विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १८३ कहिहै कौन कलुष मेरे कृत, करम बचन अरु मनके हारहिं अमित सेष सारद श्रुति, गिनत एक एक छनके ॥२॥ जो चित चढ़ै नाम-महिमा निज, गुनगन पावन पनके। तो तुलसिहिं तारिहौ विप्र ज्यौं दसन तोरि जमगनके ॥३॥ शब्दार्थ—कलुष = पाप । पावन = पवित्र । पन = प्रतिज्ञा । विप्र = ब्राह्मण (अजामिल) । भावार्थ—हे स्वामी ! यदि आप सेवकके अवगुणोंको मनमें लावेंगे, तो पुण्यरूपी नखसे पापरूपी बड़े-बड़े वनोंके समूह मुझसे कैसे कटेंगे (तात्पर्य यह कि मेरे थोड़े-से पुण्यसे बड़े-बड़े पाप दूर नहीं हो सकते) ॥१॥ मेरे मन, वचन और कर्मसे किये हुए पापोंको कौन कह सकेगा ? मेरे एक एक क्षणके पापोंकी गिनती करनेमें अनेक शेष, सरस्वती और वेद हार जायँगे ॥२॥ यदि आपके चित्तपर अपने नामकी महिमा और (पतितोंको) उद्धार करनेके प्रणकी गुणावली चढ़े, तो जैसे आपने यमदूतोंके दाँत तोड़कर ब्राह्मण-(अजामिल) को तार दिया था, वैसे ही तुलसीको भी तार दीजियेगा ॥३॥ ( ९७ ) जौ पै हरि जनके अवगुन गहते । तौ सुरपति कुरुराज बालिसों, कत हठि बैर बिसहते ॥१॥ जौ जप जाग जोग ब्रत बरजित, केवल प्रेम न चहते । तौ कत सुर मुनिवर बिहाय ब्रज, गोप-गेह बसि रहते ॥२॥ जौ जहँ-तहँ प्रन राखि भगत को, भजन प्रभाउ न कहते । तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भाँति निबहते ॥३॥ जौ सुतहित लिय नाम अजामिल के अघ अमित न दहते । तौ जमभट साँसति-हर हमसे वृषभ खोजि खोजि नहते ॥४॥ जौ जग-विदित पतित-पावन, अति बाँकुर विरद न वहते । तौ बहु कलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न लहते ॥५॥ शब्दार्थ—कत = क्यों । बिसहते = मोल लेते । बिहाय = छोड़कर । वृषभ = बैल । नहते = नाथते, जोतते । विरद = बाना । बाँकुर = बाँका, टेढ़ा । लहते = पाते ।