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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

१७८ विनय-पत्रिका तो केवल इतना ही लिखना विवक्षित है कि जब अविद्या, प्रतिबिम्बरूप चिदा- भास और उसका अधिष्ठान कूटस्थ इन तीनोंका मेल होता है, तब 'जीव' नाम पड़ता है।—यह सिद्धान्त आभासवादका है। [ ९२ ] माधव जू, मोसम मंद न कोऊ । जद्यपि मीन-पतंग हीन मति, मोहिं नहिं पूजैं ओऊ ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-वस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो । देखत विपति विषय न तजत हौं, तातें अधिक अयान्यो ॥२॥ महा मोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो । श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥३॥ ‘अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति, ज्यों भरि मुख पकरै । निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥४॥ परम कठिन भव व्याल ग्रसित हौं, त्रसित भयो अति भारी । चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ विसारी ॥५॥ जलचर-वृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा । एकहि एक खात लालच-वस नहिं देखत निज नासा ॥६॥ मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावैं । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु, यह भरोस जिय आवै ॥७॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। पूजैं = पूरा होना, बराबरी करना। वस्य = अधीन। पावक = अग्नि, दीपक। लोह = लोहेकी कँटिया। अयान्यो = मूर्ख। अस्थि = हड्डी। भेक = मेढक। खगपति = गरुड़। सारद = सरस्वती। भावार्थ—हे माधवजी! मुझ-सा मूर्ख कोई नहीं है। यद्यपि मछली और पतंग बुद्धिहीन हैं, पर वे भी मेरी बराबरी नहीं कर सकते ॥१॥ पतंगने तो सुन्दर रूपके वशमें होकर (दीपकको) आग नहीं समझा और मछलीने आहारके वशमें होकर लोहेके काँटेको काँटा नहीं जाना; किन्तु मैं विपत्तियोंको देखता हुआ भी विषयोंको नहीं छोड़ रहा हूँ, इससे मैं (मछली और पतंगसे) अधिक मूर्ख हूँ॥२॥ महामोह-रूपी अपार नदीमें सदा बहता फिरा, भगवान्‌के चरण-कमलरूपी नौका-

_विनय-पत्रिका १७७ को छोड़कर बारम्बार फेन (विषय-सुख) पकड़ता रहा ॥३॥ जैसे अत्यन्त भूखा कुत्ता पुरानी हड्डीको भरमुँह पकड़ता है और अपने ही तालूका खून पी-कर मनमें सन्तोष धारण करता है (यह नहीं समझता कि यह खून तो मेरे ही शरीरका है, उसी प्रकार मनुष्य भी विषयोंमें अपने ही बल-वीर्यका नाश करके प्रसन्न होता है) ॥४॥ मैं अत्यन्त कठिन संसार-सर्पसे ग्रसित होनेके कारण बहुत डर गया हूँ और गरुड़-नाथ-(भगवान्) को भूलकर मेढककी शरणमें जाकर निर्भय होना चाहता हूँ ॥५॥ जलमें रहनेवाले जीव जालमें सिमिट-सिमिटकर एक जगह एकत्र हो जाते हैं और लालचवश एक-दूसरेको खाते हैं, — अपना नाश नहीं देखते (ठीक वही हाल मेरा है) ॥६॥ यदि सरस्वती अनेक युगोंतक मेरे पापोंका लेखा लगाती रहें, तो भी पार नहीं पा सकतीं। किन्तु तुलसीदासके जीमें तो यह विश्वास या भरोसा है कि प्रभु (श्रीराम) जी पतितोंका उद्धार करनेवाले हैं (वह मेरा उद्धार अवश्य करेंगे) ॥७॥ [ ९३ ] कृपा सो धौं कहाँ बिसारी राम। जेहि करुना सुनि श्रवन-दीन-दुख, धावत हौ तजि धाम ॥१॥ नागराज निज बल विचारि हिय, हारि चरन चित दीन्हौं। आरत गिरा सुनत खगपति तजि, चलत विलंब न कीन्हौं ॥२॥ दितिसुत त्रास-त्रसित निसिदिन प्रहलाद-प्रतिग्या राखी। अतुलित बल मृगराज-मनुज-तनु दनुज हत्यो श्रुति साखी ॥३॥ भूप-सदसि सब नृप विलोकि प्रभु, राखु कह्यो नर-नारी। वसन पूरि, अरि दरप दूरि करि, भूरि कृपा दनुजारी ॥४॥ एक एक रिपुतें त्रासित जन, तुम राखे रघुवीर। अब मोहिं देत दुसह दुख बहु रिपु कस न हरहु भव-पीर ॥५॥ लोभ-ग्राह, दनुजेस-क्रोध कुरुराज-बंधु खल मार। तुलसिदास प्रभु यह दारुन दुख भंजहु राम उदार ॥६॥ शब्दार्थ—धौं = न जानें। श्रवन = कान। नागराज = गजेन्द्र। दितिसुत = हिरण्य- कशिपु। सदसि = सभामें। राखु = रक्षा करो। नर-नारी = अर्जुनकी स्त्री द्रौपदी। मार = कामदेव।

