त होकर विचरण कर रहे हैं और अब भी वे उनका भजन करते जा रहे हैं ॥२॥ यद्यपि लक्ष्मीजी सदासे परम चंचला हैं, कहीं भी स्थिर नहीं रहतीं, तथापि वह भगवच्चरणार- विन्दको पाकर मन-वचन-कर्मसे अचल हो गयीं ॥३॥ (दासता बुरी चीज है, पर) करुणा-सागर, भक्त-चिन्तामणि भगवान् रामचन्द्रजीकी सेवा करनेमें भी शोभा है और जितने देवता तथा दैत्योंके स्वामी हैं, सबको षट् ऊर्मी शोक, मोह, क्षुधा, पिपासा, जरा, मरण इन छ साँपोंने डँस लिया है ॥४॥ हे पुत्र ! (तुम्हारी विमाता) सुरुचिने जो तुमसे कहा है (कि पहले तप करो), वह यद्यपि अत्यन्त कठोर वचन है फिर भी सत्य है। अतः हे तुलसीदास ! श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहनेपर विपत्तियोंका नाश कभी नहीं होता ॥५॥ ८७ सुनु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि-पद-विमुख लह्यो न काहु सुख, सठ ! यह समुझ सबेरो ॥१॥ बिछुरे ससि-रवि मन-नैननि तें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि-दिवस गगन महँ, तहँ रिपु राहु बड़ेरो ॥२॥ जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहियो ताहू केरो ॥३॥ छुटै न विपति भजे बिनु रघुपति, श्रुति संदेह निबेरो। तुलसिदास अब आस छाँड़ि करि, होहु राम को चेरो ॥४॥ शब्दार्थ—सवेरो = शीघ्र, समय रहते । सुरसरिता = गंगा । घनेरो = बहुतसे । निबेरो = दूर कर दिया है। भावार्थ—रे मूढ़ मन ! मेरी शिक्षा सुन । भगवान्के चरणोंसे विमुख रहकर किसीको सुख नहीं प्राप्त हुआ । रे दुष्ट ! इस बातको समय रहते ही समझ ले ॥१॥ भगवान्के मनसे चन्द्रमा और नेत्रोंसे सूर्य अलग होनेके कारण ही (चन्द्रमा और सूर्य) भारी दुःख पा रहे हैं। वे रात-दिन आकाशमें थके हुए घूमते रहते हैं और वहाँ उनका बड़ा शत्रु राहु मौजूद है ॥२॥

विनय-पत्रिका १७१ यद्यपि गंगाजी अत्यन्त पवित्र हैं, तीनों लोकोंमें उनकी कीर्त्ति छा रही है, पर भगवान्के चरणोंसे अलग होनेके कारण अबतक उनका भी नितका बहना बन्द नहीं हुआ ॥३॥ वेदोंने यह सन्देह दूर कर दिया है कि श्रीरामजीका भजन किये बिना विपत्तियाँ नहीं छूट सकतीं । हे तुलसीदास ! अब सारी आशाओंको छोड़- कर तू श्रीरामजीका दास हो जा ॥४॥ विशेष १- 'ससि-रवि मन-नैननि तें'- चन्द्रमाकी उत्पत्ति भगवान्के मनसे हुई है और सूर्यकी उत्पत्ति उनके नेत्रोंसे । पुरुषसूक्तमें लिखा भी है:- 'चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत' । २- 'रिपु राहु' - समुद्र-मन्थनके बाद जब देवता और दैत्य अमृतके लिए आपसमें लड़ने लगे, तब भगवान्ने मोहिनीरूप धारण करके अमृतका घड़ा अपने हाथमें लेकर एक पंक्तिमें देवताओं और दूसरी पंक्तिमें दैत्योंको बिठाकर देवताओंकी पंक्तिसे उसे बाँटना शुरू किया । उस समय दैत्य उनके रूपपर मोहित हो गये थे । राहु नामक दैत्य भगवान्‌का कपट समझकर सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें जा बैठा और धोखेसे उसे भी अमृत दिया गया । पश्चात् जब भगवान्‌को यह बात सूर्य और चन्द्रमाके इशारा करनेपर मालूम हुई, तब उन्होंने चक्रसे उसका सिर काट दिया । किन्तु वह अमृत पान कर चुका था, अतः मरा नहीं और मुण्डका राहु हो गया और धड़का केतु । बस राहु उसी वैरसे ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको दुःख देता है । ( ८८ ) कबहुँ मन विश्राम न मान्यो । निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥१॥ जदपि विषय-सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जाल अरुझान्यो । तदपि न तजत मूढ़, ममताबस जानत हूँ नहिं जान्यो ॥२॥ जनम अनेक किये नाना बिधि, करम-कीच चित सान्यो । होइ न विमल विवेक-नीर-बिनु, वेद पुरान बखान्यो ॥३॥

