भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

विनय-पत्रिका १७९ २—'वसनपूरि' जब पांडव अपना सर्वस्व, यहाँतक कि द्रौपदीको भी जुएमें हार गये, तब दुर्योधनने दुःशासनके द्वारा महारानी द्रौपदीको पकड़वा मँगाया और भरी सभामें उन्हें नग्न करनेकी आज्ञा दी। दुष्ट दुःशासन द्रौपदीका वस्त्र पकड़कर खींचने लगा, पर सभामें बैठे हुए लोगोंने कुछ नहीं कहा। अन्तमें अपनेको असहाय समझकर द्रौपदीने दीन भावसे भगवान्‌को पुकारा। तुरन्त ही भगवान्‌ने द्रौपदीकी सहायता की। परिणाम यह हुआ कि दुःशासन साड़ी पकड़कर खींचते-खींचते थक गया, पर साड़ी समाप्त न हुई। ३—'लोभ-ग्राह···खल मार'—के ऊपरकी पंक्तिमें जो 'बहु रिपु' कहा गया है, उसे यहाँ स्पष्ट किया गया है। लोभको ग्राह कहनेका यह आशय है कि जिस प्रकार ग्राह मनुष्यको निगल जाता है, उसी प्रकार लोभ भी मनुष्यके अन्तःकरणको आच्छादित कर लेता है। 'दनुजेस-क्रोध' जैसे हिरण्यकशिपु समय-समयपर वचन और क्रिया द्वारा प्रह्लादको पीड़ा पहुँचाया करता था, उसी प्रकार क्रोध भी समय पाकर मनुष्य-शरीरको जलाता है। इसी प्रकार 'कुरुराज-बन्धु खलमार' कहनेका यह भाव है कि जैसे दुःशासन अन्धा होकर भरी सभामें द्रौपदीकी इज्जत लेना चाहता था, उसी तरह काम भी अन्धा है; कामुक पुरुषोंको कुछ नहीं सूझता। ( ९४ ) काहे ते हरि मोहिं बिसारो। जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो ॥१॥ पतित-पुनीत, दीन-हित, असरन-सरन कहत श्रुति चारो। हौं नहिं अधम, सभीत, दीन ? किधौं वेदन मृषा पुकारो ? ॥२॥ खग-गनिका-गज-ब्याध-पाँति तहँ, जहाँ हौं हूँ बैठारो। अब केहि लाज कृपानिधान ! परसत पनवारो फारो ॥३॥ जो कलिकाल-प्रबल अतिहोइतो, तुव निदेस तें न्यारो। तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥४॥ मसक बिरंचि, बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो। यह सामरथ अछत मोहिं त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥५॥