विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० विनय-पत्रिका नाहिंन नरक परत मो कहँ डर, जद्यपि हौं अति हारो। यह बढ़ि त्रास दास तुलसी प्रभु, नामहु पाप न जारो ॥६॥ शब्दार्थ—मृधा = मिथ्या । खग = पक्षी (जटायु) । गनिका = वेश्या (पिंगला) । व्याध = बहेलिया । पनवारो = पत्तल । निदेस = निर्देश, आज्ञा । गारो = प्रतिष्ठा । अछत = रहते हुए भी । चारो = वश । भावार्थ—हे हरे ! आप मुझे किसलिए भुला रहे हैं ? हे नाथ ! आप अपनी महिमाको और मेरे पापोंको जानते हैं, फिर भी आप मुझे नहीं सँभाल रहे हैं ! ॥१॥ चारों वेदोंका कहना है कि आप पतितोंको पवित्र करनेवाले, दीनोंके हितू और अशरणको शरण देनेवाले हैं । तो क्या मैं नीच, भयभीत और गरीब नहीं हूँ ? अथवा वेदोंने ही मिथ्या बात कही है ? ॥२॥ जहाँ पक्षी (जटायु), गणिका (पिंगला), गजेन्द्र और ('धर्म' नामक) व्याधकी पंक्ति है, वहीं आपने मुझे भी बिठाया है । किन्तु हे कृपानिधान ! अब आप किस लज्जावश मेरे सामने परोसी हुई पत्तलको फाड़ रहे हैं ? अभिप्राय यह है कि मैं अपनेको पापियोंकी पाँतिमें बैठकर भोजन करनेका अधिकारी समझता था अर्थात् मैं वही स्थान प्राप्त करनेका हकदार था जो स्थान गिद्ध, गणिका, व्याध आदि प्राप्त कर चुके हैं ॥३॥ यदि कलिकाल आपसे अधिक बलवान् होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हे हरे ! मैं सब प्रतिष्ठा छोड़कर (अर्थात् बदनामी सहते हुए भी) उसके क्रोध करनेपर भी उसका भरोसा रखकर तथा उसके दोषोंको गुण समझकर उसीको भजता ॥४॥ किन्तु आपका तो ऐसा प्रभाव है कि आप मच्छरको ब्रह्मा और ब्रह्माको मच्छरके समान बना देते हैं । यह सामर्थ्य रहते हुए भी जब आप मुझे त्याग रहे हैं, तब हे नाथ ! उसमें मेरा क्या वश है ! ॥५॥ यद्यपि मैं हर तरहसे हार गया हूँ और मुझे नरकमें पड़नेका भी डर नहीं है, किन्तु दास तुलसीको तो अत्यधिक भय यही है कि आपके नामने मेरे पापोंको नहीं जलाया (संसार यही कहेगा) ॥६॥ विशेष १—'गनिका'—जनकपुरमें 'पिंगला' नाम्नी एक वेश्या थी । एक दिन वह बड़ी राततक अपने प्रेमीकी प्रतीक्षा में बैठी रही, किन्तु वह न आया । इससे उसे बड़ी ग्लानि हुई । सोचने लगी, यदि मैं इतनी तन्मयताके साथ ईश्वर-