१७२ विनय-पत्रिका निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरषि हृदै नहिं आन्यो। तुलसिदास कव तृषा जाय सर खनतहि जनम सिरान्यो ॥४॥ शब्दार्थ—सहज सुख = आत्मानन्द । सान्यो = सान रखा है। आन्यो = लाना, धारण नहीं किया। तृषा = प्यास । सिरान्यो = बीत गया। भावार्थ—रे मन ! तूने कभी विश्राम न माना। (तू) आत्मानन्दको भूल- कर रातदिन घूमता रहता है और (तुझे) इन्द्रियाँ इधर-उधर खींचकर ले जाती हैं ॥१॥ यद्यपि विषयोंके साथ तूने दुःसह दुःख सहन किये हैं और कठिन जालमें फँसा हुआ है, तथापि रे मूढ़ ! तू उसे नहीं छोड़ रहा है और ममताके कारण जान लेनेपर भी उसे नहीं जाना ॥२॥ अनेक जन्मोंमें नाना प्रकारके कर्म करके तू ने उन्हीं (कर्मों)के कीचड़में चित्तको सान रखा है। किन्तु विवेक-रूपी जलके बिना तू निर्मल नहीं हो सकता, ऐसा वेदों और पुराणोंने कहा है ॥३॥ अपनी भलाई स्वामी रूप, पितारूप और गुरुरूप प्रभुजीसे है, किन्तु तूने हर्षित होकर अपने हृदयमें उन्हें धारण नहीं किया । तुलसीदास कहते हैं कि जिस तालाबको खोदनेमें ही जीवन बीत गया, उस तालाबसे भला प्यास कब बुझ सकती है ॥६॥ विशेष १—'निज हित……आन्यो'—का अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा है, “जैसा प्रेम अपने मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके साथ किया जाता है, वैसा तूने प्रसन्न होकर कभी हृदयसे भगवान्‌के साथ नहीं किया।” किन्तु गोस्वामी- जी के शब्दोंसे यह अर्थ नहीं निकलता । [ ८९ ] मेरो मन हरि जू ! हठ न तजै। निसि-दिन नाथ देउँ सिख बहु-विधि, करत सुभाउ निजै ॥१॥ ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै । ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ पुनि खल पतिहिं भजै ॥२॥ लोलुप भ्रमत गृहपसु ज्यों जहँ तहँ सिर पदत्रान बजै । तदपि अधम बिचरत तेहि मारग कबहुँ न मूढ़ लजै ॥३॥

हौं हारयो करि जतन विविध बिधि अतिसै प्रवल अजै। तुलसिदास वस होइ तवहिं, जब प्रेरक प्रभु वरजै ॥४॥ शब्दार्थ—निजै = अपने ही। अनुभवति = अनुभव करती है। अनुकूल = प्रसन्न। गृहपसु = कुत्ता। पदत्रान = जूता। बरजै = मना करें, रोकें। भावार्थ—हे प्रभो ! मेरा मन हठ नहीं छोड़ता। हे नाथ ! मैं उसे रातदिन अनेक प्रकारसे शिक्षा देता हूँ, पर यह अपने ही स्वभावानुसार काम करता है ॥१॥ जैसे युवती स्त्री संतान जननेके समय अत्यन्त असह्य कष्टका अनुभव करती है, पर अनुकूल (प्रसव-वेदनासे छुटकारा पाते ही प्रसन्न) होकर वह मूर्खा सारे दुःखोंको भूलकर फिर दुष्ट पतिको भजने लगती है ॥२॥ जैसे लालची कुत्ता घूमता हुआ जहाँ जाता है, वहीं उसके सिरपर जूते पड़ते हैं, फिर भी वह नीच उसी मार्गपर विचरण करता है, इसमें वह मूढ़ कभी भी लज्जित नहीं होता ॥३॥ मैं अनेक प्रकारके यत्न करके हार गया, (पर यह मन) अत्यन्त प्रबल और अजेय है। तुलसीदास कहते हैं कि यह मन तभी वशमें हो सकता है, जब जगत्‌के प्रेरक भगवान् इसे रोकें ॥४॥ विशेष १—'अतिसै प्रबल अजै'—गीतामें अर्जुनने भगवान्‌से कहा है— चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी बातका समर्थन इस प्रकार किया है— असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । ९० ] ऐसी मूढ़ता या मनकी।¹ परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की ॥१॥ १. महामहोपाध्याय पं० सुधाकरजी द्विवेदीका रचा हुआ संस्कृत अनुवाद इस प्रकार है— एतादृशी मूढ़ता मनसः । रामभक्तिसुरसरितं हित्वा, वांछति कणं कुपयसः ॥

१७४ विनय-पत्रिका धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की । नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की ॥२॥ ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की । टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥३॥ कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि ! जानत हौ गति जन की । तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की ॥४॥ शब्दार्थ—गच = भूमि, दीवार, फर्श । सेन = बाजपक्षी; 'सेन' शब्द 'श्येन' का अपभ्रंश है । आनन = मुख । पन = प्रतिज्ञा । भावार्थ—इस मनकी ऐसी मूढ़ता है कि यह श्रीराम-भक्ति-रूपी देवनदी- (गंगा) को त्यागकर ओस-कणकी आशा करता है ॥१॥ जैसे प्यासा पपीहा धुएँके समूहको देखकर उसे मेघ समझ लेता है, किन्तु निकट जानेपर न तो उसे शीतलता मिलती है और न जल ही, उलटा उसे नेत्रोंसे हाथ धो बैठना पड़ता है ॥२॥ जैसे बाज पक्षी शीशेकी दीवारमें अपने शरीरकी निर्जीव छाया देखकर आहारके लिए विशेष आतुर होनेके कारण अपने मुँहकी दशा भूलकर उसपर टूट पड़ता है, परिणाम यह होता है कि उसीका मुँह घायल हो जाता है ॥३॥ हे कृपानिधान ! मैं इस मनकी कुचाल कहाँतक कहूँ, आप तो इस दासकी दशा जानते ही हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासका असह्य दुःख दूर करके अपने प्रणकी लाज रखिये ॥४॥ [ ९१ ] नाचत ही निसि-दिवस मरयो । तबही तें न भयो हरि थिर जब तें जिव नाम धरयो ॥१॥ धूमपटलमवलोक्य चातको, बुध्वा यथाभ्रमलसः । लभते तत्र न शीतलम्मभो, दृग्वैरिणं च वयसः ॥ श्येनः कांचकुट्टिमे दृष्ट्वा, तं विम्बमतिरभसः । पतित तत्र परपतन्निरूपे, हानिमुपैति च वचसः ॥ मनसः किं वर्णये जडत्वं, करुणानिधे कुशशयः । कृत्वाऽत्म पणत्रपां जनस्यापहर दुःखमतितपसः ॥