१७८ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! आपने अपनी उस कृपाको न-जाने कहाँ भुला दिया। (किस करुणाको ?) जिस करुणाके कारण आप दीनोंका दुःख कानसे सुनते ही अपना धाम (निवास-स्थान) छोड़कर दौड़ा करते हैं ॥१॥ जब गजेन्द्र- ने अपना बल विचारकर दिलमें हार मान ली और आपके चरणोंमें चित्त लगाया, तब आपने उसकी आर्त्तवाणी सुनते ही गरुड़को छोड़कर (पैदल ही) चल देनेमें देर नहीं की ॥२॥ आपने हिरण्यकशिपुके भयसे रातदिन भीत रहनेवाले प्रह्लादकी प्रतिज्ञा रखी और अतुलित बलशाली सिंह और मनुष्य (नृसिंह) का शरीर धारण करके उस (हिरण्यकशिपु) दैत्यको मारा, वेद इसका साक्षी है ॥३॥ राज-सभामें सब राजाओंको देखकर 'नर'के अवतार अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने जब कहा कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये, तब हे दैत्योंके शत्रु ! आपने बड़ी कृपा करके वस्त्रोंका ढेर लगा दिया और शत्रुओं (दुर्योधन, दुःशासन आदि) का घमंड दूर कर दिया ॥४॥ हे रघुवीरजी ! आपने केवल एक-एक शत्रुसे संत्रस्त भक्तोंकी रक्षा की है, किन्तु यहाँ तो मुझे (एक नहीं) बहुत-से शत्रु (लोभ, क्रोध, काम आदि) असह्य कष्ट दे रहे हैं; फिर आप मेरी सांसारिक यातना क्यों नहीं दूर करते ? ॥५॥ लोभरूपी ग्राह (मँगर), क्रोध रूपी दैत्यराज (हिरण्यकशिपु) और दुष्ट कामदेवरूपी दुर्योधनका भाई (दुःशासन) है। हे प्रभो ! तुलसीदासका यह दारुण दुःख दूर कीजिये ! हे रामजी ! आप उदार हैं (मुझपर उदारता दिखलाइये) ! ॥६॥ विशेष १—'प्रह्लाद-प्रतिज्ञा राखी'—हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लादको रामका नाम नहीं लेने देता था, किन्तु भक्त प्रह्लाद रामका नाम नहीं छोड़ते थे । जब वह हर तरहसे मना करके हार गया, तब उन्हें एक खम्भेसे बाँधकर मारनेके लिए तैयार हुआ । उसने कहा, —'कहाँ है तेरा राम, बुला उसे ।' भक्त प्रह्लादने कहा,—'मोहिमें तोहिमें खङ्ग-खम्भमें, घट घट व्यापिन राम ।' इतना सुनते ही हिरण्यकशिपुने क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिए तलवार सँभाली । तबतक भक्त-वत्सल भगवान् नृसिंहरूपमें खम्भा फाड़कर प्रकट हुए और देखते ही देखते उसे चीड़-फाड़कर प्रह्लादके प्रणकी रक्षा की ।

विनय-पत्रिका १७९ २—'वसनपूरि' जब पांडव अपना सर्वस्व, यहाँतक कि द्रौपदीको भी जुएमें हार गये, तब दुर्योधनने दुःशासनके द्वारा महारानी द्रौपदीको पकड़वा मँगाया और भरी सभामें उन्हें नग्न करनेकी आज्ञा दी। दुष्ट दुःशासन द्रौपदीका वस्त्र पकड़कर खींचने लगा, पर सभामें बैठे हुए लोगोंने कुछ नहीं कहा। अन्तमें अपनेको असहाय समझकर द्रौपदीने दीन भावसे भगवान्‌को पुकारा। तुरन्त ही भगवान्‌ने द्रौपदीकी सहायता की। परिणाम यह हुआ कि दुःशासन साड़ी पकड़कर खींचते-खींचते थक गया, पर साड़ी समाप्त न हुई। ३—'लोभ-ग्राह···खल मार'—के ऊपरकी पंक्तिमें जो 'बहु रिपु' कहा गया है, उसे यहाँ स्पष्ट किया गया है। लोभको ग्राह कहनेका यह आशय है कि जिस प्रकार ग्राह मनुष्यको निगल जाता है, उसी प्रकार लोभ भी मनुष्यके अन्तःकरणको आच्छादित कर लेता है। 'दनुजेस-क्रोध' जैसे हिरण्यकशिपु समय-समयपर वचन और क्रिया द्वारा प्रह्लादको पीड़ा पहुँचाया करता था, उसी प्रकार क्रोध भी समय पाकर मनुष्य-शरीरको जलाता है। इसी प्रकार 'कुरुराज-बन्धु खलमार' कहनेका यह भाव है कि जैसे दुःशासन अन्धा होकर भरी सभामें द्रौपदीकी इज्जत लेना चाहता था, उसी तरह काम भी अन्धा है; कामुक पुरुषोंको कुछ नहीं सूझता। ( ९४ ) काहे ते हरि मोहिं बिसारो। जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो ॥१॥ पतित-पुनीत, दीन-हित, असरन-सरन कहत श्रुति चारो। हौं नहिं अधम, सभीत, दीन ? किधौं वेदन मृषा पुकारो ? ॥२॥ खग-गनिका-गज-ब्याध-पाँति तहँ, जहाँ हौं हूँ बैठारो। अब केहि लाज कृपानिधान ! परसत पनवारो फारो ॥३॥ जो कलिकाल-प्रबल अतिहोइतो, तुव निदेस तें न्यारो। तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥४॥ मसक बिरंचि, बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो। यह सामरथ अछत मोहिं त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥५॥

१८० विनय-पत्रिका नाहिंन नरक परत मो कहँ डर, जद्यपि हौं अति हारो। यह बढ़ि त्रास दास तुलसी प्रभु, नामहु पाप न जारो ॥६॥ शब्दार्थ—मृधा = मिथ्या । खग = पक्षी (जटायु) । गनिका = वेश्या (पिंगला) । व्याध = बहेलिया । पनवारो = पत्तल । निदेस = निर्देश, आज्ञा । गारो = प्रतिष्ठा । अछत = रहते हुए भी । चारो = वश । भावार्थ—हे हरे ! आप मुझे किसलिए भुला रहे हैं ? हे नाथ ! आप अपनी महिमाको और मेरे पापोंको जानते हैं, फिर भी आप मुझे नहीं सँभाल रहे हैं ! ॥१॥ चारों वेदोंका कहना है कि आप पतितोंको पवित्र करनेवाले, दीनोंके हितू और अशरणको शरण देनेवाले हैं । तो क्या मैं नीच, भयभीत और गरीब नहीं हूँ ? अथवा वेदोंने ही मिथ्या बात कही है ? ॥२॥ जहाँ पक्षी (जटायु), गणिका (पिंगला), गजेन्द्र और ('धर्म' नामक) व्याधकी पंक्ति है, वहीं आपने मुझे भी बिठाया है । किन्तु हे कृपानिधान ! अब आप किस लज्जावश मेरे सामने परोसी हुई पत्तलको फाड़ रहे हैं ? अभिप्राय यह है कि मैं अपनेको पापियोंकी पाँतिमें बैठकर भोजन करनेका अधिकारी समझता था अर्थात् मैं वही स्थान प्राप्त करनेका हकदार था जो स्थान गिद्ध, गणिका, व्याध आदि प्राप्त कर चुके हैं ॥३॥ यदि कलिकाल आपसे अधिक बलवान् होता और आपकी आज्ञा न मानता होता, तो हे हरे ! मैं सब प्रतिष्ठा छोड़कर (अर्थात् बदनामी सहते हुए भी) उसके क्रोध करनेपर भी उसका भरोसा रखकर तथा उसके दोषोंको गुण समझकर उसीको भजता ॥४॥ किन्तु आपका तो ऐसा प्रभाव है कि आप मच्छरको ब्रह्मा और ब्रह्माको मच्छरके समान बना देते हैं । यह सामर्थ्य रहते हुए भी जब आप मुझे त्याग रहे हैं, तब हे नाथ ! उसमें मेरा क्या वश है ! ॥५॥ यद्यपि मैं हर तरहसे हार गया हूँ और मुझे नरकमें पड़नेका भी डर नहीं है, किन्तु दास तुलसीको तो अत्यधिक भय यही है कि आपके नामने मेरे पापोंको नहीं जलाया (संसार यही कहेगा) ॥६॥ विशेष १—'गनिका'—जनकपुरमें 'पिंगला' नाम्नी एक वेश्या थी । एक दिन वह बड़ी राततक अपने प्रेमीकी प्रतीक्षा में बैठी रही, किन्तु वह न आया । इससे उसे बड़ी ग्लानि हुई । सोचने लगी, यदि मैं इतनी तन्मयताके साथ ईश्वर-

