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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 192

विनय-पत्रिका १८१ दर्शन की प्रतीक्षा करती, तो मेरा उद्धार हो जाता। बस, उसी दिनसे उसका जीवन-स्रोत बदल गया और भगवान्‌की कृपासे उसका उद्धार हो गया। २—'व्याध'—इसका अर्थ कुछ टीकाकारोंने वाल्मीकि किया है और कुछ लोगोंने लिखा है कि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णके पैरमें तीर मारनेवाले 'जरा' नामक बहेलियेसे तात्पर्य है। दोनोंकी कथाएँ इस प्रकार हैं:— वाल्मीकि—पहले बहेलिया थे। इनका नाम रत्नाकर था। यह जंगलमें पशुपक्षियोंका शिकार करनेके सिवा बटोहियोंपर डाका डालती थे। पीछे नारदके उपदेशसे जीव-हिंसा छोड़कर उसके विपरीत राम-नाम जपने लगे और मुक्त हो गये। कहा है:— उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि भे ब्रह्म समाना। 'जरा'—भगवान् श्रीकृष्ण एक वृक्षके नीचे पैरके ऊपर दूसरा पैर रखकर लेटे हुए थे। एक बहेलियेने दूरसे भगवान्‌के पैरका तलवा देखकर अनुमान किया कि किसी हरिनकी लाल जिह्वा है। फिर क्या था, उसने लक्ष्य ठीक करके तीर मार दिया। पीछे जब वह भगवान्‌के पास आया, तब बहुत पश्चात्ताप करने लगा। अन्तमें परमात्माका साक्षात् दर्शन होनेके कारण वह व्याध मुक्त हो गया। (कहते हैं कि वह व्याध अंगदका अवतार था। रामावतारमें उसे वर मिला था कि द्वापरमें तुम पितृ-ऋण चुका सकोगे।) किन्तु यहाँ व्याधका अर्थ न तो वाल्मीकि ही है और न 'जरा' नामक व्याध ही। यहाँपर व्याध आया है, 'धर्म' नामक व्याधके लिए। धर्म नामक व्याधकी कथा श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रसिद्ध है। कथा बहुत बड़ी होनेके कारण यहाँ नहीं लिखी जा रही है। इसकी कथा महाभारतके वनपर्वमें भी है, किन्तु उसका जीवन वृत्तान्त तो अत्यन्त संक्षेपमें है—उपदेश ही अधिक है। पुराणोंमें और भी कई व्याधोंकी भिन्न-भिन्न प्रकार की कथाएँ पायी जाती हैं। अतः 'व्याध' शब्दसे यदि व्यक्ति-विशेषका अर्थ न निकाल कर व्याध ही अर्थ किया जाय तो भी कोई हानि नहीं। ३—'परसत पनवारो फारो'—एक सज्जनने स्वर्गीय जयशंकर 'प्रसाद'जी- के यहाँ इस प्रकार अर्थ किया था—'पानीमें उबाला हुआ फारा परोस रहे हैं?'