विनय-पत्रिका ७५ बहु वासना विविध कंचुकि भूषन लोभादि भरथ्यो। चर अरु अचर गगन-जल-थल महँ, कौन न स्वाँग करथ्यो ॥२॥ देव-दनुज, मनि, नाग, मनुज नहिं जाँचत कोउ उबरथ्यो । मेरो दुसह दरिद्र, दोष, दुख काहू तौ न हरथ्यो ॥३॥ थके नयन, पद, पानि, सुमति, बल, संग सकल बिछुरथ्यो । अब रघुनाथ सरन आयो जन, भव-भय बिकल डरथ्यो ॥४॥ जेहि गुन तें वस होहु रीझि करि, सो मोहिं सब विसरथ्यो । तुलसिदास निज भवन-द्वार प्रभु, दीजै रहन परथ्यो ॥५॥ शब्दार्थ—कंचुकि = वस्त्र । चर = चलनेवाले,चैतन्य । अचर = जड़ । गगन = आकाश । स्वाँग = तमाशा । भावार्थ—रातदिन नाचते ही नाचते मरा । हे हरि ! जबसे आपने जीव नाम रख दिया, तभीसे स्थिरता जाती रही ॥१॥ नाना प्रकारके वासनारूपी वस्त्र तथा लोभादि आभूषण धारणकर चर और अचर एवं आकाश, जल और पृथिवीमें ऐसा कौन-सा स्वाँग है जो न किया हो ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं बचा है जिससे मैंने याचना न की हो । किन्तु मेरे दुःसह दारिद्र्य, दोष और दुःखका किसीने भी तो हरण नहीं किया ॥३॥ नेत्र, पैर, हाथ, बुद्धि और बल सब थक गये और सबने मेरा साथ भी छोड़ दिया । अतः हे रघुनाथजी ! अब संसार-भयसे डरकर विकल हुआ यह दास आपकी शरणमें आया है ॥४॥ जिन गुणोंपर आप रीझकर वशमें हुआ करते हैं, उन सबको मैं भूल गया हूँ । हे प्रभो ! अब तुलसीदासको अपने गृहके द्वारपर पड़ा रहने दीजिये—हटाइये नहीं ॥५॥ विशेष १—'जब तँ जिव नाम धर्यो'—यों तो वेदान्तशास्त्रने 'जीव' संज्ञा पड़नेके कई कारण बतलाये हैं, पर उन सबमें अद्वैतवेदान्तका ही मत ग्राह्य है। किन्तु अद्वैतवादमें भी इस विषयमें कई मत हैं—जैसे अवच्छेदवाद, आभास- वाद, प्रतिबिम्बवाद, एक-जीववाद और अनेक जीववाद आदि । प्रत्येक 'वाद' के अनुसार 'जीव'की परिभाषा १३६ वें पदकी टिप्पणीमें दी गयी है। यहाँ

१७८ विनय-पत्रिका तो केवल इतना ही लिखना विवक्षित है कि जब अविद्या, प्रतिबिम्बरूप चिदा- भास और उसका अधिष्ठान कूटस्थ इन तीनोंका मेल होता है, तब 'जीव' नाम पड़ता है।—यह सिद्धान्त आभासवादका है। [ ९२ ] माधव जू, मोसम मंद न कोऊ । जद्यपि मीन-पतंग हीन मति, मोहिं नहिं पूजैं ओऊ ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-वस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो । देखत विपति विषय न तजत हौं, तातें अधिक अयान्यो ॥२॥ महा मोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो । श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥३॥ ‘अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति, ज्यों भरि मुख पकरै । निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥४॥ परम कठिन भव व्याल ग्रसित हौं, त्रसित भयो अति भारी । चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ विसारी ॥५॥ जलचर-वृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा । एकहि एक खात लालच-वस नहिं देखत निज नासा ॥६॥ मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावैं । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु, यह भरोस जिय आवै ॥७॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। पूजैं = पूरा होना, बराबरी करना। वस्य = अधीन। पावक = अग्नि, दीपक। लोह = लोहेकी कँटिया। अयान्यो = मूर्ख। अस्थि = हड्डी। भेक = मेढक। खगपति = गरुड़। सारद = सरस्वती। भावार्थ—हे माधवजी! मुझ-सा मूर्ख कोई नहीं है। यद्यपि मछली और पतंग बुद्धिहीन हैं, पर वे भी मेरी बराबरी नहीं कर सकते ॥१॥ पतंगने तो सुन्दर रूपके वशमें होकर (दीपकको) आग नहीं समझा और मछलीने आहारके वशमें होकर लोहेके काँटेको काँटा नहीं जाना; किन्तु मैं विपत्तियोंको देखता हुआ भी विषयोंको नहीं छोड़ रहा हूँ, इससे मैं (मछली और पतंगसे) अधिक मूर्ख हूँ॥२॥ महामोह-रूपी अपार नदीमें सदा बहता फिरा, भगवान्‌के चरण-कमलरूपी नौका-