विनय-पत्रिका १८१ दर्शन की प्रतीक्षा करती, तो मेरा उद्धार हो जाता। बस, उसी दिनसे उसका जीवन-स्रोत बदल गया और भगवान्‌की कृपासे उसका उद्धार हो गया। २—'व्याध'—इसका अर्थ कुछ टीकाकारोंने वाल्मीकि किया है और कुछ लोगोंने लिखा है कि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णके पैरमें तीर मारनेवाले 'जरा' नामक बहेलियेसे तात्पर्य है। दोनोंकी कथाएँ इस प्रकार हैं:— वाल्मीकि—पहले बहेलिया थे। इनका नाम रत्नाकर था। यह जंगलमें पशुपक्षियोंका शिकार करनेके सिवा बटोहियोंपर डाका डालती थे। पीछे नारदके उपदेशसे जीव-हिंसा छोड़कर उसके विपरीत राम-नाम जपने लगे और मुक्त हो गये। कहा है:— उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि भे ब्रह्म समाना। 'जरा'—भगवान् श्रीकृष्ण एक वृक्षके नीचे पैरके ऊपर दूसरा पैर रखकर लेटे हुए थे। एक बहेलियेने दूरसे भगवान्‌के पैरका तलवा देखकर अनुमान किया कि किसी हरिनकी लाल जिह्वा है। फिर क्या था, उसने लक्ष्य ठीक करके तीर मार दिया। पीछे जब वह भगवान्‌के पास आया, तब बहुत पश्चात्ताप करने लगा। अन्तमें परमात्माका साक्षात् दर्शन होनेके कारण वह व्याध मुक्त हो गया। (कहते हैं कि वह व्याध अंगदका अवतार था। रामावतारमें उसे वर मिला था कि द्वापरमें तुम पितृ-ऋण चुका सकोगे।) किन्तु यहाँ व्याधका अर्थ न तो वाल्मीकि ही है और न 'जरा' नामक व्याध ही। यहाँपर व्याध आया है, 'धर्म' नामक व्याधके लिए। धर्म नामक व्याधकी कथा श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रसिद्ध है। कथा बहुत बड़ी होनेके कारण यहाँ नहीं लिखी जा रही है। इसकी कथा महाभारतके वनपर्वमें भी है, किन्तु उसका जीवन वृत्तान्त तो अत्यन्त संक्षेपमें है—उपदेश ही अधिक है। पुराणोंमें और भी कई व्याधोंकी भिन्न-भिन्न प्रकार की कथाएँ पायी जाती हैं। अतः 'व्याध' शब्दसे यदि व्यक्ति-विशेषका अर्थ न निकाल कर व्याध ही अर्थ किया जाय तो भी कोई हानि नहीं। ३—'परसत पनवारो फारो'—एक सज्जनने स्वर्गीय जयशंकर 'प्रसाद'जी- के यहाँ इस प्रकार अर्थ किया था—'पानीमें उबाला हुआ फारा परोस रहे हैं?'

१८२ विनय-पत्रिका उस समय मित्रवर 'निराला'जी भी मौजूद थे । ऊपरका अर्थ सुनकर सब लोग खूब हँसे । ४-'तौ हरि···तजि गारो'—इस पंक्तिका भी वियोगी हरि आदि सब टीकाकारोंने बड़ा ही ऊटपटाँग अर्थ किया है । विस्तार-भयसे उसे यहाँ उद्धृत करना अनावश्यक है । ९५ ) तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं । जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं ॥१॥ चलिहैं छूटि पुंज पापिन के, असमंजस जिय जनिहैं । देखि खलल अधिकार प्रभूसों मेरी भूरि भलाई भनिहैं ॥२॥ हँसि करिहैं परतीति भगत की, भगत-सिरोमनि मनिहैं । ज्यौं त्यौं तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं ॥३॥ शब्दार्थ—तऊ = तो भी । अनिहैं = लावेंगे । पुंज = समूह । खलल = विघ्न । भनिहैं = कहेंगे । मनिहैं = मानेंगे । भावार्थ—यदि यमराज सब काम छोड़कर यही विचार (केवल मेरे पापों- का लेखा लगाना ही) अपने दिलमें लावेंगे, तो भी वह मेरे पापों और दुर्गुणों- को न गिन सकेंगे ॥१॥ (उस दशामें) पापियोंके दलके दल भाग खड़े होंगे, और तब यमराज अपने दिलमें उस समयका असमंजस समझेंगे । फिर तो वह अपने अधिकारमें विघ्न पड़ते देखकर भगवान्‌से मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे ॥२॥ उनके (मुखसे प्रशंसा सुनकर) आप भी हँसकर मुझ भक्तका विश्वास करेंगे और मुझे भक्तशिरोमणि मान लेंगे । हे कोशलेश ! आपको जैसे-तैसे इस तुलसीदासको अपनाना ही पड़ेगा ॥३॥ विशेष १—'खलल'—यह शब्द फारसीका है । ( ९६ ) जौ पै जिय धरिहौ अवगुन जनके । तौ क्यौं कटत सुकृत नखते मो पै, विपुल बूंद अघ-बनके ॥१॥

