भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 189, कुल 475 में से

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पृष्ठ 189

१७८ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! आपने अपनी उस कृपाको न-जाने कहाँ भुला दिया। (किस करुणाको ?) जिस करुणाके कारण आप दीनोंका दुःख कानसे सुनते ही अपना धाम (निवास-स्थान) छोड़कर दौड़ा करते हैं ॥१॥ जब गजेन्द्र- ने अपना बल विचारकर दिलमें हार मान ली और आपके चरणोंमें चित्त लगाया, तब आपने उसकी आर्त्तवाणी सुनते ही गरुड़को छोड़कर (पैदल ही) चल देनेमें देर नहीं की ॥२॥ आपने हिरण्यकशिपुके भयसे रातदिन भीत रहनेवाले प्रह्लादकी प्रतिज्ञा रखी और अतुलित बलशाली सिंह और मनुष्य (नृसिंह) का शरीर धारण करके उस (हिरण्यकशिपु) दैत्यको मारा, वेद इसका साक्षी है ॥३॥ राज-सभामें सब राजाओंको देखकर 'नर'के अवतार अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने जब कहा कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये, तब हे दैत्योंके शत्रु ! आपने बड़ी कृपा करके वस्त्रोंका ढेर लगा दिया और शत्रुओं (दुर्योधन, दुःशासन आदि) का घमंड दूर कर दिया ॥४॥ हे रघुवीरजी ! आपने केवल एक-एक शत्रुसे संत्रस्त भक्तोंकी रक्षा की है, किन्तु यहाँ तो मुझे (एक नहीं) बहुत-से शत्रु (लोभ, क्रोध, काम आदि) असह्य कष्ट दे रहे हैं; फिर आप मेरी सांसारिक यातना क्यों नहीं दूर करते ? ॥५॥ लोभरूपी ग्राह (मँगर), क्रोध रूपी दैत्यराज (हिरण्यकशिपु) और दुष्ट कामदेवरूपी दुर्योधनका भाई (दुःशासन) है। हे प्रभो ! तुलसीदासका यह दारुण दुःख दूर कीजिये ! हे रामजी ! आप उदार हैं (मुझपर उदारता दिखलाइये) ! ॥६॥ विशेष १—'प्रह्लाद-प्रतिज्ञा राखी'—हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लादको रामका नाम नहीं लेने देता था, किन्तु भक्त प्रह्लाद रामका नाम नहीं छोड़ते थे । जब वह हर तरहसे मना करके हार गया, तब उन्हें एक खम्भेसे बाँधकर मारनेके लिए तैयार हुआ । उसने कहा, —'कहाँ है तेरा राम, बुला उसे ।' भक्त प्रह्लादने कहा,—'मोहिमें तोहिमें खङ्ग-खम्भमें, घट घट व्यापिन राम ।' इतना सुनते ही हिरण्यकशिपुने क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिए तलवार सँभाली । तबतक भक्त-वत्सल भगवान् नृसिंहरूपमें खम्भा फाड़कर प्रकट हुए और देखते ही देखते उसे चीड़-फाड़कर प्रह्लादके प्रणकी रक्षा की ।