_विनय-पत्रिका १७७ को छोड़कर बारम्बार फेन (विषय-सुख) पकड़ता रहा ॥३॥ जैसे अत्यन्त भूखा कुत्ता पुरानी हड्डीको भरमुँह पकड़ता है और अपने ही तालूका खून पी-कर मनमें सन्तोष धारण करता है (यह नहीं समझता कि यह खून तो मेरे ही शरीरका है, उसी प्रकार मनुष्य भी विषयोंमें अपने ही बल-वीर्यका नाश करके प्रसन्न होता है) ॥४॥ मैं अत्यन्त कठिन संसार-सर्पसे ग्रसित होनेके कारण बहुत डर गया हूँ और गरुड़-नाथ-(भगवान्) को भूलकर मेढककी शरणमें जाकर निर्भय होना चाहता हूँ ॥५॥ जलमें रहनेवाले जीव जालमें सिमिट-सिमिटकर एक जगह एकत्र हो जाते हैं और लालचवश एक-दूसरेको खाते हैं, — अपना नाश नहीं देखते (ठीक वही हाल मेरा है) ॥६॥ यदि सरस्वती अनेक युगोंतक मेरे पापोंका लेखा लगाती रहें, तो भी पार नहीं पा सकतीं। किन्तु तुलसीदासके जीमें तो यह विश्वास या भरोसा है कि प्रभु (श्रीराम) जी पतितोंका उद्धार करनेवाले हैं (वह मेरा उद्धार अवश्य करेंगे) ॥७॥ [ ९३ ] कृपा सो धौं कहाँ बिसारी राम। जेहि करुना सुनि श्रवन-दीन-दुख, धावत हौ तजि धाम ॥१॥ नागराज निज बल विचारि हिय, हारि चरन चित दीन्हौं। आरत गिरा सुनत खगपति तजि, चलत विलंब न कीन्हौं ॥२॥ दितिसुत त्रास-त्रसित निसिदिन प्रहलाद-प्रतिग्या राखी। अतुलित बल मृगराज-मनुज-तनु दनुज हत्यो श्रुति साखी ॥३॥ भूप-सदसि सब नृप विलोकि प्रभु, राखु कह्यो नर-नारी। वसन पूरि, अरि दरप दूरि करि, भूरि कृपा दनुजारी ॥४॥ एक एक रिपुतें त्रासित जन, तुम राखे रघुवीर। अब मोहिं देत दुसह दुख बहु रिपु कस न हरहु भव-पीर ॥५॥ लोभ-ग्राह, दनुजेस-क्रोध कुरुराज-बंधु खल मार। तुलसिदास प्रभु यह दारुन दुख भंजहु राम उदार ॥६॥ शब्दार्थ—धौं = न जानें। श्रवन = कान। नागराज = गजेन्द्र। दितिसुत = हिरण्य- कशिपु। सदसि = सभामें। राखु = रक्षा करो। नर-नारी = अर्जुनकी स्त्री द्रौपदी। मार = कामदेव।

१७८ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! आपने अपनी उस कृपाको न-जाने कहाँ भुला दिया। (किस करुणाको ?) जिस करुणाके कारण आप दीनोंका दुःख कानसे सुनते ही अपना धाम (निवास-स्थान) छोड़कर दौड़ा करते हैं ॥१॥ जब गजेन्द्र- ने अपना बल विचारकर दिलमें हार मान ली और आपके चरणोंमें चित्त लगाया, तब आपने उसकी आर्त्तवाणी सुनते ही गरुड़को छोड़कर (पैदल ही) चल देनेमें देर नहीं की ॥२॥ आपने हिरण्यकशिपुके भयसे रातदिन भीत रहनेवाले प्रह्लादकी प्रतिज्ञा रखी और अतुलित बलशाली सिंह और मनुष्य (नृसिंह) का शरीर धारण करके उस (हिरण्यकशिपु) दैत्यको मारा, वेद इसका साक्षी है ॥३॥ राज-सभामें सब राजाओंको देखकर 'नर'के अवतार अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने जब कहा कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये, तब हे दैत्योंके शत्रु ! आपने बड़ी कृपा करके वस्त्रोंका ढेर लगा दिया और शत्रुओं (दुर्योधन, दुःशासन आदि) का घमंड दूर कर दिया ॥४॥ हे रघुवीरजी ! आपने केवल एक-एक शत्रुसे संत्रस्त भक्तोंकी रक्षा की है, किन्तु यहाँ तो मुझे (एक नहीं) बहुत-से शत्रु (लोभ, क्रोध, काम आदि) असह्य कष्ट दे रहे हैं; फिर आप मेरी सांसारिक यातना क्यों नहीं दूर करते ? ॥५॥ लोभरूपी ग्राह (मँगर), क्रोध रूपी दैत्यराज (हिरण्यकशिपु) और दुष्ट कामदेवरूपी दुर्योधनका भाई (दुःशासन) है। हे प्रभो ! तुलसीदासका यह दारुण दुःख दूर कीजिये ! हे रामजी ! आप उदार हैं (मुझपर उदारता दिखलाइये) ! ॥६॥ विशेष १—'प्रह्लाद-प्रतिज्ञा राखी'—हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लादको रामका नाम नहीं लेने देता था, किन्तु भक्त प्रह्लाद रामका नाम नहीं छोड़ते थे । जब वह हर तरहसे मना करके हार गया, तब उन्हें एक खम्भेसे बाँधकर मारनेके लिए तैयार हुआ । उसने कहा, —'कहाँ है तेरा राम, बुला उसे ।' भक्त प्रह्लादने कहा,—'मोहिमें तोहिमें खङ्ग-खम्भमें, घट घट व्यापिन राम ।' इतना सुनते ही हिरण्यकशिपुने क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिए तलवार सँभाली । तबतक भक्त-वत्सल भगवान् नृसिंहरूपमें खम्भा फाड़कर प्रकट हुए और देखते ही देखते उसे चीड़-फाड़कर प्रह्लादके प्रणकी रक्षा की ।

