विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ विनय-पत्रिका उस समय मित्रवर 'निराला'जी भी मौजूद थे । ऊपरका अर्थ सुनकर सब लोग खूब हँसे । ४-'तौ हरि···तजि गारो'—इस पंक्तिका भी वियोगी हरि आदि सब टीकाकारोंने बड़ा ही ऊटपटाँग अर्थ किया है । विस्तार-भयसे उसे यहाँ उद्धृत करना अनावश्यक है । ९५ ) तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं । जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं ॥१॥ चलिहैं छूटि पुंज पापिन के, असमंजस जिय जनिहैं । देखि खलल अधिकार प्रभूसों मेरी भूरि भलाई भनिहैं ॥२॥ हँसि करिहैं परतीति भगत की, भगत-सिरोमनि मनिहैं । ज्यौं त्यौं तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं ॥३॥ शब्दार्थ—तऊ = तो भी । अनिहैं = लावेंगे । पुंज = समूह । खलल = विघ्न । भनिहैं = कहेंगे । मनिहैं = मानेंगे । भावार्थ—यदि यमराज सब काम छोड़कर यही विचार (केवल मेरे पापों- का लेखा लगाना ही) अपने दिलमें लावेंगे, तो भी वह मेरे पापों और दुर्गुणों- को न गिन सकेंगे ॥१॥ (उस दशामें) पापियोंके दलके दल भाग खड़े होंगे, और तब यमराज अपने दिलमें उस समयका असमंजस समझेंगे । फिर तो वह अपने अधिकारमें विघ्न पड़ते देखकर भगवान्से मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे ॥२॥ उनके (मुखसे प्रशंसा सुनकर) आप भी हँसकर मुझ भक्तका विश्वास करेंगे और मुझे भक्तशिरोमणि मान लेंगे । हे कोशलेश ! आपको जैसे-तैसे इस तुलसीदासको अपनाना ही पड़ेगा ॥३॥ विशेष १—'खलल'—यह शब्द फारसीका है । ( ९६ ) जौ पै जिय धरिहौ अवगुन जनके । तौ क्यौं कटत सुकृत नखते मो पै, विपुल बूंद अघ-बनके ॥१॥