विनय-पत्रिका १८३ कहिहै कौन कलुष मेरे कृत, करम बचन अरु मनके हारहिं अमित सेष सारद श्रुति, गिनत एक एक छनके ॥२॥ जो चित चढ़ै नाम-महिमा निज, गुनगन पावन पनके। तो तुलसिहिं तारिहौ विप्र ज्यौं दसन तोरि जमगनके ॥३॥ शब्दार्थ—कलुष = पाप । पावन = पवित्र । पन = प्रतिज्ञा । विप्र = ब्राह्मण (अजामिल) । भावार्थ—हे स्वामी ! यदि आप सेवकके अवगुणोंको मनमें लावेंगे, तो पुण्यरूपी नखसे पापरूपी बड़े-बड़े वनोंके समूह मुझसे कैसे कटेंगे (तात्पर्य यह कि मेरे थोड़े-से पुण्यसे बड़े-बड़े पाप दूर नहीं हो सकते) ॥१॥ मेरे मन, वचन और कर्मसे किये हुए पापोंको कौन कह सकेगा ? मेरे एक एक क्षणके पापोंकी गिनती करनेमें अनेक शेष, सरस्वती और वेद हार जायँगे ॥२॥ यदि आपके चित्तपर अपने नामकी महिमा और (पतितोंको) उद्धार करनेके प्रणकी गुणावली चढ़े, तो जैसे आपने यमदूतोंके दाँत तोड़कर ब्राह्मण-(अजामिल) को तार दिया था, वैसे ही तुलसीको भी तार दीजियेगा ॥३॥ ( ९७ ) जौ पै हरि जनके अवगुन गहते । तौ सुरपति कुरुराज बालिसों, कत हठि बैर बिसहते ॥१॥ जौ जप जाग जोग ब्रत बरजित, केवल प्रेम न चहते । तौ कत सुर मुनिवर बिहाय ब्रज, गोप-गेह बसि रहते ॥२॥ जौ जहँ-तहँ प्रन राखि भगत को, भजन प्रभाउ न कहते । तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भाँति निबहते ॥३॥ जौ सुतहित लिय नाम अजामिल के अघ अमित न दहते । तौ जमभट साँसति-हर हमसे वृषभ खोजि खोजि नहते ॥४॥ जौ जग-विदित पतित-पावन, अति बाँकुर विरद न वहते । तौ बहु कलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न लहते ॥५॥ शब्दार्थ—कत = क्यों । बिसहते = मोल लेते । बिहाय = छोड़कर । वृषभ = बैल । नहते = नाथते, जोतते । विरद = बाना । बाँकुर = बाँका, टेढ़ा । लहते = पाते ।

१८४ विनय-पत्रिका भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप अपने भक्तोंके दुर्गुणोंपर ध्यान देते, तो इन्द्र, दुर्योधन और बालिसे क्यों हठपूर्वक वैर मोल लेते ? ॥१॥ यदि आप जप, यज्ञ, योग, व्रत आदि छोड़कर केवल प्रेम ही न चाहते, तो आप देवता और श्रेष्ठ मुनियोंको छोड़कर व्रजके गोपोंके घरमें क्यों निवास करते ? ॥२॥ यदि आप जहाँ-तहाँ भक्तोंकी प्रतिष्ठा रखकर भजनका प्रभाव न कहते, तो हम सरीखे मूढ़ोंका इस कठिन कलिकालके कर्म-मार्गमें किस प्रकार निर्वाह होता ? ॥३॥ पुत्रके निमित्त आपका नाम (नारायण) लेनेवाले अजामिलके अगणित पापोंको यदि आपने भस्म न किया होता, तो यमदूत हम जैसे बैलोंको यातनाके हलमें खोज-खोजकर जोतते ॥४॥ यदि आप जगत्-प्रसिद्ध पतित-पावन रूपका अत्यन्त बाँका बाना न धारण किये होते, तो अनन्त कल्पोंतक कुटिल तुलसी-सरीखे लोगोंको स्वप्नमें भी उत्तम गति न प्राप्त होती ॥५॥ विशेष १—'सुरपांत'—एक बार नारदजी स्वर्गसे पारिजातका पुष्प लाकर रुक्मिणीको दे गये । कृष्ण भगवान्‌की दूसरी रानी सत्यभामाने उसे लेनेके लिए मान किया । भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रसे युद्ध करके पारिजातका वृक्ष ही उखाड़ लाये । यद्यपि सत्यभामाका मान करना अनुचित था, पर भगवान्‌ने उसकी भक्तिवश उसके मान करने पर ध्यान न देकर इन्द्रसे वैर किया । २—'बिसहते'—श्री वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है 'ठानते' 'कर बैठते'; पर वास्तवमें इसका अर्थ है 'मोल लेना' । बोल-चालकी भाषामें अब भी इस शब्दका प्रयोग होता है । कहा भी है :— बूढ़ा बदई बिसाहिये, झीना कापड़ लेय । अपने करै बिसहनी, दैवहिं दूषन देय ॥ अथवा:— 'तेरे बिसाहे बिसाहुत औरनि और बिसाहिकै बेचनहारे । ३—'कुरुराज'—पाँचों पांडवोंका द्रौपदीको रख लेना, जुआ खेलना, जुएम द्रौपदीको हार जाना आदि उनके प्रत्यक्ष दोष थे, पर उनकी भक्ति देखकर भगवान् श्रीकृष्णने उनके दोषोंपर ध्यान नहीं दिया और उनकी ओरसे दुर्योधन- के साथ वैर किया ।

विनय-पत्रिका १८५ ४—'बालि'—सुग्रीवका पक्ष बिलकुल निर्दोष न होनेपर भी भगवान्‌ने उसकी ओरसे बालिको मारा था और सुग्रीवको राजगद्दीपर बिठाया था। [ ९८ ] ऐसी हरि करत दास पर प्रीति। निज प्रभुता बिसारि जनके बस, होत सदा यह रीति ॥१॥ जिन बाँधे सुर-असुर, नाग-नर, प्रबल करम की डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सकत न छोरी ॥२॥ जाकी मायावस विरंचि सिव, नाचत पार न पायो। करतल ताल बजाइ ग्वाल-जुवतिन्ह सोइ नाच नचायो ॥३॥ विस्वंभर, श्रीपति, त्रिभुवनपति, वेद-विदित यह लीख। बलिसों कछु न चली प्रभुता वरु है द्विज माँगी भीख ॥४॥ जाको नाम लिये छूटत भव-जनम-मरन दुख-भारी। अंबरीष हित लागि कृपानिधि, सोइ जनमे दस बार ॥५॥ जोग-बिराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि खोजत मुनि ग्यानी। वानर-भालु चपल पसु पामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥६॥ लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आग्याकारी। तुलसिदास प्रभु उग्रसेन के द्वार बेंत करधारी ॥७॥ शब्दार्थ-अविच्छिन्न = अखंड। छोरी = खोलन। लीख = लीक, रेखा। रति = प्रीति। भावार्थ—भगवान् अपने सेवकपर इतना प्रेम करते हैं कि अपनी प्रभुता भूलकर भक्तके अधीन हो जाते हैं। उनकी यह रीति सनातन है ॥१॥ जिस परमात्माने देवता, दैत्य, नाग और मनुष्योंको मजबूत कर्मकी डोरीसे बाँध रखा है, उस अविच्छिन्न परब्रह्मको यशोदाजीने जबर्दस्ती बाँध दिया और उसे वह खोल न सके ॥२॥ जिसकी मायाके वश होकर ब्रह्मा और शिवजी भी नाचते- नाचते पार नहीं पा सके, उसे ग्वाल-युवतियोंने हथेलीसे ताल बजा-बजाकर नाच नचाया ॥३॥ यह लीक वेदोंमें प्रसिद्ध है कि भगवान् विश्वम्भर (संसारका भरण-पोषण करनेवाले) हैं, श्रीपति (लक्ष्मीजीके स्वामी) हैं और तीनों लोकोंके नाथ हैं, किन्तु फिर भी भक्त राजा बलिके आगे उनकी कुछ भी प्रभुता