विनय-पत्रिका १७९ २—'वसनपूरि' जब पांडव अपना सर्वस्व, यहाँतक कि द्रौपदीको भी जुएमें हार गये, तब दुर्योधनने दुःशासनके द्वारा महारानी द्रौपदीको पकड़वा मँगाया और भरी सभामें उन्हें नग्न करनेकी आज्ञा दी। दुष्ट दुःशासन द्रौपदीका वस्त्र पकड़कर खींचने लगा, पर सभामें बैठे हुए लोगोंने कुछ नहीं कहा। अन्तमें अपनेको असहाय समझकर द्रौपदीने दीन भावसे भगवान्‌को पुकारा। तुरन्त ही भगवान्‌ने द्रौपदीकी सहायता की। परिणाम यह हुआ कि दुःशासन साड़ी पकड़कर खींचते-खींचते थक गया, पर साड़ी समाप्त न हुई। ३—'लोभ-ग्राह···खल मार'—के ऊपरकी पंक्तिमें जो 'बहु रिपु' कहा गया है, उसे यहाँ स्पष्ट किया गया है। लोभको ग्राह कहनेका यह आशय है कि जिस प्रकार ग्राह मनुष्यको निगल जाता है, उसी प्रकार लोभ भी मनुष्यके अन्तःकरणको आच्छादित कर लेता है। 'दनुजेस-क्रोध' जैसे हिरण्यकशिपु समय-समयपर वचन और क्रिया द्वारा प्रह्लादको पीड़ा पहुँचाया करता था, उसी प्रकार क्रोध भी समय पाकर मनुष्य-शरीरको जलाता है। इसी प्रकार 'कुरुराज-बन्धु खलमार' कहनेका यह भाव है कि जैसे दुःशासन अन्धा होकर भरी सभामें द्रौपदीकी इज्जत लेना चाहता था, उसी तरह काम भी अन्धा है; कामुक पुरुषोंको कुछ नहीं सूझता। ( ९४ ) काहे ते हरि मोहिं बिसारो। जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो ॥१॥ पतित-पुनीत, दीन-हित, असरन-सरन कहत श्रुति चारो। हौं नहिं अधम, सभीत, दीन ? किधौं वेदन मृषा पुकारो ? ॥२॥ खग-गनिका-गज-ब्याध-पाँति तहँ, जहाँ हौं हूँ बैठारो। अब केहि लाज कृपानिधान ! परसत पनवारो फारो ॥३॥ जो कलिकाल-प्रबल अतिहोइतो, तुव निदेस तें न्यारो। तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥४॥ मसक बिरंचि, बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो। यह सामरथ अछत मोहिं त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥५॥

१८० विनय-पत्रिका नाहिंन नरक परत मो कहँ डर, जद्यपि हौं अति हारो। यह बढ़ि त्रास दास तुलसी प्रभु, नामहु पाप न जारो ॥६॥ शब्दार्थ—मृधा = मिथ्या । खग = पक्षी (जटायु) । गनिका = वेश्या (पिंगला) । व्याध = बहेलिया । पनवारो = पत्तल । निदेस = निर्देश, आज्ञा । गारो = प्रतिष्ठा । अछत = रहते हुए भी । चारो = वश । भावार्थ—हे हरे ! आप मुझे किसलिए भुला रहे हैं ? हे नाथ ! आप अपनी महिमाको और मेरे पापोंको जानते हैं, फिर भी आप मुझे नहीं सँभाल रहे हैं ! ॥१॥ चारों वेदोंका कहना है कि आप पतितोंको पवित्र करनेवाले, दीनोंके हितू और अशरणको शरण देनेवाले हैं । तो क्या मैं नीच, भयभीत और गरीब नहीं हूँ ? अथवा वेदोंने ही मिथ्या बात कही है ? ॥२॥ जहाँ पक्षी (जटायु), गणिका (पिंगला), गजेन्द्र और ('धर्म' नामक) व्याधकी पंक्ति है, वहीं आपने मुझे भी बिठाया है । किन्तु हे कृपानिधान ! अब आप किस लज्जावश मेरे सामने परोसी हुई पत्तलको फाड़ रहे हैं ? अभिप्राय यह है कि मैं अपनेको पापियोंकी पाँतिमें बैठकर भोजन करनेका अधिकारी समझता था अर्थात् मैं वही स्थान प्राप्त करनेका हकदार था जो स्थान गिद्ध, गणिका, व्याध आदि प्राप्त कर चुके हैं ॥३॥ यदि कलिकाल आपसे अधिक बलवान् होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हे हरे ! मैं सब प्रतिष्ठा छोड़कर (अर्थात् बदनामी सहते हुए भी) उसके क्रोध करनेपर भी उसका भरोसा रखकर तथा उसके दोषोंको गुण समझकर उसीको भजता ॥४॥ किन्तु आपका तो ऐसा प्रभाव है कि आप मच्छरको ब्रह्मा और ब्रह्माको मच्छरके समान बना देते हैं । यह सामर्थ्य रहते हुए भी जब आप मुझे त्याग रहे हैं, तब हे नाथ ! उसमें मेरा क्या वश है ! ॥५॥ यद्यपि मैं हर तरहसे हार गया हूँ और मुझे नरकमें पड़नेका भी डर नहीं है, किन्तु दास तुलसीको तो अत्यधिक भय यही है कि आपके नामने मेरे पापोंको नहीं जलाया (संसार यही कहेगा) ॥६॥ विशेष १—'गनिका'—जनकपुरमें 'पिंगला' नाम्नी एक वेश्या थी । एक दिन वह बड़ी राततक अपने प्रेमीकी प्रतीक्षा में बैठी रही, किन्तु वह न आया । इससे उसे बड़ी ग्लानि हुई । सोचने लगी, यदि मैं इतनी तन्मयताके साथ ईश्वर-

