भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 197

१८६ विनय-पत्रिका न चली, बल्कि ब्राह्मण बनकर उन्होंने उससे भीख माँगी ॥४॥ जिसका केवल नाम लेनेसे ही संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंके भारसे छुटकारा हो जाता है, उसी कृपासिन्धुने भक्त अम्बरीषके लिए दस वार अवतार धारण किया ॥५॥ जिसे ज्ञानी मुनि योग, विराग, ध्यान, जप और तप करके खोजते हैं, उस जगन्नाथने बानर, भालू आदि नीच और चंचल पशुओंसे प्रीति की ॥६॥ लोकपाल, यमराज, काल, पवन, सूर्य, चन्द्रमा आदि जिसके आज्ञाकारी हैं, हे तुलसीदास, वही प्रभु, (प्रेमवश) उग्रसेनके द्वारपर हाथमें बेंत लिये खड़े हैं ॥७॥ विशेष १—‘बलिसों······भीख’—राजा बलि भक्त था, इसलिए आवश्यकता पड़नेपर भगवान्‌ने प्रभुत्वसे काम न लेकर वामनरूप धारण करके उससे भीख ही माँगी। यदि वह चाहते तो भीख न माँगकर जबर्दस्ती उसका राज्य छीन लेते; पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। २—‘अम्बरीष’—महाराज अम्बरीष परमभक्त वैष्णव और एकादशी व्रतके अनन्य व्रती थे। एक बार द्वादशीके दिन उनके यहाँ दुर्वासा ऋषि आये। राजाने उन्हें निमन्त्रण दिया था। हर द्वादशीको वह बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पारण करते थे। दुर्वासा ऋषिने स्नान करने जाकर बड़ी देर लगायी। उस दिन कुछ ही देरके बाद त्रयोदशी थी। द्वादशीमें ही पारण कर लेनेका शास्त्रीय विधान है। विद्वान् ब्राह्मणोंकी आज्ञासे इस दोषके परिहारके लिए राजाने तुलसी-दल-मिश्रित भगवान्‌का चरणोदक ले लिया। इतनेमें दुर्वासा ऋषि स्नान करके आ गये। राजाके पारण करनेका समाचार पाकर वह बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने राजाको शाप दिया कि ‘तुझे जो इसी जन्ममें मुक्त हो जाने- का घमण्ड है, वह व्यर्थ है। अभी तुझे दस बार और जन्म लेना पड़ेगा।’ यह शाप देनेके बाद उन्होंने कृत्या नामकी राक्षसी भी उत्पन्न की, जो पैदा होते ही अम्बरीषको खा जानेके लिए उनकी ओर दौड़ी। भगवान्‌ने अपने भक्त राजा अम्बरीषकी रक्षाके लिए सुदर्शन चक्रको आज्ञा दी। उसने कृत्याको मारकर दुर्वासा ऋषिका पीछा किया। दुर्वासा ऋषि चक्रके भयसे तीनों लोकोंमें