१८६ विनय-पत्रिका न चली, बल्कि ब्राह्मण बनकर उन्होंने उससे भीख माँगी ॥४॥ जिसका केवल नाम लेनेसे ही संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंके भारसे छुटकारा हो जाता है, उसी कृपासिन्धुने भक्त अम्बरीषके लिए दस वार अवतार धारण किया ॥५॥ जिसे ज्ञानी मुनि योग, विराग, ध्यान, जप और तप करके खोजते हैं, उस जगन्नाथने बानर, भालू आदि नीच और चंचल पशुओंसे प्रीति की ॥६॥ लोकपाल, यमराज, काल, पवन, सूर्य, चन्द्रमा आदि जिसके आज्ञाकारी हैं, हे तुलसीदास, वही प्रभु, (प्रेमवश) उग्रसेनके द्वारपर हाथमें बेंत लिये खड़े हैं ॥७॥ विशेष १—‘बलिसों······भीख’—राजा बलि भक्त था, इसलिए आवश्यकता पड़नेपर भगवान्‌ने प्रभुत्वसे काम न लेकर वामनरूप धारण करके उससे भीख ही माँगी। यदि वह चाहते तो भीख न माँगकर जबर्दस्ती उसका राज्य छीन लेते; पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। २—‘अम्बरीष’—महाराज अम्बरीष परमभक्त वैष्णव और एकादशी व्रतके अनन्य व्रती थे। एक बार द्वादशीके दिन उनके यहाँ दुर्वासा ऋषि आये। राजाने उन्हें निमन्त्रण दिया था। हर द्वादशीको वह बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पारण करते थे। दुर्वासा ऋषिने स्नान करने जाकर बड़ी देर लगायी। उस दिन कुछ ही देरके बाद त्रयोदशी थी। द्वादशीमें ही पारण कर लेनेका शास्त्रीय विधान है। विद्वान् ब्राह्मणोंकी आज्ञासे इस दोषके परिहारके लिए राजाने तुलसी-दल-मिश्रित भगवान्‌का चरणोदक ले लिया। इतनेमें दुर्वासा ऋषि स्नान करके आ गये। राजाके पारण करनेका समाचार पाकर वह बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने राजाको शाप दिया कि ‘तुझे जो इसी जन्ममें मुक्त हो जाने- का घमण्ड है, वह व्यर्थ है। अभी तुझे दस बार और जन्म लेना पड़ेगा।’ यह शाप देनेके बाद उन्होंने कृत्या नामकी राक्षसी भी उत्पन्न की, जो पैदा होते ही अम्बरीषको खा जानेके लिए उनकी ओर दौड़ी। भगवान्‌ने अपने भक्त राजा अम्बरीषकी रक्षाके लिए सुदर्शन चक्रको आज्ञा दी। उसने कृत्याको मारकर दुर्वासा ऋषिका पीछा किया। दुर्वासा ऋषि चक्रके भयसे तीनों लोकोंमें

घूम आये, पर कहीं भी उन्हें शरण न मिली। अन्तमें वह अम्बरीषके चरणोंपर जाकर गिर पड़े। राजाने स्तुति करके चक्रको शान्त किया। इसके बाद भग- वान्ने दुर्वासा ऋषिसे कहा कि तुम्हारे दिये हुए शापको मैं ग्रहण करता हूँ। उनके स्थानपर मैं ही दस बार शरीर धारण करूँगा। ३—'उग्रसेन'—कंसके पिता और श्रीकृष्णजीके नानाका नाम था। अत्याचारी कंसका वध करनेके बाद भगवान्‌ने अपने नाना उग्रसेनको राजगद्दी- पर बिठाया और स्वयं वह उनके द्वारपाल बने। [ ९९ ] बिरद गरीब-निवाज राम को। गावत वेद-पुरान, संभु-सुक, प्रगट प्रभाउ नाम को ॥१॥ ध्रुव, प्रह्लाद, विभीषन, कपिपति, जड़, पतंग, पांडव, सुदाम को। लोक सुजस, परलोक सुगति, इन्ह में को है राम'काम को ॥२॥ गनिका, कोल, किरात, आदिकवि, इन्हते अधिक वाम को। बाजिमेध कव कियो अजामिल, गज गायौ कव साम को ॥३॥ छली, मलीन, हीन सब ही अँग, तुलसी सों छीन छाम को। नाम-नरेस-प्रताप प्रबल जग, जुग-जुग चालत चाम को ॥४॥ शब्दार्थ—पतंग = पक्षी (जटायु, काक-भुशुंडि)। आदिकवि = वाल्मीकि। बाजिमेध = -अश्वमेध। साम = सामवेद। छाम = पतला। भावार्थ—गरीबोंको निहाल करना ही श्रीरामजीका बाना है। वेद, पुराण, शिवजी, शुकदेवजी आदि यही गाते हैं, और उनके नामका प्रभाव तो प्रत्यक्ष है ही ॥१॥ ध्रुव, प्रह्लाद, विभीषण, सुग्रीव, जड़ (यमलार्जुन, अहिल्या आदि), पक्षी (जटायु, काकभुशुंडि), पाँचो पांडव और सुदामा इन सबको भगवान्‌ने इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें मोक्ष दिया है। इनमें श्रीरामजीके कामका कौन है ! (अर्थात् इन लोगोंकी ओर ध्यान न देनेसे रामजीका कुछ न बिगड़ता) ॥२॥ गणिका, कोल-किरात (गुह, निषाद आदि) तथा आदिकवि महर्षि वाल्मीकि आदिसे बुरा कौन था? अजामिलने कब अश्वमेध यज्ञ किया था, और गजेन्द्रने कब सामवेद गाया था ? ॥३॥ तुलसीके समान छली, मलिन,