विनय-पत्रिका १८१ दर्शन की प्रतीक्षा करती, तो मेरा उद्धार हो जाता। बस, उसी दिनसे उसका जीवन-स्रोत बदल गया और भगवान्‌की कृपासे उसका उद्धार हो गया। २—'व्याध'—इसका अर्थ कुछ टीकाकारोंने वाल्मीकि किया है और कुछ लोगोंने लिखा है कि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णके पैरमें तीर मारनेवाले 'जरा' नामक बहेलियेसे तात्पर्य है। दोनोंकी कथाएँ इस प्रकार हैं:— वाल्मीकि—पहले बहेलिया थे। इनका नाम रत्नाकर था। यह जंगलमें पशुपक्षियोंका शिकार करनेके सिवा बटोहियोंपर डाका डालती थे। पीछे नारदके उपदेशसे जीव-हिंसा छोड़कर उसके विपरीत राम-नाम जपने लगे और मुक्त हो गये। कहा है:— उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि भे ब्रह्म समाना। 'जरा'—भगवान् श्रीकृष्ण एक वृक्षके नीचे पैरके ऊपर दूसरा पैर रखकर लेटे हुए थे। एक बहेलियेने दूरसे भगवान्‌के पैरका तलवा देखकर अनुमान किया कि किसी हरिनकी लाल जिह्वा है। फिर क्या था, उसने लक्ष्य ठीक करके तीर मार दिया। पीछे जब वह भगवान्‌के पास आया, तब बहुत पश्चात्ताप करने लगा। अन्तमें परमात्माका साक्षात् दर्शन होनेके कारण वह व्याध मुक्त हो गया। (कहते हैं कि वह व्याध अंगदका अवतार था। रामावतारमें उसे वर मिला था कि द्वापरमें तुम पितृ-ऋण चुका सकोगे।) किन्तु यहाँ व्याधका अर्थ न तो वाल्मीकि ही है और न 'जरा' नामक व्याध ही। यहाँपर व्याध आया है, 'धर्म' नामक व्याधके लिए। धर्म नामक व्याधकी कथा श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रसिद्ध है। कथा बहुत बड़ी होनेके कारण यहाँ नहीं लिखी जा रही है। इसकी कथा महाभारतके वनपर्वमें भी है, किन्तु उसका जीवन वृत्तान्त तो अत्यन्त संक्षेपमें है—उपदेश ही अधिक है। पुराणोंमें और भी कई व्याधोंकी भिन्न-भिन्न प्रकार की कथाएँ पायी जाती हैं। अतः 'व्याध' शब्दसे यदि व्यक्ति-विशेषका अर्थ न निकाल कर व्याध ही अर्थ किया जाय तो भी कोई हानि नहीं। ३—'परसत पनवारो फारो'—एक सज्जनने स्वर्गीय जयशंकर 'प्रसाद'जी- के यहाँ इस प्रकार अर्थ किया था—'पानीमें उबाला हुआ फारा परोस रहे हैं?'

१८२ विनय-पत्रिका उस समय मित्रवर 'निराला'जी भी मौजूद थे । ऊपरका अर्थ सुनकर सब लोग खूब हँसे । ४-'तौ हरि···तजि गारो'—इस पंक्तिका भी वियोगी हरि आदि सब टीकाकारोंने बड़ा ही ऊटपटाँग अर्थ किया है । विस्तार-भयसे उसे यहाँ उद्धृत करना अनावश्यक है । ९५ ) तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं । जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं ॥१॥ चलिहैं छूटि पुंज पापिन के, असमंजस जिय जनिहैं । देखि खलल अधिकार प्रभूसों मेरी भूरि भलाई भनिहैं ॥२॥ हँसि करिहैं परतीति भगत की, भगत-सिरोमनि मनिहैं । ज्यौं त्यौं तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं ॥३॥ शब्दार्थ—तऊ = तो भी । अनिहैं = लावेंगे । पुंज = समूह । खलल = विघ्न । भनिहैं = कहेंगे । मनिहैं = मानेंगे । भावार्थ—यदि यमराज सब काम छोड़कर यही विचार (केवल मेरे पापों- का लेखा लगाना ही) अपने दिलमें लावेंगे, तो भी वह मेरे पापों और दुर्गुणों- को न गिन सकेंगे ॥१॥ (उस दशामें) पापियोंके दलके दल भाग खड़े होंगे, और तब यमराज अपने दिलमें उस समयका असमंजस समझेंगे । फिर तो वह अपने अधिकारमें विघ्न पड़ते देखकर भगवान्‌से मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे ॥२॥ उनके (मुखसे प्रशंसा सुनकर) आप भी हँसकर मुझ भक्तका विश्वास करेंगे और मुझे भक्तशिरोमणि मान लेंगे । हे कोशलेश ! आपको जैसे-तैसे इस तुलसीदासको अपनाना ही पड़ेगा ॥३॥ विशेष १—'खलल'—यह शब्द फारसीका है । ( ९६ ) जौ पै जिय धरिहौ अवगुन जनके । तौ क्यौं कटत सुकृत नखते मो पै, विपुल बूंद अघ-बनके ॥१॥

