विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 196, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १८५ ४—'बालि'—सुग्रीवका पक्ष बिलकुल निर्दोष न होनेपर भी भगवान्ने उसकी ओरसे बालिको मारा था और सुग्रीवको राजगद्दीपर बिठाया था। [ ९८ ] ऐसी हरि करत दास पर प्रीति। निज प्रभुता बिसारि जनके बस, होत सदा यह रीति ॥१॥ जिन बाँधे सुर-असुर, नाग-नर, प्रबल करम की डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सकत न छोरी ॥२॥ जाकी मायावस विरंचि सिव, नाचत पार न पायो। करतल ताल बजाइ ग्वाल-जुवतिन्ह सोइ नाच नचायो ॥३॥ विस्वंभर, श्रीपति, त्रिभुवनपति, वेद-विदित यह लीख। बलिसों कछु न चली प्रभुता वरु है द्विज माँगी भीख ॥४॥ जाको नाम लिये छूटत भव-जनम-मरन दुख-भारी। अंबरीष हित लागि कृपानिधि, सोइ जनमे दस बार ॥५॥ जोग-बिराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि खोजत मुनि ग्यानी। वानर-भालु चपल पसु पामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥६॥ लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आग्याकारी। तुलसिदास प्रभु उग्रसेन के द्वार बेंत करधारी ॥७॥ शब्दार्थ-अविच्छिन्न = अखंड। छोरी = खोलन। लीख = लीक, रेखा। रति = प्रीति। भावार्थ—भगवान् अपने सेवकपर इतना प्रेम करते हैं कि अपनी प्रभुता भूलकर भक्तके अधीन हो जाते हैं। उनकी यह रीति सनातन है ॥१॥ जिस परमात्माने देवता, दैत्य, नाग और मनुष्योंको मजबूत कर्मकी डोरीसे बाँध रखा है, उस अविच्छिन्न परब्रह्मको यशोदाजीने जबर्दस्ती बाँध दिया और उसे वह खोल न सके ॥२॥ जिसकी मायाके वश होकर ब्रह्मा और शिवजी भी नाचते- नाचते पार नहीं पा सके, उसे ग्वाल-युवतियोंने हथेलीसे ताल बजा-बजाकर नाच नचाया ॥३॥ यह लीक वेदोंमें प्रसिद्ध है कि भगवान् विश्वम्भर (संसारका भरण-पोषण करनेवाले) हैं, श्रीपति (लक्ष्मीजीके स्वामी) हैं और तीनों लोकोंके नाथ हैं, किन्तु फिर भी भक्त राजा बलिके आगे उनकी कुछ भी प्रभुता