१८८ विनय-पत्रिका सब साधनोंसे हीन तथा दुबला-पतला और कौन है ! किन्तु (राम) नाम-रूपी राजाके प्रबल प्रतापसे संसारमें युग-युगसे चमड़ेका सिक्का भी चलता आ रहा है ! अभिप्राय यह है कि राम नामकी महिमासे अधमसे अधम जीव भी मुक्त होते आये हैं ॥४॥ विशेष 'सुदामा'—सुदामा भगवान् कृष्णके सखा थे । वह बहुत ही गरीब थे । अपनी स्त्रीके कहने-सुननेपर वह भेंट देनेके लिए चार मुट्ठी चावल लेकर भग- वान्‌से मिलनेके लिए द्वारका गये । भगवान्‌ने उनका बड़ा आदर किया और उन्हें समृद्धिशाली बना दिया । कृष्ण-सुदामा-सम्मिलनपर नीचेकी रचना बहुत ही उत्तम है:— ऐसे बिहाल बिवाइन ते मग कंटक जाल गड़े पुनि जोये । हाय महा दुख पायो सखा तुम आयो इतै न कितै दिन खोये ॥ देखि सुदामा की दीन दसा करुना करिकै करुनामय रोये । पानी परात कै हाथ छुयो नहिं नैनन के जलते पग धोये ॥ १०० ] सुनि सीतापति-सील-सुभाउ । मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥१॥ सिसुपनते पितु, मातु, बन्धु, गुरु, सेवक, सचिव, सखाउ । कहत राम-बिधु बदन रिसौहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥२॥ खेलत संग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ । जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥३॥ सिला साप-संताप-बिगत भइ, परसत पावन पाउ । दई सुगति सो न हेरि हरष हिय, चरन छुए (को) पछिताउ ॥४॥ भव-धनु भंजि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ । छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥५॥ कह्यो राज, बन दियो नारिब्स, गरि गलानि गयो राउ । ता कुमातु को मन जुगवत ज्यौं निज तनु मरम कुघाउ ॥६॥

विनय-पत्रिका १८९ कांपे-सेवा-वस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ । देवें को न कछू रिनियाँ हौँ धनिक तू पत्र लिखाउ ॥७॥ अपनाये सुग्रीव बिभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ ! भरत-सभा सनमानि सराहत, होत न हृदय अघाउ ॥८॥ निज करुना करतूति भगत पर, चपत चलत चरचाउ । सकृत प्रनाम प्रनत जस वरनत, सुनत कहत फिरि गाउ ॥९॥ समुझि समुझि गुनग्राम राम के, उर अनुराग बढ़ाउ । तुलसिदास अनयास रामपद पइहै प्रेम-पसाउ ॥१०॥ शब्दार्थ—खेहर = धूल, राख । रिसौहैं = क्रोधित । काउ = किसीने । अनट = अनीति । अपाउ = अपाय, हानि । भव = शिवजी । ताउ = ताव, क्रोध । समाउ = शक्ति, सहिष्णुता । कनौड़े = उपकृत । छाउ = छाया । चपत = संकुचित । सकृत = एक बार । पसाउ = प्रसन्नता । भावार्थ—सीतापति रामचन्द्रका शील और स्वभाव सुनकर भी जिस आदमीका मन प्रमुदित नहीं होता, जिसका शरीर पुलकायमान नहीं होता, जिसकी आँखोंमें आँसू नहीं आ जाते, वह धूल फाँकता है. (अर्थात् उस मनुष्य- का जीवन निस्तत्त्व है) ॥१॥ बचपनसे ही पिता, माता, भाई, गुरु, सेवक, मन्त्री और सखा (मित्र) कहते हैं कि रामचन्द्रजीका चन्द्रमाके समान मुख स्वप्नमें भी किसीने क्रोधित नहीं देखा ॥२॥ उनके साथ जो उनके तीनों भाई और अन्यान्य बालक प्रतिदिन खेलते थे, उनकी अनीति और हानिको वह बचाते रहते थे और जीतनेपर भी हार मानकर उन्हें पुचकारते-दुलारते तथा स्वयं दाव देते और दूसरोंसे दिलाते थे ॥३॥ उनके पवित्र चरणोंका स्पर्श होते ही पाषाणमूर्त्ति अहल्या शापके दुःखसे मुक्त हो गयी। किन्तु उसे सद्गति देनेका तो उनके मनमें कुछ भी हर्ष न हुआ, हाँ, इस बातका पछतावा अवश्य हुआ कि मैंने ऋषि-पत्नीको पैरसे छू दिया ॥४॥ शिव-धन्वा तोड़कर राजाओंका मान भंग करनेपर परशुरामजी तावमें आ गये; किन्तु श्रीरामजीने उनका अपराध क्षमा करके और स्वयं भी उनके पैरोंपर गिरकर लक्ष्मणजीके कटु वाक्यको क्षमा कराया । भला इतनी सहिष्णुता किसमें है ? ॥५॥ दशरथने कहा राज्य देनेके लिए, और स्त्रीके वशमें होकर दिया वन; इसी बातकी ग्लानिमें

१९० विनय-पत्रिका वह मर भी गये। (वन देनेवाली) ऐसी बुरी माता (कैकयी) का मन भी आप इस प्रकार रखते आये (यानी कैकयीकी रुचिके अनुकूल काम करते आये) जैसे कोई अपने शरीरके मर्मस्थानके बुरे घावकी रक्षा करे ॥६॥ बन्दर (हनुमान्‌जी) की सेवापर मुग्ध होकर आप उपकृत हुए और बोले, 'हे पवन- कुमार ! यहाँ आ, मेरे पास तुझे देने योग्य कुछ भी नहीं है; हाँ, इस बातका तू मुझसे सनद लिखा ले कि मैं तेरा ऋणी हूँ और तू मेरा धनी (महाजन) है' ॥७॥ सुग्रीव और विभीषणको अपना लेनेपर भी उन लोगोंने छलकी छाया नहीं छोड़ी। (फिर भी आप उन्हें अपनाये ही रह गये) और भरतजीकी सभामें उन दोनोंकी ससम्मान सराहना करते हुए आपका हृदय तृप्त ही नहीं होता था ॥८॥ भक्तोंपर आपने जो-जो कृपा और उपकार किये हैं, उनकी तो चर्चा चलते ही आप संकुचित या लज्जित हो जाते हैं, पर जो एक बार भी आपको प्रणाम करता है और शरणमें आ जाता है, उसका आप यश बखानते हैं और (दूसरोंसे उसका यश) सुनकर भी कहते हैं कि 'फिर कहो' ॥९॥ ऐसे श्रीरामजीकी गुणा- वली समझ-समझकर (प्रत्येक मनुष्यको) अपने हृदयमें प्रेम बढ़ाना चाहिये। तुलसीदास कहते हैं कि इससे तू अनायास ही श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमानन्द पा जायगा ॥१०॥ विशेष १—'खेलत संग······दोउ'—भरतजीने भी यही कहा है— 'हारेउ खेल जितावहु मोहीं।' २—'अपन। ये······छल छा'—टीकाकारोंने इसका अर्थ इस प्रकार किया है:—'सुग्रीवने अपने सहोदर बालिकी स्त्री ताराको और विभीषणने अपने भाई रावणकी स्त्री मन्दोदरीको रख लिया था। यही छलकी छाया है।' किन्तु विचार- णीय बात तो यह है कि यदि उन दोनोंने अपने-अपने भाईकी स्त्रीको रख लिया था तो इसमें उन्होंने रामजीके साथ कौनसा छल किया ? क्योंकि यह तो उनका चारित्रिक दोष कहा जा सकता है, छल नहीं। वास्तवमें इसका अर्थ यह है कि जिस समय रामजी अवधपुरीमें आकर भरतसे मिले हैं, उस समय अपूर्व भ्रातृमिलन देखकर थोड़ी देरके लिए सुग्रीव और विभीषणके हृदयमें