विनय-पत्रिका १८३ कहिहै कौन कलुष मेरे कृत, करम बचन अरु मनके हारहिं अमित सेष सारद श्रुति, गिनत एक एक छनके ॥२॥ जो चित चढ़ै नाम-महिमा निज, गुनगन पावन पनके। तो तुलसिहिं तारिहौ विप्र ज्यौं दसन तोरि जमगनके ॥३॥ शब्दार्थ—कलुष = पाप । पावन = पवित्र । पन = प्रतिज्ञा । विप्र = ब्राह्मण (अजामिल) । भावार्थ—हे स्वामी ! यदि आप सेवकके अवगुणोंको मनमें लावेंगे, तो पुण्यरूपी नखसे पापरूपी बड़े-बड़े वनोंके समूह मुझसे कैसे कटेंगे (तात्पर्य यह कि मेरे थोड़े-से पुण्यसे बड़े-बड़े पाप दूर नहीं हो सकते) ॥१॥ मेरे मन, वचन और कर्मसे किये हुए पापोंको कौन कह सकेगा ? मेरे एक एक क्षणके पापोंकी गिनती करनेमें अनेक शेष, सरस्वती और वेद हार जायँगे ॥२॥ यदि आपके चित्तपर अपने नामकी महिमा और (पतितोंको) उद्धार करनेके प्रणकी गुणावली चढ़े, तो जैसे आपने यमदूतोंके दाँत तोड़कर ब्राह्मण-(अजामिल) को तार दिया था, वैसे ही तुलसीको भी तार दीजियेगा ॥३॥ ( ९७ ) जौ पै हरि जनके अवगुन गहते । तौ सुरपति कुरुराज बालिसों, कत हठि बैर बिसहते ॥१॥ जौ जप जाग जोग ब्रत बरजित, केवल प्रेम न चहते । तौ कत सुर मुनिवर बिहाय ब्रज, गोप-गेह बसि रहते ॥२॥ जौ जहँ-तहँ प्रन राखि भगत को, भजन प्रभाउ न कहते । तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भाँति निबहते ॥३॥ जौ सुतहित लिय नाम अजामिल के अघ अमित न दहते । तौ जमभट साँसति-हर हमसे वृषभ खोजि खोजि नहते ॥४॥ जौ जग-विदित पतित-पावन, अति बाँकुर विरद न वहते । तौ बहु कलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न लहते ॥५॥ शब्दार्थ—कत = क्यों । बिसहते = मोल लेते । बिहाय = छोड़कर । वृषभ = बैल । नहते = नाथते, जोतते । विरद = बाना । बाँकुर = बाँका, टेढ़ा । लहते = पाते ।

१८४ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप अपने भक्तोंके दुर्गुणोंपर ध्यान देते, तो इन्द्र, दुर्योधन और बालिसे क्यों हठपूर्वक वैर मोल लेते ? ॥१॥ यदि आप जप, यज्ञ, योग, व्रत आदि छोड़कर केवल प्रेम ही न चाहते, तो आप देवता और श्रेष्ठ मुनियोंको छोड़कर व्रजके गोपोंके घरमें क्यों निवास करते ? ॥२॥ यदि आप जहाँ-तहाँ भक्तोंकी प्रतिष्ठा रखकर भजनका प्रभाव न कहते, तो हम सरीखे मूढ़ोंका इस कठिन कलिकालके कर्म-मार्गमें किस प्रकार निर्वाह होता ? ॥३॥ पुत्रके निमित्त आपका नाम (नारायण) लेनेवाले अजामिलके अगणित पापोंको यदि आपने भस्म न किया होता, तो यमदूत हम जैसे बैलोंको यातनाके हलमें खोज-खोजकर जोतते ॥४॥ यदि आप जगत्-प्रसिद्ध पतित-पावन रूपका अत्यन्त बाँका बाना न धारण किये होते, तो अनन्त कल्पोंतक कुटिल तुलसी-सरीखे लोगोंको स्वप्नमें भी उत्तम गति न प्राप्त होती ॥५॥ विशेष १—'सुरपांत'—एक बार नारदजी स्वर्गसे पारिजातका पुष्प लाकर रुक्मिणीको दे गये । कृष्ण भगवान्‌की दूसरी रानी सत्यभामाने उसे लेनेके लिए मान किया । भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रसे युद्ध करके पारिजातका वृक्ष ही उखाड़ लाये । यद्यपि सत्यभामाका मान करना अनुचित था, पर भगवान्‌ने उसकी भक्तिवश उसके मान करने पर ध्यान न देकर इन्द्रसे वैर किया । २—'बिसहते'—श्री वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है 'ठानते' 'कर बैठते'; पर वास्तवमें इसका अर्थ है 'मोल लेना' । बोल-चालकी भाषामें अब भी इस शब्दका प्रयोग होता है । कहा भी है :— बूढ़ा बदई बिसाहिये, झीना कापड़ लेय । अपने करै बिसहनी, दैवहिं दूषन देय ॥ अथवा:— 'तेरे बिसाहे बिसाहुत औरनि और बिसाहिकै बेचनहारे । ३—'कुरुराज'—पाँचों पांडवोंका द्रौपदीको रख लेना, जुआ खेलना, जुएम द्रौपदीको हार जाना आदि उनके प्रत्यक्ष दोष थे, पर उनकी भक्ति देखकर भगवान् श्रीकृष्णने उनके दोषोंपर ध्यान नहीं दिया और उनकी ओरसे दुर्योधन- के साथ वैर किया ।

