भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 195

१८४ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप अपने भक्तोंके दुर्गुणोंपर ध्यान देते, तो इन्द्र, दुर्योधन और बालिसे क्यों हठपूर्वक वैर मोल लेते ? ॥१॥ यदि आप जप, यज्ञ, योग, व्रत आदि छोड़कर केवल प्रेम ही न चाहते, तो आप देवता और श्रेष्ठ मुनियोंको छोड़कर व्रजके गोपोंके घरमें क्यों निवास करते ? ॥२॥ यदि आप जहाँ-तहाँ भक्तोंकी प्रतिष्ठा रखकर भजनका प्रभाव न कहते, तो हम सरीखे मूढ़ोंका इस कठिन कलिकालके कर्म-मार्गमें किस प्रकार निर्वाह होता ? ॥३॥ पुत्रके निमित्त आपका नाम (नारायण) लेनेवाले अजामिलके अगणित पापोंको यदि आपने भस्म न किया होता, तो यमदूत हम जैसे बैलोंको यातनाके हलमें खोज-खोजकर जोतते ॥४॥ यदि आप जगत्-प्रसिद्ध पतित-पावन रूपका अत्यन्त बाँका बाना न धारण किये होते, तो अनन्त कल्पोंतक कुटिल तुलसी-सरीखे लोगोंको स्वप्नमें भी उत्तम गति न प्राप्त होती ॥५॥ विशेष १—'सुरपांत'—एक बार नारदजी स्वर्गसे पारिजातका पुष्प लाकर रुक्मिणीको दे गये । कृष्ण भगवान्‌की दूसरी रानी सत्यभामाने उसे लेनेके लिए मान किया । भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रसे युद्ध करके पारिजातका वृक्ष ही उखाड़ लाये । यद्यपि सत्यभामाका मान करना अनुचित था, पर भगवान्‌ने उसकी भक्तिवश उसके मान करने पर ध्यान न देकर इन्द्रसे वैर किया । २—'बिसहते'—श्री वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है 'ठानते' 'कर बैठते'; पर वास्तवमें इसका अर्थ है 'मोल लेना' । बोल-चालकी भाषामें अब भी इस शब्दका प्रयोग होता है । कहा भी है :— बूढ़ा बदई बिसाहिये, झीना कापड़ लेय । अपने करै बिसहनी, दैवहिं दूषन देय ॥ अथवा:— 'तेरे बिसाहे बिसाहुत औरनि और बिसाहिकै बेचनहारे । ३—'कुरुराज'—पाँचों पांडवोंका द्रौपदीको रख लेना, जुआ खेलना, जुएम द्रौपदीको हार जाना आदि उनके प्रत्यक्ष दोष थे, पर उनकी भक्ति देखकर भगवान् श्रीकृष्णने उनके दोषोंपर ध्यान नहीं दिया और उनकी ओरसे दुर्योधन- के साथ वैर किया ।