विनय-पत्रिका १९१ यह भाव पैदा हुआ कि हाय ! रामजी स्वयं तो इस प्रकार अपने भाईसे मिल रहे हैं और उधर इन्होंने हम लोगोंको फुसलाकर हमारे भाईका वध किया। हम लोग भी कैसे अभागे हैं कि अपनेसे ही अपने लायक (!) भाईका वध शत्रुके हाथसे करा डाला। तात्पर्य कि यह बात असह्य है और रामजीसे बदला लेने योग्य है। बस यही सुग्रीव और विभीषणका छल है। यह कथा वाल्मीकीय रामायणमें लिखी है। अथवा 'छल छाउ' का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि रामजीने तो सुग्रीव और विभीषणको अपना लिया, पर उन लोगोंने कपट-भाव नहीं छोड़ा। अर्थात् उनके भीतर तो भाईकी स्त्रीके साथ अगम्यागमनरूप महापाप करने एवं ऐश्वर्यभोग करनेकी प्रबल वासना थी और ऊपरसे उन दोनोंने कुछ और ही बात कही। उदाहरणार्थ सुग्रीवने रामजीसे कहा था कि— सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहौं सेवकाई ॥ इसी प्रकार विभीषणने भी कहा था कि— 'उर कछु प्रथम वासना रही। प्रभु-पद-प्रीति-सरित सो बही ॥' किन्तु पीछे दोनोंने ही अपनी बातोंपर ध्यान नहीं दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि सुग्रीव और विभीषणके मनमें तो सुखोपभोगकी लालसा थी, पर उन दोनोंने रामजीसे बनावटी बात कही थी। भला यह अन्तर्यामी भगवान्‌के साथ छल नहीं तो और क्या है ! श्रीरामजीने उनका यह कपटभाव जानते रहनेपर भी शरणमें आनेके कारण उन दोनोंको अपना लिया और फिर कभी नहीं छोड़ा। ३—'अपनाये······हृदय अघाउ'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने इस प्रकार किया है—'यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना कपटभाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपने शरणमें ले ही लिया। और भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही नहीं होती।' इस अर्थसे एक तो यह भाव प्रकट होता है कि सुग्रीव और विभीषणका कपटभाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया था और दूसरा भाव यह प्रकट होता है कि भरतकी प्रशंसा करनेमें रामजी सन्तुष्ट नहीं होते। किन्तु यथार्थतः ऐसा नहीं है। उन दोनोंने भगवान्‌के अपनानेके बाद अपने कपटभावका परिचय दिया

१९२ विनय-पत्रिका था; किन्तु उनका कपटभाव होनेपर भी रामजी उन्हें अपनाये ही रह गये— छोड़ा नहीं। दूसरी बात यह कि यदि श्रीरामजी 'भरतजीकी प्रशंसा करते रहते हैं', तो इसमें रामजीकी कौन-सी विशेषता है ? क्योंकि भरतजी तो प्रशंसा योग्य थे ही। अतः वियोगी हरिजीका अर्थ गोस्वामीजीके भावके सर्वथा विरुद्ध और असंगत है। रामजी अपने प्रिय भाई भरतकी प्रशंसा नहीं करते बल्कि भरत-सभामें भरतजीसे सुग्रीव और विभीषणकी प्रशंसा करते हैं। यहाँ ग्रन्थ- कारका यही भाव है। देखिये न, गोस्वामीजीने रामायणमें लिखा भी है:— जेहि अव बधेउ व्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥ सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥ ते भरतहिं भेंटत सनमाने। राजसभा रघुवीर बखाने ॥ ( १०१ ) जाउँ कहाँ तजि चरन तिहारे । काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥१॥ कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे । खग, मृग, व्याध, पषान, विटप जड़, जवन कवन सुर तारे ॥२॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया विबस बिचारे । तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥३॥ शब्दार्थ—कौने = किस । बराइ = चुनकर । कवन = किस । भावार्थ—हे नाथ ! मैं आपके चरणोंको छोड़कर कहा जाऊँ ? संसारमें ‘पतित-पावन' नाम किसका है ? दीनजन किसे बहुत प्यारे हैं ? ॥१॥ किस देवताने अपने ब्रानेकी लाज रखनेके लिए जबर्दस्ती कर करके अधमोंको चुनकर उनका उद्धार किया है ? पक्षी (जटायु), मृग (मारीच), व्याध (वाल्मीकि), पाषाण (अहल्या), जड़वृक्ष (यमलार्जुन) और यवनको किस देवताने तारा ? ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग और मनुष्य ये सब बेचारे मायाके अधीन हैं। अब हे प्रभो ! यह तुलसीदास अपनेको उन लोगोंके हाथोंमें क्यों सौंपे, अपना स्वाभिमान क्यों खो दे ॥३॥