विनय-पत्रिका १८५ ४—'बालि'—सुग्रीवका पक्ष बिलकुल निर्दोष न होनेपर भी भगवान्‌ने उसकी ओरसे बालिको मारा था और सुग्रीवको राजगद्दीपर बिठाया था। [ ९८ ] ऐसी हरि करत दास पर प्रीति। निज प्रभुता बिसारि जनके बस, होत सदा यह रीति ॥१॥ जिन बाँधे सुर-असुर, नाग-नर, प्रबल करम की डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सकत न छोरी ॥२॥ जाकी मायावस विरंचि सिव, नाचत पार न पायो। करतल ताल बजाइ ग्वाल-जुवतिन्ह सोइ नाच नचायो ॥३॥ विस्वंभर, श्रीपति, त्रिभुवनपति, वेद-विदित यह लीख। बलिसों कछु न चली प्रभुता वरु है द्विज माँगी भीख ॥४॥ जाको नाम लिये छूटत भव-जनम-मरन दुख-भारी। अंबरीष हित लागि कृपानिधि, सोइ जनमे दस बार ॥५॥ जोग-बिराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि खोजत मुनि ग्यानी। वानर-भालु चपल पसु पामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥६॥ लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आग्याकारी। तुलसिदास प्रभु उग्रसेन के द्वार बेंत करधारी ॥७॥ शब्दार्थ-अविच्छिन्न = अखंड। छोरी = खोलन। लीख = लीक, रेखा। रति = प्रीति। भावार्थ—भगवान् अपने सेवकपर इतना प्रेम करते हैं कि अपनी प्रभुता भूलकर भक्तके अधीन हो जाते हैं। उनकी यह रीति सनातन है ॥१॥ जिस परमात्माने देवता, दैत्य, नाग और मनुष्योंको मजबूत कर्मकी डोरीसे बाँध रखा है, उस अविच्छिन्न परब्रह्मको यशोदाजीने जबर्दस्ती बाँध दिया और उसे वह खोल न सके ॥२॥ जिसकी मायाके वश होकर ब्रह्मा और शिवजी भी नाचते- नाचते पार नहीं पा सके, उसे ग्वाल-युवतियोंने हथेलीसे ताल बजा-बजाकर नाच नचाया ॥३॥ यह लीक वेदोंमें प्रसिद्ध है कि भगवान् विश्वम्भर (संसारका भरण-पोषण करनेवाले) हैं, श्रीपति (लक्ष्मीजीके स्वामी) हैं और तीनों लोकोंके नाथ हैं, किन्तु फिर भी भक्त राजा बलिके आगे उनकी कुछ भी प्रभुता

१८६ विनय-पत्रिका न चली, बल्कि ब्राह्मण बनकर उन्होंने उससे भीख माँगी ॥४॥ जिसका केवल नाम लेनेसे ही संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंके भारसे छुटकारा हो जाता है, उसी कृपासिन्धुने भक्त अम्बरीषके लिए दस वार अवतार धारण किया ॥५॥ जिसे ज्ञानी मुनि योग, विराग, ध्यान, जप और तप करके खोजते हैं, उस जगन्नाथने बानर, भालू आदि नीच और चंचल पशुओंसे प्रीति की ॥६॥ लोकपाल, यमराज, काल, पवन, सूर्य, चन्द्रमा आदि जिसके आज्ञाकारी हैं, हे तुलसीदास, वही प्रभु, (प्रेमवश) उग्रसेनके द्वारपर हाथमें बेंत लिये खड़े हैं ॥७॥ विशेष १—‘बलिसों······भीख’—राजा बलि भक्त था, इसलिए आवश्यकता पड़नेपर भगवान्‌ने प्रभुत्वसे काम न लेकर वामनरूप धारण करके उससे भीख ही माँगी। यदि वह चाहते तो भीख न माँगकर जबर्दस्ती उसका राज्य छीन लेते; पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। २—‘अम्बरीष’—महाराज अम्बरीष परमभक्त वैष्णव और एकादशी व्रतके अनन्य व्रती थे। एक बार द्वादशीके दिन उनके यहाँ दुर्वासा ऋषि आये। राजाने उन्हें निमन्त्रण दिया था। हर द्वादशीको वह बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पारण करते थे। दुर्वासा ऋषिने स्नान करने जाकर बड़ी देर लगायी। उस दिन कुछ ही देरके बाद त्रयोदशी थी। द्वादशीमें ही पारण कर लेनेका शास्त्रीय विधान है। विद्वान् ब्राह्मणोंकी आज्ञासे इस दोषके परिहारके लिए राजाने तुलसी-दल-मिश्रित भगवान्‌का चरणोदक ले लिया। इतनेमें दुर्वासा ऋषि स्नान करके आ गये। राजाके पारण करनेका समाचार पाकर वह बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने राजाको शाप दिया कि ‘तुझे जो इसी जन्ममें मुक्त हो जाने- का घमण्ड है, वह व्यर्थ है। अभी तुझे दस बार और जन्म लेना पड़ेगा।’ यह शाप देनेके बाद उन्होंने कृत्या नामकी राक्षसी भी उत्पन्न की, जो पैदा होते ही अम्बरीषको खा जानेके लिए उनकी ओर दौड़ी। भगवान्‌ने अपने भक्त राजा अम्बरीषकी रक्षाके लिए सुदर्शन चक्रको आज्ञा दी। उसने कृत्याको मारकर दुर्वासा ऋषिका पीछा किया। दुर्वासा ऋषि चक्रके भयसे तीनों लोकोंमें