विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ विनय-पत्रिका तो केवल इतना ही लिखना विवक्षित है कि जब अविद्या, प्रतिबिम्बरूप चिदा- भास और उसका अधिष्ठान कूटस्थ इन तीनोंका मेल होता है, तब 'जीव' नाम पड़ता है।—यह सिद्धान्त आभासवादका है। [ ९२ ] माधव जू, मोसम मंद न कोऊ । जद्यपि मीन-पतंग हीन मति, मोहिं नहिं पूजैं ओऊ ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-वस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो । देखत विपति विषय न तजत हौं, तातें अधिक अयान्यो ॥२॥ महा मोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो । श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥३॥ ‘अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति, ज्यों भरि मुख पकरै । निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥४॥ परम कठिन भव व्याल ग्रसित हौं, त्रसित भयो अति भारी । चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ विसारी ॥५॥ जलचर-वृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा । एकहि एक खात लालच-वस नहिं देखत निज नासा ॥६॥ मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावैं । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु, यह भरोस जिय आवै ॥७॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। पूजैं = पूरा होना, बराबरी करना। वस्य = अधीन। पावक = अग्नि, दीपक। लोह = लोहेकी कँटिया। अयान्यो = मूर्ख। अस्थि = हड्डी। भेक = मेढक। खगपति = गरुड़। सारद = सरस्वती। भावार्थ—हे माधवजी! मुझ-सा मूर्ख कोई नहीं है। यद्यपि मछली और पतंग बुद्धिहीन हैं, पर वे भी मेरी बराबरी नहीं कर सकते ॥१॥ पतंगने तो सुन्दर रूपके वशमें होकर (दीपकको) आग नहीं समझा और मछलीने आहारके वशमें होकर लोहेके काँटेको काँटा नहीं जाना; किन्तु मैं विपत्तियोंको देखता हुआ भी विषयोंको नहीं छोड़ रहा हूँ, इससे मैं (मछली और पतंगसे) अधिक मूर्ख हूँ॥२॥ महामोह-रूपी अपार नदीमें सदा बहता फिरा, भगवान्के चरण-कमलरूपी नौका-