विनय-पत्रिका १९३ विशेष १—'मृग'—रावणका मामा मारीच कपटी मृग बनकर भगवान्‌के सामने आया था। भगवान्‌ने उसे मारकर मुक्त कर दिया था। गोस्वामीजीने राम- चरितमानसमें लिखा है— अन्तर प्रेम तासु पहिचानी। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि भवानी ॥ ( १०२ ) हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों। साधन-धाम बिबुध-दुरलभ तनु, मोहिं कृपा करि दीन्हों ॥१॥ कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार । तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार ॥२॥ बिषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कवहूँ पल एक । ताते सहौं विपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक ॥३॥ कृपा-डोरि बंसी पद-अंकुस, परम प्रेम मृदु चारो। येहि विधि वेधि हरहु दुख मेरो, कौतुक राम तिहारो ॥४॥ हैं श्रुति-विदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै । तुलसिदास येहि जीव मोह-रजु, जोइ बाँध्यो सोइ छोरै ॥५॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। बंसी = मछली फँसानेकी काँटिया। भावार्थ—हे हरे ! आपने बड़ा अनुग्रह किया। आपने कृपा करके मुझे साधनोंका स्थान, देवताओंके लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर दे दिया ॥१॥ आपका एक एक उपकार करोड़ों मुखसे नहीं कहा जा सकता; फिर भी हे नाथ ! मैं कुछ और माँगूँगा। आप परम उदार हैं, वह मुझे दीजिये ॥२॥ मेरा मनरूपी मीन विषयरूपी जलसे कभी एक पलके लिए भी अलग नहीं होता। इससे मैं अनेक योनियोंमें जन्म लेकर अत्यन्त दारुण कष्ट सहन करता हूँ ॥३॥ (इस मनमच्छको पकड़नेके लिए) हे रामजी ! अपनी कृपाकी डोरी और अपने चरण- चिह्न अंकुशको कँटिया बनाइये। उस बंसीमें परम प्रेम रूपी कोमल चारा लगा दीजिये। इस प्रकार (मनरूपी मछलीको) बेधकर मेरा दुःख दूर कीजिये। इसमें आपका कौतुक भी होगा ॥४॥ यों तो वेदोंमें बहुत-से उपाय (संयम, जप, तप १३

१९४ विनय-पत्रिका आदि) विदित हैं और सब देवता भी प्रसिद्ध हैं, किन्तु यह दीन किस-किसका निहोरा करे ? तुलसीदास कहते हैं कि जिसने इस जीवको मोह-रूपी रस्सीमें बाँध रखा है, वही इसे छोड़ सकता है ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने इस पदमें बड़ा ही अपूर्व और अलौकिक रूपक बाँधकर सरकारकी सेवामें अपनी माँग पेश की है। इसमें विरक्ति और अनुरक्तिका सजीव सिद्धान्त है। मनको मीन बनाया है और विषयोंको जल; जिस प्रकार मछलियोंमें चंचलता होती है, उसी प्रकार मन भी अत्यन्त चंचल है। जिस प्रकार जलका बहाव स्वाभाविक ही अधोगामी होता है, उसी प्रकार विषय- वासनाका परिणाम भी अधोगामी है। जिस प्रकार मछली एक क्षणके लिए भी जलसे पृथक् नहीं होना चाहती, उसी प्रकार मन भी विषयोंको नहीं छोड़ना चाहता। [ १०३ ] यह विनती रघुबीर गुसाईं । और आस-विश्वास-भरोसो, हरौ जीव-जड़ताई ॥१॥ चहौं न सुगति, सुमति, सम्पति, कछु, रिधि-सिधि, बिपुल बड़ाई । हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥२॥ कुटिल करम लै जाइ मोहिं जहँ जहँ अपनी बरिआई । तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अण्ड की नाई ॥३॥ या जग में जहँ लगि या तनु की प्रीति प्रतीति सगाई । ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिट इक ठाई ॥४॥ शब्दार्थ—हेतु-रहित = कारणरहित, निष्काम । बरिआई = जबर्दस्ती । कमठ = कछुआ सगाई = नाता, सम्बन्ध । भावार्थ—हे रघुबीर स्वामी ! मेरी यही विनती है कि आप इस जीवकी जड़ता और दूसरोंका आशा-भरोसा तथा विश्वास दूर कर दीजिये ॥१॥ मैं मुक्ति, सुबुद्धि, सम्पत्ति, ऋद्धि-सिद्धि तथा बहुत बड़ाई आदि कुछ भी नहीं चाहता । हे रामजी ! (सिर्फ इतनी ही कामना है कि) आपके चरणोंमें मेरा

निष्काम प्रेम दिनोंदिन अधिकसे अधिक बढ़ता जाय ॥२॥ मुझे यह बुरा कर्म जहाँ-जहाँ (जिस-जिस योनिमें) अपनी जबर्दस्तीसे ले जाय, वहाँ-वहाँ आप वैसे ही क्षणभरके लिए भी अपनी कृपा न हटाइयेगा, जैसे कछुआ अपने अण्डेको नहीं छोड़ता ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि इस संसारमें जहाँतक इस शरीरका प्रेम, विश्वास और नाता है, वह सब एक जगह सिमटकर केवल परमात्मासे ही हो ॥४॥ [ १०४ ] जानकी-जीवन की बलि जैहौं । चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ॥१॥ उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-विमुख न पैहौं । मन-समेत या तनके वासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ॥२॥ श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं । रोकिहौं नयन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ॥३॥ नातो-नेह नाथसों करि सब नातो-नेह बहैहौं । यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ॥४॥ शब्दार्थ—नैहौं = प्रणाम करूँगा। छर = भारी। भार = बोझा। भावार्थ—मैं श्रीजानकीनाथपर बलि जाऊँगा (अपनेको निछावर कर दूँगा)। मेरा मन कह रहा है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंको छोड़कर अब मैं चलायमान होकर कहीं न जाऊँगा ॥१॥ मेरे हृदयमें यह विश्वास उत्पन्न हो गया है कि भगवान्‌के चरणोंसे विमुख होनेपर मुझे स्वप्नमें भी सुख न मिलेगा। मनके सहित इस शरीरके अन्य निवासियों—(इन्द्रियों) को मैं यही उपदेश दूँगा कि ॥२॥ न तो मैं अपने कानोंसे (रामजीकी कथा छोड़कर) किसी औरकी कथा सुनूँगा, और न जिह्वासे किसी दूसरेका गुणगान करूँगा। और किसीकी ओर देखनेसे नेत्रोंको रोकूँगा, केवल अपने इष्टदेव-(श्रीरामजी) को ही सिर नवाऊँगा ॥३॥ अपने स्वामीसे स्नेह-सम्बन्ध जोड़कर और तमाम स्नेह-सम्बन्धोंको बहा दूँगा। तुलसीदास कहते हैं कि मैं इस संसारमें जिसका दास कहाऊँगा, उसीको अपना यह भारी बोझा सौंप दूँगा ॥४॥