विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें_विनय-पत्रिका १७७ को छोड़कर बारम्बार फेन (विषय-सुख) पकड़ता रहा ॥३॥ जैसे अत्यन्त भूखा कुत्ता पुरानी हड्डीको भरमुँह पकड़ता है और अपने ही तालूका खून पी-कर मनमें सन्तोष धारण करता है (यह नहीं समझता कि यह खून तो मेरे ही शरीरका है, उसी प्रकार मनुष्य भी विषयोंमें अपने ही बल-वीर्यका नाश करके प्रसन्न होता है) ॥४॥ मैं अत्यन्त कठिन संसार-सर्पसे ग्रसित होनेके कारण बहुत डर गया हूँ और गरुड़-नाथ-(भगवान्) को भूलकर मेढककी शरणमें जाकर निर्भय होना चाहता हूँ ॥५॥ जलमें रहनेवाले जीव जालमें सिमिट-सिमिटकर एक जगह एकत्र हो जाते हैं और लालचवश एक-दूसरेको खाते हैं, — अपना नाश नहीं देखते (ठीक वही हाल मेरा है) ॥६॥ यदि सरस्वती अनेक युगोंतक मेरे पापोंका लेखा लगाती रहें, तो भी पार नहीं पा सकतीं। किन्तु तुलसीदासके जीमें तो यह विश्वास या भरोसा है कि प्रभु (श्रीराम) जी पतितोंका उद्धार करनेवाले हैं (वह मेरा उद्धार अवश्य करेंगे) ॥७॥ [ ९३ ] कृपा सो धौं कहाँ बिसारी राम। जेहि करुना सुनि श्रवन-दीन-दुख, धावत हौ तजि धाम ॥१॥ नागराज निज बल विचारि हिय, हारि चरन चित दीन्हौं। आरत गिरा सुनत खगपति तजि, चलत विलंब न कीन्हौं ॥२॥ दितिसुत त्रास-त्रसित निसिदिन प्रहलाद-प्रतिग्या राखी। अतुलित बल मृगराज-मनुज-तनु दनुज हत्यो श्रुति साखी ॥३॥ भूप-सदसि सब नृप विलोकि प्रभु, राखु कह्यो नर-नारी। वसन पूरि, अरि दरप दूरि करि, भूरि कृपा दनुजारी ॥४॥ एक एक रिपुतें त्रासित जन, तुम राखे रघुवीर। अब मोहिं देत दुसह दुख बहु रिपु कस न हरहु भव-पीर ॥५॥ लोभ-ग्राह, दनुजेस-क्रोध कुरुराज-बंधु खल मार। तुलसिदास प्रभु यह दारुन दुख भंजहु राम उदार ॥६॥ शब्दार्थ—धौं = न जानें। श्रवन = कान। नागराज = गजेन्द्र। दितिसुत = हिरण्य- कशिपु। सदसि = सभामें। राखु = रक्षा करो। नर-नारी = अर्जुनकी स्त्री द्रौपदी। मार = कामदेव।